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तय करना होगा डिजिटल डाटा का वारिस

डाटा चोरी और फेक न्यूज को लेकर दुनिया भर में फेसबुक पर कड़ी नजर रखी जा रही है। लेकिन जर्मनी में अपनी बेटी को खोने वाले एक माता-पिता की जद्दोजहद ने फेसबुक को अलग से कटघरे में खड़ा कर दिया।

डिजिटल मीडिया जनसंचार का अद्यतन माध्यम है, जिसने व्यक्तिगत अभिव्यक्ति को अभूतपूर्व स्थान दिया है।

किसी व्यक्ति के मरने के बाद उसके फेसबुक अकाउंट पर किसका अधिकार है? फेसबुक का या फिर उसके परिजनों का? जर्मनी में इस सवाल पर बहस छिड़ी है। डाटा प्राइवेसी के संदर्भ में जहां यह सवाल अहम है, वहीं इसका एक भावनात्मक पहलु भी है। 15 साल की एक लड़की के माता पिता छह साल से अपनी बेटी के फेसबुक अकाउंट पर अधिकार पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे। वे जानना चाहते हैं कि बर्लिन में 2012 में एक ट्रेन के नीचे आकर मरने वाली उनकी बेटी एक दुर्घटना का शिकार हुई या फिर उसने आत्महत्या की थी। माता-पिता को लगा कि फेसबुक अकाउंट में दर्ज चैटिंग मैसेज शायद उन्हें कोई सुराग दे पाएं। लेकिन फेसबुक ने डाटा देने से मना कर दिया।

मामला देश की सबसे बड़ी अदालत तक जा पहुंचा। अदालत ने फैसला सुनाया कि जिस तरह किसी व्यक्ति के मरने के बाद उसके खतों और डायरी पर उसके वारिसों का हक होता है, उसी तरह फेसबुक अकाउंट भी विरासत कानून के तहत आता है। अदालत में लंबी कानूनी लड़ाई के बाद लड़की के माता-पिता के चेहरे पर संतोष था। फेसबुक ने अकाउंट तक एक्सेस ना देने का तर्क यह दिया कि इससे उस लड़की की फ्रेंडलिस्ट में शामिल लोगों की प्राइवेसी का हनन हो सकता है। फेसबुक के मौजूद नियमों के तहत किसी व्यक्ति के मरने के बाद उसके परिजन सिर्फ अकाउंट को आंशिक रूप से ही एक्सेस कर सकते हैं। वे या तो पेज को उस व्यक्ति की स्मृति में मेमोरियल पेज बना सकते हैं या फिर उसे पूरी तरह डिलीट कर सकते हैं। फेसबुक ने लड़की के पेज को मेमोरियल में तब्दील कर दिया, लेकिन माता-पिता को उसका एक्सेस नहीं दिया।

डाटा चोरी और फेक न्यूज को लेकर दुनिया भर में फेसबुक पर कड़ी नजर रखी जा रही है। लेकिन जर्मनी में अपनी बेटी को खोने वाले एक माता-पिता की जद्दोजहद ने फेसबुक को अलग से कटघरे में खड़ा कर दिया। 2015 में एक निचली अदालत ने माता पिता के हक में फैसला देते हुए कहा कि फेसबुक का डाटा भी विरासत कानून के तहत आता है। फेसबुक इसके खिलाफ अपीली अदालत में गया, जहां फैसला उसके हक में आया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यूजर यानी लड़की और फेसबुक के बीच जो कॉन्ट्रैक्ट था, वह उसकी मौत के साथ ही खत्म हो गया था। इसलिए उससे जुड़ा डाटा माता-पिता को नहीं दिया जा सकता।

बेटी की मौत की वजह को खोजने में जुटे मां-बाप के लिए यह एक धक्का था लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और जर्मनी की संघीय अदालत का दरवाजा खटखटाया, जहां फैसला उनके हक में आया। अदालत ने कहा कि माता-पिता को यह जानने का पूरा हक है कि उनका नाबालिग बच्चा इंटरनेट पर किससे क्या बात करता है, इसलिए फेसबुक डाटा देने से इनकार नहीं कर सकता। जज उलरिष हेरमन ने कहा कि जब कोई दुनिया छोड़ जाता है तो उसकी निजी डायरी और खत उसके परिजनों को मिलना सामान्य बात है, तो कोई वजह नहीं है कि उस व्यक्ति से जुड़े डिजिटल डाटा को इसी तरह ना सौंपा जाए। जर्मनी के शहर कार्ल्सरूहे में स्थित देश की सर्वोच्च अदालत के इस फैसले को अब अंतिम माना जाना चाहिए क्योंकि मुकदमे में फेसबुक की पैरवी कर रहे वकील ने अब आगे अपील न करने का संकेत दिया है।

हमारी जिंदगी में इंटरनेट के बढ़ते दखल के साथ डिजिटल विरासत और डाटा पर अधिकार के सवाल अहम होते जा रहे हैं। इससे पहले अमेरिका में सुरक्षा एजेंसियों ने 2015 में कैलिफोर्निया के सैन बैर्नांडीनो में गोलीबारी कर 14 लोगों की जान लेने वाले हमलावर के आईफोन को अनलॉक करने के लिए जब एपल से कहा, तो उसने ऐसा करने से इनकार कर दिया। अमेरिकी न्याय मंत्रालय ने दिग्गज टेक कंपनी पर आरोप लगाया कि वह जानबूझ कर एफबीआई के काम में तकनीकी बाधा खड़ी कर रही है। अदालत ने एपल को आदेश दिया कि वह ऐसा सॉफ्टवेयर तैयार करे जिसकी मदद से किसी के आईफोन को एक्सेस किया जा सके। लेकिन एपल को यह मंजूर नहीं था। उसने दलील दी कि इससे आईफोन इस्तेमाल करने वाले अन्य करोड़ों यूजर्स की डाटा प्राइवेसी खतरे में पड़ सकती है।

साइबर और कानूनी जानकार सलाह देते हैं कि जिस तरह व्यक्ति जीवित रहते हुए अपनी संपत्ति के बारे में फैसला करता है कि उसके बाद वह किसे मिलनी चाहिए, इसी तरह हमें अपने डिजिटल डाटा को लेकर भी फैसला करना होगा। यह ख्याल अभी थोड़ा अजीब लग सकता है लेकिन जिस तरह फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और विभिन्न ईमेल अकाउंट आम होते जा रहे हैं, उसे देखते हुए वसीयत करनी जरूरी होगी कि आपके जाने के बाद आपके डाटा के साथ क्या किया जाए। आप पावर ऑफ अटॉर्नी के जरिए किसी व्यक्ति को अपने डाटा पर अधिकार दे सकते हैं। लेकिन बहुत से लोग अभी डिजिटल विरासत को लेकर ज्यादा जागरुक नहीं हैं। खासकर नौजवानों को ना इस बारे में सोचने की फुरसत है और न ही वे सोचना चाहते हैं। लेकिन सोचने की जरूरत है। निश्चित रूप से डिजिटल विरासत एक जटिल मुद्दा है, लेकिन जर्मनी की संघीय अदालत का फैसला एक राह दिखाता है।

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