बांग्लादेश को नया राष्ट्रपति मिल गया है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के वरिष्ठ नेता मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने राष्ट्रपति चुनाव में जीत दर्ज की है। 78 वर्षीय आलमगीर ने सेवानिवृत्त सेना कर्नल ओली अहमद को हराकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर जगह बनाई है। वह शुक्रवार शाम बंगभवन के दरबार हॉल में राष्ट्रपति पद की शपथ ले सकते हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त एएमएम नासिर उद्दीन ने आलमगीर को विजेता घोषित किया। उन्हें 255 वोट मिले, जबकि ओली अहमद के पक्ष में 88 वोट पड़े। बांग्लादेश में यह 35 साल बाद पहला ऐसा राष्ट्रपति चुनाव है, जिसमें मुकाबला हुआ है। ऐसे में आलमगीर का राष्ट्रपति बनना न सिर्फ बीएनपी की सत्ता में वापसी को मजबूत करता है, बल्कि भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिहाज से भी अहम माना जा रहा है।
बीएनपी के पुराने और भरोसेमंद नेताओं में शामिल
मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर लंबे समय से बीएनपी से जुड़े हुए हैं। उन्होंने 1990 के दशक की शुरुआत में पार्टी की राजनीति में कदम रखा और धीरे-धीरे संगठन में अपनी जगह मजबूत की। वर्ष 2016 में उन्हें बीएनपी का महासचिव बनाया गया था। राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन होने तक वह इसी पद पर रहे।
बीएनपी में लंबे समय तक सक्रिय रहने के कारण उन्हें पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के सबसे अनुभवी नेताओं में गिना जाता है। विपक्ष में रहते हुए भी वह पार्टी की ओर से सरकार और नीतियों पर मुखर रुख रखते रहे हैं।
शेख हसीना सरकार के खिलाफ रहे मुखर
शेख हसीना के प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान आलमगीर बांग्लादेश के प्रमुख विपक्षी नेताओं में शामिल रहे। उन्होंने सरकार की नीतियों और लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर कई बार सवाल उठाए। इस दौरान उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया और उनके खिलाफ कई कानूनी मामले भी दर्ज हुए। बीएनपी के विपक्ष में रहते हुए उन्होंने पार्टी के आंदोलन और सरकार विरोधी अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
राजनीति में आने से पहले थे शिक्षक
राजनीति में सक्रिय होने से पहले मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर शिक्षक के रूप में काम कर चुके हैं। उन्होंने ढाका विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने पेशेवर जीवन की शुरुआत की और आगे चलकर सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। शिक्षण और अर्थशास्त्र की पृष्ठभूमि ने उनके सार्वजनिक जीवन को एक अलग आधार दिया। हालांकि बाद में उनकी पहचान मुख्य रूप से बीएनपी के वरिष्ठ राजनीतिक नेता के तौर पर बनी।
कई अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली
आलमगीर अपने राजनीतिक करियर में कई मंत्री पदों पर भी रह चुके हैं। राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन से पहले वह स्थानीय सरकार मंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे थे। राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनाए जाने के बाद उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। बीएनपी के सत्ता में लौटने के बाद उन्हें सरकार में अहम जिम्मेदारी मिली थी। अब राष्ट्रपति बनने के बाद उनकी भूमिका मुख्य रूप से संवैधानिक और औपचारिक होगी।
बीएनपी की सत्ता में वापसी के बाद राष्ट्रपति बने
आलमगीर का राष्ट्रपति बनना बीएनपी के लिए भी महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। 12 फरवरी को हुए आम चुनाव के बाद बीएनपी कई वर्षों तक विपक्ष में रहने के बाद सत्ता में लौटी थी। इसके कुछ समय बाद राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई।
राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन के स्वास्थ्य कारणों से पांच साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले इस्तीफा देने के बाद राष्ट्रपति चुनाव की जरूरत पड़ी। हालांकि बांग्लादेश में राष्ट्रपति का पद मुख्य रूप से औपचारिक माना जाता है, लेकिन राष्ट्रपति देश के संवैधानिक प्रमुख और सशस्त्र बलों के कमांडर-इन-चीफ होते हैं। वास्तविक कार्यकारी शक्तियां प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल के पास रहती हैं।
भारत को लेकर क्या रहा है आलमगीर का रुख?
मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर का भारत को लेकर रुख सख्त लेकिन संतुलित रहा है। उन्होंने कई मौकों पर भारत से बांग्लादेश की संप्रभुता और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का सम्मान करने की अपील की है। हालांकि, वह दोनों देशों के ऐतिहासिक और मैत्रीपूर्ण संबंधों के महत्व को भी स्वीकार करते रहे हैं।
दिसंबर 2024 में लंदन में बीएनपी की एक रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने अगरतला में बांग्लादेश के सहायक उच्चायोग पर हुए हमले और बांग्लादेशी राजनयिक मिशनों के बाहर हुए प्रदर्शनों को लेकर भारत की आलोचना की थी। उन्होंने भारत पर शेख हसीना का समर्थन करने का आरोप भी लगाया था। शेख हसीना 2024 में अपनी सरकार के सत्ता से हटने के बाद भारत चली गई थीं।
हालांकि इसी दौरान आलमगीर ने भारत को बांग्लादेश का “सबसे बड़ा पड़ोसी और मित्र” भी बताया था। उन्होंने 1971 के मुक्ति संग्राम में भारत की भूमिका को स्वीकार करते हुए नई दिल्ली से बांग्लादेशियों को नीची नजर से न देखने और देश की संप्रभुता व लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का सम्मान करने की अपील की थी।
शेख हसीना को लेकर क्या है उनका रुख?
आलमगीर लंबे समय से शेख हसीना और उनकी अवामी लीग सरकार के आलोचक रहे हैं। विपक्ष में रहते हुए उन्होंने हसीना सरकार पर लोकतांत्रिक अधिकारों को कमजोर करने और विपक्ष को दबाने के आरोप लगाए।
दिसंबर 2024 में भारत को लेकर दिए अपने बयानों में भी उन्होंने शेख हसीना को लेकर नई दिल्ली के रुख पर सवाल उठाया था। उनका कहना था कि बांग्लादेश की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का सम्मान किया जाना चाहिए और भारत की घरेलू राजनीति में बांग्लादेश विरोधी बयानबाजी दोनों देशों के संबंधों में लंबे समय तक तनाव पैदा कर सकती है।
राष्ट्रपति बनने के बाद भारत-बांग्लादेश रिश्तों पर नजर
आलमगीर के राष्ट्रपति बनने के बाद भारत और बांग्लादेश के संबंधों पर भी नजर रहेगी। हालांकि राष्ट्रपति के पास सीमित कार्यकारी शक्तियां हैं, लेकिन राष्ट्राध्यक्ष के तौर पर उनके बयान और कूटनीतिक रुख दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित कर सकते हैं।
आलमगीर के पुराने बयानों से संकेत मिलता है कि वह भारत के साथ ऐतिहासिक संबंधों को महत्व देते हैं, लेकिन साथ ही बांग्लादेश की संप्रभुता और राजनीतिक स्वायत्तता को लेकर किसी तरह की दखलंदाजी के खिलाफ सख्त रुख रखते हैं। ऐसे में नई दिल्ली के साथ उनके कार्यकाल में रिश्तों का आधार दोस्ती के साथ-साथ बराबरी और संप्रभुता के सम्मान पर जोर देने वाला हो सकता है।
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