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युवा राष्ट्रपति ने फ्रांस को एक साल में क्या दिया?

हाल के दिनों में राजधानी पेरिस समेत कई शहरों में बड़े सरकार विरोधी प्रदर्शन हुए हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि माक्रों की आर्थिक नीतियां और सामाजिक सुधार सिर्फ बड़ी बड़ी कंपनियों और अमीर लोगों को फायदा पहुंचा रहे हैं।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों। (Source: Reuters/File)

साल भर पहले फ्रांस में इमानुएल माक्रों का राष्ट्रपति बनना किसी चमत्कार से कम नहीं था। बड़े सुधारों के नारे के साथ उन्होंने स्थापित पार्टियों को धराशायी कर जीत हासिल की थी। जीत इसलिए भी अहम थी क्योंकि यूरोप में लगातार दक्षिणपंथियों की बढ़ती लोकप्रियता के बीच फ्रांस की जनता ने एक मध्यमार्गी को देश की सत्ता सौंपी। अब एक साल बाद यह सवाल उठना लाजिमी है कि फ्रांस की जनता के बीच जिन उम्मीदों को बेचकर माक्रों ने सत्ता हासिल की, उनमें से कितनी पूरी हुईं। माक्रों ने नौकरियां बढ़ाने और अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का वादा किया था। कड़े विरोध के बावजूद उन्होंने श्रम सुधार लागू किए हैं। स्टार्टअप्स और छोटे उद्यमों के हिमायती माक्रों की कोशिशों का फायदा भी दिखता है। देश में उनके राष्ट्रपति बनने के बाद बेरोजगारी कम हुई है और फ्रांस में निवेशकों की दिलचस्पी भी बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भी माक्रों फ्रांस की अहमियत बढ़ाने पर भी जोर दे रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर माक्रों को विश्व नेताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते देखा जा रहा है।

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लेकिन घरेलू मोर्चे पर फ्रांस की जनता उनसे ज्यादा खुश नहीं दिखती। सर्वेक्षणों में उनकी लोकप्रियता लगातार गिर रही है। हाल के दिनों में राजधानी पेरिस समेत कई शहरों में बड़े सरकार विरोधी प्रदर्शन हुए हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि माक्रों की आर्थिक नीतियां और सामाजिक सुधार सिर्फ बड़ी बड़ी कंपनियों और अमीर लोगों को फायदा पहुंचा रहे हैं। माक्रों के विरोधियों में छात्रों से लेकर रेलकर्मी तक सब शामिल हैं। अपने एक साल के कार्यकाल में माक्रों ने श्रम नियमों को इस तरह बदला है कि कंपनी या उद्योगों के लिए अब लोगों को नौकरी पर रखना और नौकरी से निकालना आसान हो गया है। उन्होंने अमीर लोगों पर लगने वाले टैक्स को घटाया है। शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव किए हैं। सरकारी खर्च घटाने के लिए सांसदों की संख्या को घटाने की योजना भी उन्होंने पेश की है। उन्हें कर्ज में डूबी फ्रांस की सरकारी रेल सेवा में सुधारों के मुद्दे पर मजदूर यूनियनों से टकराना पड़ रहा है। माक्रों पर आरोप लग रहे हैं कि वह चंद लोगों से घिरे हैं और बिना सलाह मशविरे के विवादित सुधारों को लागू कर रहे हैं।

माक्रों की “एन मार्श” पार्टी की जिन हजारों स्थानीय समितियों के कार्यकर्ताओं ने मतदाताओं के घर घर जाकर माक्रों की जीत में अहम योगदान दिया, उन्होंने भी अब उम्मीदें छोड़नी शुरू कर दी है। आलोचक कहते हैं कि जनता के बीच माक्रों की छवि एक घमंडी नेता के तौर पर बन रही है, जिसे सिर्फ अमीर लोगों के हितों की चिंता है। उनकी कैबिनेट में कई ऐसे टेक्नोक्रैट हैं जिनका जनता से कोई सीधा संपर्क नहीं रहा है। यही नहीं, उनकी पार्टी के ज्यादातर सांसदों का पहले कभी राजनीति में कोई अनुभव नहीं रहा। इसलिए भी उनके तौर तरीके पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था में फिट नहीं बैठते। सुधारों को तुंरत फुरत पास करके लागू किया जा रहा है। यानी पहले की तरह सुधारों पर व्यापक बहस नहीं हो रही है। इससे सुधारों को लागू करने की रफ्तार तेज तो हो गई है, लेकिन जनता के बीच यह संदेश भी गया है कि उसकी राय को तवज्जो नहीं दी जा रही है।

ऐसे में, माक्रों के प्रतिद्ंवद्वी ही नहीं, बल्कि कुछ सहयोगी भी उन्हें चेतावनी दे रहे हैं कि अगर मतदाताओं की बात नहीं सुनी गई तो 2022 के चुनाव में उन्हें धुर दक्षिणपंथी पार्टियों की तरफ जाने से कोई नहीं रोक सकता। लेकिन यूरोप और अंतरराष्ट्रीय मंच पर माक्रों का सितारा चमक रहा है। “नए यूरोप की उनकी अवधारणा” के लिए उन्हें जर्मन शहर आखेन में प्रतिष्ठित शार्लमान्ये पुरस्कार दिया गया है। माक्रों की तारीफ में जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल ने कहा, “उन्हें अच्छी तरह पता है कि कहां और कब यूरोप को सक्रियता दिखाने की जरूरत है और उनमें युवा यूरोपियनों को प्रेरित करने की क्षमता है।” यूरोपीय संघ के मंच पर माक्रों मैर्केल के सबसे अहम सहयोगी हैं। कई मुद्दों पर मतभेदों के बावजूद वे एक दूसरे की अहमियत को समझते हैं। अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच बढ़ती दूरियों के बीच यह साझेदारी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

हालांकि माक्रों जब अमेरिकी दौरे पर गए तो राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने उनके साथ नजदीकी दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। रूसी राष्ट्रपति पुतिन भी माक्रों के निमंत्रण पर पेरिस का दौरा कर चुके हैं। बाकी दुनिया के नेताओं के साथ साथ भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी उनकी कैमिस्ट्री अच्छी है। लेकिन यह अंतरराष्ट्रीय सक्रियता घरेलू मोर्चे पर उनके ज्यादा काम नहीं आएगी। उनकी लोकप्रियता को उन्हीं वादों के कसौटी पर मापा जाएगा, जो उन्होंने फ्रांस की जनता से किए हैं। सुधारों की प्रक्रिया में अगर जनता खुद को उपेक्षित महसूस करेगी तो अगले चुनाव में वह माक्रों का विकल्प तलाशेगी। निराशा के माहौल में जो भी जनता को उम्मीदें और सपने दिखाने में कामयाब हो जाता है, जनता उसकी के साथ हो जाती है। खतरा इस बात का है कि सोशलिस्ट और कंजरवेटिव पार्टियों से निराश मतदाता उग्र दक्षिणपंथ का रुख कर सकता है।

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