USA Tariff on India: अमेरिकी सीनेट ने रूस से पेट्रोलियम पदार्थ खरीदने वाले देशों के खिलाफ 100 फीसदी टैरिफ लगाने के कानून से संबंधित बिल को मंजूरी दे दी है। अमेरिका का तर्क है कि तेल के इस व्यापार की वजह से यूक्रेन युद्ध को बढ़ावा मिल रहा है और रूस को परोक्ष रुप से यूक्रेन के खिलाफ युद्ध लड़ने के लिए वित्तीय सहायता मिल रही है।
अमेरिकी सीनेट में पारित यह बिल 86-11 मतों से पारित हुआ और इसका नाम बदलकर लिंडसे. ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड एक्ट ऑफ 2026 कर दिया गया है, जो उस रिपब्लिकन सीनेटर के नाम पर है। जिन्होंने कीव की यात्रा के बाद 11 जुलाई को अपनी मृत्यु से पहले यह बिल तैयार किया था।
भारत के लिए क्यों हैं चिंता की बात?
अमेरिका द्वारा सीनेट में पारित ये नया बिल सीधे तौर पर भारत और चीन के लिए चिंता का सबब बन सकता है क्योंकि भारत और चीन दोनों ही रूसी तेल के बड़े खरीदार हैं। अगर यह टैरिफ लागू हुआ, तो भारत के अमेरिका निर्यात वाले व्यापार पर भारी खतरा मंडरा सकता है।
ट्रंप को मिली 5 देशों पर कार्रवाई की ताकत
अमेरिकी सीनेट में पारित कानून की वजह से अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उन 5 देशों के अमेरिकी आयात पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की ताकत मिली है, जो कि वर्तमान में रूसी तेल और गैस के सबसे बड़े खरीददार है। इसमें भारत, चीन, अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया का नाम शामिल है।
इसके अलावा सीनेट द्वारा पारित यह अधिनियम 1996 के ईरान प्रतिबंध अधिनियम की समाप्ति तिथि को भी 2031 तक बढ़ा देता है, जिसके तहत ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करने वाली कंपनियों को दंडित किया जाता है। इस बीच, विधेयक रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ-साथ रूसी कुलीन वर्ग, वरिष्ठ अधिकारियों और क्रेमलिन से जुड़े वित्तीय संस्थानों पर नए प्रतिबंध लगाता है।
इस विधेयक से स्वतः शुल्क लागू नहीं होते बल्कि राष्ट्रपति को शुल्क लगाने का विवेकाधीन अधिकार देता है, जिसका कार्यान्वयन अंतिम विधायी पाठ और कानून बनने के बाद कार्यकारी निर्णयों पर निर्भर करेगा।
अमेरिका के निशाने पर क्यों है भारत?
अमेरिका के इस कानून का भारत की अर्थव्यवस्था पर बड़ा नुकसान हो सकता है। 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजारों में आए बदलावों के बाद से भारत रियायती रूसी कच्चे तेल के दुनिया के सबसे बड़े खरीदारों में से एक बनकर उभरा है। इस बदलाव ने भारतीय रिफाइनरियों को लागत नियंत्रित करने और स्थिर ईंधन आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद की है।
पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजरानी बाधित होने के बाद यह निर्भरता और भी गहरी हो गई, जिससे भारतीय रिफाइनरियों को विकल्प के रूप में रूसी तेल पर अधिक निर्भर होना पड़ा। अगस्त 2025 में, वाशिंगटन ने रूसी तेल खरीद के विरोध में भारतीय वस्तुओं पर पहले ही 25 प्रतिशत का अतिरिक्त शुल्क लगा दिया था, जिससे कुछ भारतीय निर्यातों पर कुल शुल्क 50 प्रतिशत तक पहुंच गया था।
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अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव एक बार फिर तेज हो गया है। अमेरिका की ओर से नए व्यापारिक प्रतिबंध और टैरिफ लागू किए जाने के बाद चीन ने भी कड़ा जवाब दिया है। बुधवार को बीजिंग ने छह अमेरिकी कंपनियों को अपनी प्रतिबंध सूची (ब्लैकलिस्ट) में डालने के साथ ही अमेरिका को भेजे जाने वाले ड्रोन, उनके अहम पुर्जों और उनसे जुड़ी तकनीक के निर्यात पर सख्त नियंत्रण लगाने की घोषणा की। पढ़िए पूरी खबर…
