ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल युद्ध रविवार को 100वें दिन में पहुंच गया। अभी तक कोई विजेता नहीं है और न ही युद्ध के खत्म होने के कोई आसार दिख रहे हैं। अमेरिका का खर्च अरबों डॉलर तक पहुंच गया है। युद्ध की शुरुआत में अमेरिका-इजरायल के हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद एक क्षेत्रीय संघर्ष शुरू हो गया। इसमें लेबनान और खाड़ी के देश शामिल हो गए।
भारत ने अभी तक कूटनीतिक रूप से तटस्थ रुख अपनाया है, पर इसका सीधा असर पड़ा है। 3 जून को कुवैत इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर ईरानी ड्रोन हमले में एक भारतीय नागरिक की मौत हो गई। खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों को लगातार सुरक्षा जोखिम का सामना करना पड़ रहा है और होर्मुज जलमार्ग से आने वाले कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं।
100 दिनों का यह पड़ाव कूटनीतिक गतिरोध के बीच आया है। ईरान ने 7 अप्रैल को पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुए युद्धविराम को आगे बढ़ाने के बारे में अमेरिकी मध्यस्थों से बातचीत बंद कर दी है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 3 जून को 215-208 मतों से राष्ट्रपति ट्र्रंप के युद्ध जारी रखने के अधिकार को सीमित करने के लिए मतदान किया। वाशिंगटन की मध्यस्थता से हुए इजरायल-लेबनान युद्धविराम के बावजूद इजरायल लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ सक्रिय हमले कर रहा है।
अमेरिका को छह दिनों में 11.3 अरब डॉलर का नुकसान हुआ
इस युद्ध में लेबनान में कम से कम 3500 लोग मारे गए हैं, 10 लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं, 29 इजरायली सैनिक और तीन इजरायली नागरिकों की मौत हुई है। कुवैत में कम से कम एक भारतीय नागरिक की मौत हुई है और अकेले पहले छह दिनों में अमेरिका को अनुमानित 11.3 अरब डॉलर का नुकसान हुआ है। अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ डेमोक्रेट नेताओं ने कहा है कि ईरान में युद्ध की लागत वाशिंगटन को 630 अरब डॉलर से लेकर 1 ट्रिलियन डॉलर तक होगी। तेल आपूर्ति में बाधा के कारण ईंधन की लागत में ही अरबों डॉलर की ज्यादा बढ़ोतरी हुई है।
क्या शांति वार्ता आगे बढ़ रही है?
अमेरिका और ईरान के बीच किसी समझौते तक पहुंचने की कोशिशें रुकी हुई हैं। पहले हुई बातचीत में युद्धविराम को आगे बढ़ाने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर नए सिरे से बातचीत की संभावना दिखी थी। हालांकि, जब वॉशिंगटन ने प्रस्तावित शर्तों में बदलाव की मांग की, तो बातचीत की रफ्तार धीमी पड़ गई।
ईरान का रुख: ‘अब फैसला ट्रंप को करना है’
ईरान ने साफ कर दिया है कि आगे बढ़ने से पहले वह कुछ रियायतें चाहता है। ईरान के नेतृत्व के एक सीनियर सलाहकार ने कहा कि “अब फैसला ट्रंप को करना है।” उन्होंने अरबों डॉलर की फ्रीज की गई संपत्तियों की रिहाई जैसी मांगों की ओर इशारा किया। तेहरान ने किसी भी समझौते को क्षेत्र में, विशेष रूप से लेबनान में, व्यापक युद्धविराम से भी जोड़ा है।
डोनाल्ड ट्रंप ने क्या कहा?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रगति की कमी को कम करके आंका है, उनका कहना है कि अमेरिका को बड़ी सफलता मिल रही है और उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करने की स्थिति में नहीं है। साथ ही, उन्होंने रुकी हुई वार्ताओं को लेकर कोई खास तत्परता नहीं दिखाई है, जिससे यह संकेत मिलता है कि वार्ताओं की गति धीमी हो गई है।
कौन आगे बढ़ रहा है?
इस संघर्ष में अभी तक कोई स्पष्ट विजेता सामने नहीं आया है। अमेरिका और उसके सहयोगियों ने ईरान के सैन्य ठिकानों और परमाणु-संबंधी सुविधाओं को निशाना बनाकर हमले किए हैं। इन ऑपरेशन्स का मकसद ईरान की क्षमताओं को कम करना और उसे बातचीत के लिए मजबूर करना था।
हालांकि, ईरान ने सीधे और परोक्ष, दोनों तरीकों से जवाब देना जारी रखा है। उसके क्षेत्रीय सहयोगियों, खासकर लेबनान में हिज्बुल्लाह ने सीमा पार हमलों के जरिये इजरायल पर दबाव बनाए रखा है। इससे यह सुनिश्चित हुआ है कि संघर्ष कई मोर्चों पर जारी रहे। सैन्य स्तर पर कोई निर्णायक नतीजा न निकलने के कारण ऐसी स्थिति बन गई है जहां दोनों पक्ष सीमित सफलता का दावा तो करते हैं, लेकिन उन्हें लगातार जोखिमों का सामना भी करना पड़ रहा है। यह संघर्ष अब जल्दी जीत हासिल करने के बजाय लंबे समय तक टिके रहने की लड़ाई बन गया है।
होर्मुज जलमार्ग ने इस संकट को कैसे प्रभावित किया?
इस टकराव में होर्मुज जलमार्ग सबसे संवेदनशील जगहों में से एक बना हुआ है। यह संकरा जलमार्ग दुनिया भर में तेल की ढुलाई के लिए एक अहम रास्ता है और इसमें किसी भी तरह की रुकावट का असर तुरंत एनर्जी मार्केट पर पड़ता है। ईरान का कहना है कि इस जलमार्ग पर ओमान के साथ उसका साझा नियंत्रण है, जबकि इलाके में सैन्य गतिविधियों ने शिपिंग पर असर डाला है। एक तरह की नाकेबंदी और नौसेना की बढ़ती मौजूदगी ने व्यापारियों और शिपिंग कंपनियों के लिए अनिश्चितता पैदा कर दी है।
इस टकराव के दौरान तेल की कीमतें उतार-चढ़ाव वाली रही हैं। सप्लाई में रुकावट की आशंकाओं के कारण कीमतें कई बार $100 प्रति बैरल के पार भी चली गईं। हालांकि, जब संभावित युद्धविराम या बातचीत की खबरें आईं, तो कीमतों में गिरावट भी देखी गई। ट्रंप ने ऊर्जा की बढ़ती कीमतों को लेकर जताई जा रही चिंताओं को कम करके आंका है। उनका कहना है कि कीमतें उस बहुत ऊंचे स्तर तक नहीं पहुंची हैं, जिसकी भविष्यवाणी टकराव की शुरुआत में कुछ लोगों ने की थी।
इसमें लेबनान क्या भूमिका निभा रहा है?
लेबनान इस बड़े संघर्ष का एक अहम मोर्चा बन गया है। युद्धविराम की बार-बार कोशिशों के बावजूद इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच लड़ाई जारी है। हिज्बुल्लाह ने सशर्त युद्धविराम के प्रस्तावों को ठुकरा दिया है। उसका कहना है कि किसी भी समझौते में इजरायल की पूरी वापसी और हमलों को पूरी तरह रोकना शामिल होना चाहिए। वहीं, दक्षिणी लेबनान के कुछ हिस्सों में इजरायल के ऑपरेशन जारी हैं।
ईरान ने अमेरिका के साथ अपनी बातचीत में हो रही प्रगति को लेबनान के घटनाक्रम से जोड़ दिया है, जिससे स्थिति और जटिल हो गई है। लेबनान में संघर्ष-विराम को अब किसी व्यापक क्षेत्रीय समझौते की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है। पहले हुए संघर्ष-विराम समझौतों का बार-बार उल्लंघन होने से भरोसा कम हुआ है और बातचीत और मुश्किल हो गई है।
खाड़ी देशों पर क्या असर पड़ रहा है?
खाड़ी क्षेत्र के देश इस संघर्ष से प्रभावित हुए हैं, भले ही वे सीधे तौर पर लड़ाई में शामिल नहीं हैं। मिसाइल और ड्रोन हमलों ने इस क्षेत्र के कुछ हिस्सों में बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया है, जिससे सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ गई हैं। सुरक्षा जोखिमों के कारण उड़ानों को रद्द या उनके रास्ते बदलने से हवाई यात्रा बाधित हुई है। व्यापारिक मार्ग भी प्रभावित हुए हैं, खासकर वे जो होर्मुज जलमार्ग से जुड़े हैं।
आर्थिक असर अब साफ दिखाई देने लगा है। ईंधन की बढ़ती कीमतें, सप्लाई चेन में रुकावट और बाजारों में अनिश्चितता ने क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ा दिया है। इंफ्रास्ट्रक्चर को हुए कुछ नुकसान, खासकर एनर्जी सेक्टर में, को ठीक होने में कई साल लगने की उम्मीद है।
आगे क्या होगा?
जैसे-जैसे यह टकराव 100 दिनों के पड़ाव के करीब पहुंच रहा है, समाधान का कोई स्पष्ट रास्ता अभी भी नहीं दिख रहा है। बातचीत को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है और ऐसा लगता है कि दोनों ही पक्ष किसी समझौते के लिए जरूरी समझौते करने को तैयार नहीं हैं। सैन्य गतिविधियां कम स्तर पर जारी हैं, लेकिन तनाव बढ़ने का खतरा बना हुआ है। इस क्षेत्र में कई पक्षों की भागीदारी ने स्थिति को संभालना और मुश्किल बना दिया है।
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