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मोदी सरकार के फैसलों पर अमेरिका के टॉप वैज्ञानिक ने उठाए सवाल, कहा- भारत में कोरोना खत्म होने की गलत धारणा बनाई गई

जब फौची से पूछा गया कि अमेरिका भारत के प्रकोप से क्या सीख सकता है, तो उन्होंने कहा, “सबसे महत्वपूर्ण चीज यह है कि स्थिति को कभी कम नहीं आंके।”

Edited By कीर्तिवर्धन मिश्र वॉशिंगटन | Updated: May 12, 2021 2:46 PM
भारत में मार्च के बाद से कोरोना के केसों में आया जबरदस्त उछाल। (एक्सप्रेस फोटो- अमित चक्रवर्ती)

अमेरिका के शीर्ष संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ एंथनी फौची ने अमेरिकी सांसदों से कहा कि भारत ने “गलत धारणा” बनाई कि वहां कोविड-19 वैश्विक महामारी का प्रकोप समाप्त हो गया है और समय से पहले देश को खोल दिया जिससे वह ऐसे “गंभीर संकट” में फंस गया है। भारत कोरोना वायरस की अभूतपूर्व दूसरी लहर से बुरी तरह प्रभावित है और कई राज्यों में अस्पताल स्वास्थ्य कर्मियों, टीकों, ऑक्सीजन, दवाओं और बिस्तरों की कमी से जूझ रहे हैं।

फौची ने कोविड-19 प्रतिक्रिया पर मंगलवार को सुनवाई के दौरान सीनेट की स्वास्थ्य, शिक्षा, श्रम एवं पेंशन समिति से कहा, “भारत अभी जिस गंभीर संकट में है उसकी वजह यह है कि वहां वास्तविक इजाफा था और उन्होंने गलत धारणा बनाई कि वहां यह समाप्त हो गया है। और हुआ क्या, उन्होंने समय से पहले सब खोल दिया और अब ऐसा चरम वहां देखने को मिल रहा है जिससे हम सब अवगत है कि वह कितना विनाशकारी है।”

डॉ फौची अमेरिका के ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शस डिजीजेज’ (एनआईएआईडी) के निदेशक हैं और राष्ट्रपति जो बाइडन के मुख्य चिकित्सा सलाहकार भी हैं। सुनवाई की अध्यक्षता कर रही, सीनेटर पैटी मुर्रे ने कहा कि भारत में हाहाकार मचा रही कोविड-19 की लहर इस बात की दर्दनाक याद दिलाती है कि अमेरिकी यहां तब तक वैश्विक महामारी को समाप्त नहीं कर सकते जब तक कि यह सब जगह समाप्त न हो जाए।

उन्होंने कहा, “मुझे खुशी है कि बाइडन प्रशासन विश्व स्वास्थ्य संगठन में फिर से शामिल होकर वैश्विक लड़ाई का नेतृत्व कर रहा है और चार जुलाई तक छह करोड़ एस्ट्राजेनेका टीके दूसरे देशों को देने की प्रतिबद्धता जताकर वैश्विक टीकाकरण प्रयासों का वित्तपोषण कर रहा है।” मुर्रे ने कहा, “भारत का प्रकोप इस वैश्विक महामारी तथा भविष्य के प्रकोपों के प्रति उचित प्रतिक्रिया देने के लिए अमेरिका में मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे की जरूरत को रेखांकित करता है।”

अमेरिका भारत के प्रकोप से क्या सीख सकता है इसपर फौची ने कहा, “सबसे महत्वपूर्ण चीज यह है कि स्थिति को कभी कम नहीं आंके।” उन्होंने कहा, “दूसरी चीज जन स्वास्थ्य के संबंध में तैयारी है, तैयारी जो भविष्य की महामारियों के लिए हमें करनी है कि हमें स्थानीय जन स्वास्थ्य अवसंरचनाओं के निर्माण को जारी रखने की जरूरत है।”

फौची ने कहा कि एक और सबक जो हमें सीखने की जरूरत है कि यह वैश्विक महामारी है जिसे वैश्विक प्रतिक्रिया की जरूरत है और हर किसी को जिम्मेदारी की तरफ ध्यान देना होगा कि यह सिर्फ अपने देश के प्रति नहीं है बल्कि दूसरे देशों के साथ शामिल होने की भी जरूरत है ताकि हम हस्तक्षेप कर सकें खासकर टीकों के लिहाज से।

उन्होंन कहा, “क्योंकि अगर दुनिया के किसी भी हिस्से में वायरस का प्रकोप जारी रहता है तो यहां अमेरिका में भी उसका खतरा है खासकर वायरस के अन्य प्रकारों का और आप जानते हैं कि भारत में एक प्रकार है जो नया प्रकार है..इसलिए ये कुछ सबक हैं जो भारत में जारी स्थिति को देखकर लिए जा सकते हैं।”

सीनेटर मुर्रे ने कहा कि भारत में घातक प्रकोप इस बात की याद दिलाता है कि क्या हो सकता है अगर वायरस के प्रसार पर लगाम न लगाई जाए तो, जब यह ज्यादा संक्रामक रूप ले ले, ज्यादा घातक किस्में तैयार हो जाएं और जब यह स्वास्थ्य ढांचों पर अत्यधिक दबाव डाल दे।

इस बीच, रोग नियंत्रण एवं बचाव केंद्र (सीडीसी) के आंकड़ों के मुताबिक देश की 58 प्रतिशत आबादी को टीके की पहली खुराक और करीब 46 प्रतिशत आबादी को दूसरी खुराक दी जा चुकी है। वहीं, 34 प्रतिशत अमेरिकी आबादी को पूरी तरह टीका लग चुका है। इससे पहले फौची ने अनुमान जताया था कि देश को पूरी तरह सुरक्षित होने के लिए 70 से 85 प्रतिशत आबादी में रोग प्रतिरक्षा उत्पन्न करने यानि टीका लगाने की जरूरत है।

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