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रक्षा साझेदारी पर भारत-अमेरिका का अहम करार, संयुक्त अभियानों की दक्षता में होगा इजाफा

दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे की सुविधाओं व ठिकानों का उपकरणों की मरम्मत व आपूर्ति को सुचारु बनाए रखने के लिए उपयोग कर सकेंगे।

वाशिंगटन | August 30, 2016 11:38 PM
लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट के दौरान रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर

भारत और अमेरिका ने द्विपक्षीय सामरिक रिश्तों को बढ़ावा देते हुए एक विशद साजो-सामान आदान प्रदान करार पर दस्तखत किए हैं जिससे दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे की सुविधाओं व ठिकानों का उपकरणों की मरम्मत व आपूर्ति को सुचारु बनाए रखने के लिए उपयोग कर सकेंगे। इससे उनके संयुक्त अभियानों की दक्षता में इजाफा होगा। रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर और अमेरिकी रक्षा मंत्री एश्टन कार्टर ने साजो-सामान आदान प्रदान सहमति करार (एलईएमओए)पर दस्तखत किए। उन्होंने कहा कि इससे व्यावहारिक संबंध और आदान-प्रदान के लिए अवसर का सृजन होगा। एलईएमओए से भारत और अमेरिका के बीच साजो-सामान सहयोग, आपूर्ति व सेवाओं का उसकी पुन:पूर्ति के आधार पर प्रावधान होगा और उन्हें संचालित करने के लिए एक प्रारूप भी मुहैया कराया जाएगा।

इसमें खाना, पानी, वस्त्र, परिवहन, पेट्रोलियम, तेल, लुब्रिकेंट, परिधान, चिकित्सा सेवाएं, कलपुर्जे व उपकरण, मरम्मत व देखभाल सेवाएं, प्रशिक्षण सेवाएं व अन्य साजोसामान की वस्तुएं और सेवाएं शामिल हैं। करार पर दस्तखत होने के बाद एक संयुक्त बयान में कहा गया, ‘वे इस तंत्र पर सहमत हुए कि इस प्रारूप से रक्षा प्रौद्योगिकी और व्यापार सहयोग में अभिनव व आधुनिक अवसरों के मौके मिलने में सुविधा होगी। अमेरिका अपने स्तर पर भारत के साथ रक्षा व्यापार व प्रौद्योगिकी को बढ़ाने पर सहमत हुआ है और यह भारत को उस स्तर के बराबर ले जाएगा जो उसके नजदीकी सहयोगी व भागीदारों को प्राप्त है।

बयान के अनुसार दोनों देशों के बीच के रक्षा संबंध उनके साझा मूल्यों और हितों व वैश्विक शांति व सुरक्षा के प्रति उनकी स्थायी प्रतिबद्धता पर आधारित हैं। पर्रीकर ने कार्टर के साथ एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में स्पष्ट किया कि समझौते में भारत में किसी तरह का सैन्य अड्डा या किसी तरह की गतिविधि का कोई प्रावधान नहीं है। इससे पहले दोनों नेताओं ने पेंटागन में बातचीत की। पर्रीकर ने संवाददाताओं से कहा, समझौते का सैन्य अड्डा स्थापना से कुछ लेना देना नहीं है। यह मूल रूप से एक-दूसरे के बेड़े के लिए साजो-सामान सहयोग को लेकर है जैसे र्इंधन आपूर्ति, संयुक्त अभियानों, मानवीय सहायता अन्य राहत अभियानों के लिए जरूरी अन्य चीजों की आपूर्ति। उन्होंने कहा, इसलिए यह सुनिश्चित करेगा कि दोनों नौसेनाएं उन संयुक्त अभियानों और अभ्यासों में एक-दूसरे की सहयोगी हों जो हम करते हैं। अमेरिकी रक्षा मंत्री कार्टर ने कहा कि यह समझौता दोनों देशों को साथ लाने में सहायक बनाएगा। उन्होंने कहा कि समझौता दोनों सेनाओं के बीच संयुक्त अभियानों को साजो-सामान के हिसाब से आसान और कुशल बनाएगा। उन्होंने कहा, यह पूरी तरह से परस्पर है। अन्य शब्दों में हम एक-दूसरे को इस समझौते के तहत पूरी तरह से समान व आसान पहुंच मुहैया कराते हैं। यह किसी तरह का आधार समझौता नहीं है, लेकिन यह संयुक्त अभियानों के प्रचालन तंत्र को अधिक आसान व कुशल बनाता है।

पर्रीकर ने यह भी संकेत दिया कि भारत को उन दो अन्य मूलभूत समझौतों पर हस्ताक्षर करने की कोई जल्दबाजी नहीं है जिस पर अमेरिका कई वर्षों से जोर दे रहा है।
दो मूलभूत समझौतों-कम्युनिकेशंस एंड इंफॉर्मेशन सिक्योरिटी मेमोरेंडम आॅफ एग्रीमेंट (सीआइएसएमओए), बेसिक एक्सचेंज एंड कोआॅपरेशन एग्रीमेंट (बीईसीए) फॉर जियोस्पेशियल इंटेलिजेंस का भविष्य उन चार मूलभूत समझौतों का हिस्सा हैं जिस पर अमेरिका भारत के साथ अपने रक्षा संबंधों को बढ़ाने के अपने प्रयासों के तहत एक दशक से अधिक समय से जोर दे रहा है। चार समझौतों में से जनरल सिक्योरिटी आॅफ मिलिट्री इंफॉर्मेशन एग्रीमेंट (जीएसओएमआइए) पर 2002 में दस्तखत हुए थे जबकि साजो-सामान आदान-प्रदान सहमति करार (एलईएमओए) पर दस्तखत सोमवार को किए गए।

एलईएमओए जरूरी सहयोग जुटाने का एक अतिरिक्त माध्यम मुहैया कराता है और इसमें मामलो के आधार पर दोनों देशों की मंजूरी जरूरी है। उदाहरण के लिए अमेरिका के साथ किसी द्विपक्षीय अभ्यास के दौरान हिस्सा लेने वाले देश की इकाई को अपने उपकरण के लिए र्इंधन की जरूरत हो। इकाई तब तक खरीद नहीं कर सकती जब तक कि वह सीधा और तत्काल भुगतान नहीं करती। कार्टर ने कहा कि एलईएमओए समझौते के तहत र्इंधन का मूल्य और उसके भुगतान की शर्तें पहले से तय होंगी और जरूरी नहीं कि यह भुगतान नकद में ही किया जाए। कार्टर ने कहा कि भारत का ‘एक प्रमुख रक्षा साझेदार’ के तौर पर ओहदा अमेरिका को उसके साथ सहयोग करने की इजाजत देगा। यह सहयोग सामरिक और प्रौद्योगिकीय डोमेन में होगा और यह सहयोग अमेरिका के नजदीकी व सबसे दीर्घकालिक सहयोगियों के बराबर होगा।

कार्टर ने कहा, प्रमुख रक्षा साझेदारी समझौते के हिसाब से यह एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन है। यह 50 साल के इतिहास के हिसाब से एक बड़ा बदलाव है। यह महज कुछ महीने पहले के समय की तुलना में एक बड़ी प्रगति है। बीते जून में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका यात्रा के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मुलाकात की थी, तब अमेरिका ने भारत को एक ‘बड़े रक्षा साझेदार’ का दर्जा दिया था। कार्टर ने कहा, भारत सरकार ने आज की हमारी बैठक से पहले हमें एक बहुत लंबा, विस्तृत और रचनात्मक दस्तावेज भेजा, जिसमें यह बताया गया था कि प्रमुख रक्षा साझेदारी समझौते को कैसे लागू किया जाए। प्रमुख रक्षा साझेदारी को लागू करने के लिए यह एक शानदार आधार है।’ उन्होंने कहा कि प्रमुख रक्षा सहयोगी के दर्जे ने उन पुराने अवरोधकों को ‘तोड़’ दिया है, जो रक्षा, रणनीतिक सहयोग के आड़े आते थे, जिसमें रणनीतिक सहयोग में सह-उत्पादन, सह-विकास परियोजनाएं और अभ्यास शामिल हैं। पर्रीकर ने कहा कि अमेरिका रक्षा उपकरणों के भारत के प्राथमिक स्रोतों में से एक है और उसने अपने कई अहम मंचों को साझा किया है। उन्होंने कहा कि वह बड़ी सहयोगी परियोजनाओं के लिए इसे आगे ले जाना चाहेंगे। उन्होंने कहा कि दोनों नेताओं ने रक्षा प्रौद्योगिकी व व्यापार पहल (डीटीटीआई) का दायरा और गतिविधियों को महत्त्वपूर्ण ढंग से विस्तार देने का फैसला किया। कार्टर ने कहा कि यह दर्जा दरअसल अमेरिका और भारत के पिछले साल के रक्षा संबंध के मसौदे की सफलता पर आधारित है।

इस बीच चीन ने भारत और अमेरिका के बीच रक्षा साजो सामान समझौते को ‘सामान्य सहयोग’ बताते हुए इसे ज्यादा तवज्जो नहीं दी है हालांकि इसके सरकारी मीडिया ने चेतावनी दी है कि अमेरिकी गठबंधन में शामिल होने की भारत की कोशिशों से चीन, पाकिस्तान या यहां तक कि रूस भी खीझ सकता है, जिससे भारत रणनीतिक परेशानी में पड़ सकता है। चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने भारत और अमेरिका के बीच हस्ताक्षर किए गए ‘लॉजिस्टिक एक्सचेंज मेमोरेंडम आॅफ एग्रीमेंट’ (एलईएमओए) के बारे में एक जवाब में कहा, हमने प्रासंगिक रिपोर्ट का जिक्र किया है। आशा करते हें कि भारत और अमेरिका के बीच यह सहयोग क्षेत्र में स्थिरता और विकास को बढ़ावा देने का काम करेगा।

आतंकपर अंकुश के लिए सहयोग पर जोर

भारत और अमेरिका ने मंगलवार को पाकिस्तान से पैदा आतंकवाद और रणनीतिक महत्त्व के अन्य मुद्दों के साथ-साथ नई दिल्ली के साथ वाणिज्यिक हितों पर चर्चा की। इसमें कहा गया कि आतंकवाद निरोध के क्षेत्र में काफी कुछ किए जाने की गुंजाइश है। दूसरे भारत-अमेरिका रणनीतिक और वाणिज्यिक वार्ता (एसएंडसीडी) के दौरान दोनों पक्षों ने ऊर्जा और व्यापार व कारोबार के अहम क्षेत्र में सहयोग को बढ़ाने के उपायों पर भी चर्चा की। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने एच 1 बी और एल 1 वीजा के लिए हाल में शुल्क में की गई वृद्धि और टोटलाइजेशन के मुद्दे के उचित और गैर-भेदभावपूर्ण समाधान की वकालत की। कहा कि यह हमारे संबंधों के लिए शक्ति का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
वार्ता की सह अध्यक्षता सुषमास्वराज और वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ-साथ अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी और अमेरिकी वाणिज्य मंत्री पेनी प्रित्जकर ने की। सह अध्यक्षों के साथ उच्चस्तरीय इंटर-एजंसी प्रतिनिधिमंडल भी था। अपनी शुरुआती टिप्पणी में स्वराज ने आतंकवाद निरोध के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा, काफी कुछ किए जाने की गुंजाइश है। उन्होंने द्विपक्षीय वाणिज्यिक संबंधों को बढ़ाने के दौरान कंपनियों की आकांक्षाओं और हितों का खयाल रखने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
अपनी तरफ से केरी ने गौर किया कि दोनों देशों ने रक्षा, ऊर्जा और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में अपने सहयोग को प्रगाढ़ किया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका साइबर ढांचे को अंतिम रूप देने को उत्सुक है, जो दोनों देशों की नए वैश्विक साइबर खतरों से रक्षा में मदद करेगा। उन्होंने साथ ही कहा कि अमेरिका चाहेगा कि उसका भारत के साथ असैन्य परमाणु सहयोग रिएक्टरों को स्थापित करने में साकार हो, जो भारतीय घरों में भरोसेमंद बिजली आपूर्ति करेगा। वाणिज्यिक मोर्चे पर व्यापार करने को आसान बनाना और वीजा व्यवस्था समेत व्यापारिक संबंधों के अन्य पहलुओं पर चर्चा की गई।

पेरिस समझौते के कार्यान्वयन के लिए भारत की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए उन्होंने कहा कि सरकार समझौते के हमारे अनुमोदन के लिए समय-सीमा को कम करने के लिए घरेलू स्तर पर कदम उठा रही है। उन्होंने कहा, हम उम्मीद करते हैं कि अगली अमेरिकी सरकार पेरिस समझौते का उसी गंभीरता और मकसद के साथ समर्थन करेगी जैसा आपने किया है और विकसित देशों से 100 अरब डॉलर प्रतिवर्ष जुटाने के लक्ष्य को अमेरिकी सरकार के दृढ़ समर्थन से पूरा किया जाएगा। स्वराज ने स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ाने की आवश्यकता पर भी चर्चा की, जो जीवाश्म ईंधन से इतर नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ने को हमारे लिए उपयुक्त बनाएगा और हमारे महत्त्वाकांक्षी जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने में मदद करेगा।

स्वराज ने कहा कि तेजी से उभरते क्षेत्रीय और वैश्विक हालात में भारत अफगानिस्तान के साथ त्रिपक्षीय बैठक, अफ्रीका पर विचार-विमर्श और बहुपक्षीय मुद्दों को इस साल के भीतर बहाल करने को उत्सुक है। उन्होंने कहा कि भारत की बढ़ी हुई वैश्विक भूमिका पारस्परिक हित में है। भारत अमेरिका के साथ करीब से काम करना जारी रखने को उत्सुक हैं। उन्होंने रक्षा सहयोग को सह-उत्पादन और सह-विकास के अगले चरण में विस्तारित करने पर भी जोर दिया।स्वराज ने कहा, इसके लिए, हमें जून में प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान अमेरिका के बड़े रक्षा भागीदार का भारत को दिए गए दर्जे से जुड़े लाभों को परिभाषित करने की आवश्यकता है। यह भारत और अमेरिका के बीच रक्षा उद्योग सहयोग को बढ़ावा देगा और क्षेत्र में सुरक्षा के सकल प्रदाता के रूप में वांछित भूमिका निभाने में भारत की मदद करेगा। यह भी कहा कि दोनों पक्ष भारत-अमेरिका साइबर संबंध के लिए ढांचे को पूरा करने में सक्षम रहे हैं। यह भारत और अमेरिका दोनों के लिए किसी और देश के साथ अपनी तरह का पहला सहयोग है।

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