अमेरिका और ईरान के बीच सहमति नहीं बन पा रही है। युद्धविराम जरूर जारी है, लेकिन आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी लगातार देखने को मिल रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि ईरान झुकने को तैयार नहीं है। तमाम धमकियों के बावजूद वह अपने रुख पर कायम है।

पाकिस्तान भी मध्यस्थ बनने की कोशिश कर रहा है और दोनों देशों से लगातार बातचीत कर रहा है, लेकिन अंत में अमेरिका और ईरान को ही किसी साझा सहमति पर पहुंचना होगा। फिलहाल कुछ बड़े मुद्दे ऐसे हैं जिनकी वजह से समझौता नहीं हो पा रहा और एक बार फिर युद्ध की आशंका बनी हुई है।

चिंता नंबर 1: ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम

अमेरिका चाहता है कि ईरान किसी भी कीमत पर अपना न्यूक्लियर एनरिचमेंट प्रोग्राम छोड़ दे। वहीं ईरान इसे अपनी संप्रभुता और सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा मानता है, इसलिए वह पीछे हटने को तैयार नहीं है।

अमेरिका की मांग है कि ईरान अपना न्यूक्लियर मटेरियल उसे सौंप दे। लेकिन ईरान अपने 60 फीसदी तक समृद्ध यूरेनियम को देने के लिए तैयार नहीं है। माना जाता है कि इससे कम से कम 10 परमाणु हथियार बनाए जा सकते हैं।

इसके अलावा अमेरिका चाहता है कि ईरान 20 साल तक अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम बंद रखे, जबकि ईरान सिर्फ 5 साल के लिए तैयार है। ऐसे में दोनों के बीच सहमति नहीं बन पा रही है। हालांकि जानकार मानते हैं कि अगर दोनों पक्ष थोड़ा झुकें तो 10 साल का फॉर्मूला निकल सकता है।

चिंता नंबर 2: प्रतिबंध हटेंगे या नहीं

ईरान चाहता है कि उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाएं। उसके करीब 100 बिलियन डॉलर के फ्रोजन एसेट्स अमेरिका, यूरोप और कतर जैसे देशों में फंसे हुए हैं जिन्हें वह तुरंत जारी करवाना चाहता है।

लेकिन अमेरिका का रुख साफ है, पहले ईरान को अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम पर पीछे हटना होगा। इन प्रतिबंधों की वजह से ईरान की अर्थव्यवस्था को गहरा झटका लगा है। हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शनों में भी आर्थिक संकट एक बड़ा कारण रहा। ईरान मानता है कि जब तक प्रतिबंध नहीं हटेंगे, तब तक उसकी अर्थव्यवस्था का पटरी पर लौटना मुश्किल होगा।

चिंता नंबर 3: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का भविष्य

इस टकराव में अगर कोई सबसे अहम बिंदु है तो वह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ है। पहले रोजाना करीब 150 जहाज इस रास्ते से गुजरते थे, लेकिन हाल के हफ्तों में यह संख्या काफी कम हो गई है। इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। ऐसे में इस समुद्री मार्ग का खुला रहना बेहद जरूरी है। ईरान को भी इससे राजस्व का नुकसान हो रहा है।

अगर न्यूक्लियर प्रोग्राम और प्रतिबंध जैसे मुद्दों पर सहमति बनती है तो इस मार्ग को पूरी तरह खोलना संभव हो सकता है जिससे वैश्विक व्यापार को राहत मिलेगी।

चिंता नंबर 4: ईरान में कट्टरपंथी नेतृत्व

ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के बाद देश में नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता और बढ़ी है। मौजूदा सत्ता में कई ऐसे नेता हैं जिन्हें ज्यादा कट्टरपंथी माना जाता है। इन नेताओं का अमेरिका के साथ टकराव में अहम योगदान है। ऐसे में अमेरिका के लिए यह तय करना चुनौतीपूर्ण होगा कि वह किस नेतृत्व के साथ और किस स्तर पर बातचीत करे।

चिंता नंबर 5: स्थानीय खिलाड़ियों की भूमिका

ईरान-इजरायल तनाव में पाकिस्तान सीधे तौर पर शामिल नहीं है, लेकिन मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर अमेरिका और ईरान दोनों से बातचीत कर रहे हैं। वहीं, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उप प्रधानमंत्री इशक डार भी कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय हैं। पाकिस्तान के सामने चुनौती है कि वह दोनों देशों को एक साझा मंच पर कैसे लाए।

चिंता नंबर 6: भारत की रणनीति

भारत लंबे समय से खाड़ी क्षेत्र में शांति चाहता है, लेकिन फिलहाल वह इस संघर्ष में सक्रिय भूमिका नहीं निभा रहा है। अमेरिका इस समय पाकिस्तान के साथ ज्यादा संवाद कर रहा है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि नई दिल्ली को अपनी रणनीति स्पष्ट रखनी चाहिए। भले ही इस समय पाकिस्तान को श्रेय मिल रहा हो, लेकिन भारत को शांति के प्रयासों का समर्थन जारी रखना चाहिए क्योंकि खाड़ी क्षेत्र में भारत के लाखों नागरिक रहते हैं और वहां की स्थिरता भारत के हित में है।

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