ताज़ा खबर
 

जर्मनी में सरकार बनाने पर हुई डील, लेकिन घमासान जारी

आम चुनावों के साढ़े चार महीने बाद जर्मनी में आखिराकर नई सरकार बनाने का रास्ता साफ हो गया है। बड़ी माथापच्ची करनी पड़ी, तब कहीं जाकर डील हुई। यानी चांसलर अंगेला मैर्केल की सीडीयू-सीएसयू और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी एसपीडी के बीच नई सरकार बनाने को लेकर समझौता हो गया है।

जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल। (REUTERS PIC)

आम चुनावों के साढ़े चार महीने बाद जर्मनी में आखिराकर नई सरकार बनाने का रास्ता साफ हो गया है। बड़ी माथापच्ची करनी पड़ी, तब कहीं जाकर डील हुई। यानी चांसलर अंगेला मैर्केल की सीडीयू-सीएसयू और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी एसपीडी के बीच नई सरकार बनाने को लेकर समझौता हो गया है। दोनों जर्मनी की सबसे बड़ी पार्टियां हैं, इसलिए उनके गठबंधन को महागठबंधन कहा जाता है। यानी यह कुछ ऐसी बात है जैसे चुनाव के बाद भारत में बीजेपी और कांग्रेस सरकार बनाने के लिए आपस में गठबंधन कर लें। सीडीयू और एसपीडी को मिले वोट भी लगभग उतने ही हैं जितने 2014 के आम चुनावों में बीजेपी और कांग्रेस को मिले। बीजेपी को जहां 31.34 वोट मिले थे, वहीं कांग्रेस को 19.52 प्रतिशत वोटों पर संतोष करना पड़ा था। सितंबर 2017 के जर्मन आम चुनावों में सीडीयू को लगभग 33 प्रतिशत और एसपीडी को 20.5 प्रतिशत वोट मिले। लेकिन भारत और जर्मनी की राजनीति की समानता ज्यादा दूर तक नहीं जाती।

सीडीयू ना तो बीजेपी है और ना ही कांग्रेस एसपीडी। इसकी नीतियों और सियासत के तौर तरीके बहुत जुदा हैं। और यह कोई पहला मौका नहीं जब जर्मनी में सीडीयू और एसपीडी का गठबंधन हुआ है। चौथी बार दोनों पार्टियों ने एक साथ सरकार बनाने का फैसला किया है। पिछले चार साल से जर्मनी में चली सरकार में भी यही दोनों पार्टियां साझीदार हैं। बस अंतर इतना है कि इस बार एसपीडी को ना चाहते हुए भी सीडीयू के साथ सरकार में भागीदार बनना पड़ा है। दरअसल चुनाव में उतरने से पहले ही एसपीडी ने सीडीयू से नाता तोड़ने का मन बना लिया था। चुनावों में पार्टी को जब ऐतिहासिक गिरावट का सामना करना पड़ा तो साफ हो गया कि वह विपक्ष में ही बैठेगी और अहम मुद्दों पर सरकार को घेरकर मतदाताओं में अपना खोया हुआ जनसमर्थन फिर से हासिल करेगी।

चुनावों में घाटा चांसलर मैर्केल की सीडीयू को भी उठाना पड़ा लेकिन लगभग 33 प्रतिशत वोटों के साथ वह सबसे बड़ी पार्टी बनी और इस तरह पार्टी प्रमुख होने के नाते सरकार बनाने की जिम्मेदारी चांसलर मैर्केल के ही कंधों पर थी। उन्होंने गठबंधन सरकार बनाने के लिए ग्रीन पार्टी और उदारवादी एफडीपी का दरवाजा खटखटाया। बात नहीं बनी तो हारकर एसपीडी का रुख करना पड़ा। एसपीडी और उसके नेता मार्टिन शुल्त्स के सामने धर्मसंकट पैदा हो गया। पार्टी को लगा कि जिस सरकार का हिस्सा बनने की वजह उसे चुनाव में मतदाताओं की इतनी नाराजगी झेलनी पड़ी, उसी में फिर से कैसे शामिल हो जाएं। जर्मनी में अब तक ऐसा नहीं हुआ जब चुनावों के बाद तुरंत फिर से चुनाव करा दिए गए हों। इस बार भी इसकी नौबत न आए, इसके लिए मौजूदा राष्ट्रपति फ्रांक वॉल्टर श्टाइनमायर ने एसपीडी पर सरकार में शामिल होने का जोर डाला। मार्च 2017 में राष्ट्रपति संभालने से पहले श्टाइनमायर एसपीडी पार्टी के बड़े नेता थे और मैर्केल की सरकार में उप चांसलर और विदेश मंत्री जैसे अहम पद संभाल चुके हैं।

सरकार में शामिल होने का फैसला करने के बावजूद एसपीडी में घमासान थमा नहीं है। जबकि चांसलर मैर्केल की सीडीयू पार्टी में भी युवा चेहरों को सामने लाने की आवाजें जोर पकड़ रही हैं। नई सरकार को लेकर पार्टी नेताओं के बीच डील तो हो गई है लेकिन गठबंधन समझौते को सरकार बनने से पहले पार्टियों की मंजूरी भी चाहिए। सीडीयू और सीएसयू में फैसला पार्टी के राष्ट्रीय सम्मेलन में होगा लेकिन एसपीडी के आम सदस्य वोट डालकर फैसला लेंगे। एसपीडी की प्रभावशाली युवा शाखा के नेता शुरू से ही गठबंधन के खिलाफ थे और अब बाकायदा अभियान छेड़ने का एलान किया है। उनकी कोशिश है कि एसपीडी के 4.6 लाख सदस्यों में ज्यादा से ज्यादा लोग गठबंधन को खारिज कर दें। आने वाले हफ्तों में इसके लिए मतदान होगा।

असंतुष्ट खेमे को लगता है कि पार्टी लोगों के बीच विश्वसनीयता खोती जा रही है क्योंकि कभी सरकार में शामिल न होने की बात कहने वाले मार्टिन शुल्त्स ने अब पूरी तरह यूटर्न ले लिया है। नई सरकार में विदेश मंत्री का पद स्वीकार करने के लिए भी शुत्ल्स को आलोचना झेलनी पड़ रही है, जिस पर अभी एसपीडी नेता जिगमार गाब्रिएल हैं। दाढ़ी रखने वाले शुल्त्स पर तंज करते हुए गाब्रिएल ने पत्रकारों से कहा, “यह मेरे लिए नई शुरुआत है। मेरी छोटी बेटी मैरी ने कहा कि पापा दुखी मत होइए। अब आपके पास हमारे लिए ज्यादा समय होगा। यह उस आदमी के साथ रहने से ज्यादा अच्छा है, जिसके चेहरे पर बाल हैं।” पार्टी में उनकी विश्वसनीयता पर छिड़ी बहस के बाद शुल्त्स ने फैसला किया कि वह विदेश मंत्री नहीं बनेंगे। उन पर दबाव था कि इस बहस का असर गठबंधन समझौते पर होने वाले मतदान पर पड़ता। बहहाल एसपीडी के महासचिव लार्स क्लिंगबाइल को भी भरोसा है कि एसपीडी के सदस्य गठबंधन डील को मंजूर कर लेंगे।

नए गठबंधन के लिए चांसलर मैर्केल को भी बहुत समझौते करने पड़े हैं। कई विश्लेषक कह रहे हैं कि चुनाव में ऐतिहासिक गिरावट के बावजूद एसपीडी नई सरकार में विदेश, वित्त और श्रम मंत्रालय जैसे अहम विभाग लेने में कामयाब रही। ऐसे में सवाल उठता है कि चुनाव में सबसे ज्यादा मत पाने वाली सीडीयू के लिए क्या बचा? सीडीयू के पास चांसलर का पद है, लेकिन उसके बाद सारे महत्वपूर्ण मंत्रालय सहयोगी पार्टियों के पास हैं। सीडीयू के पास कोई भी महत्वपूर्ण मंत्रालय नहीं है। यह बात सीडीयू के कई प्रांतीय नेताओं को भी नहीं पच रही है।

सीडीयू के कई नेता भी गठबंधन समझौते से खुश नहीं है और इसकी राह में रोड़े अटकाने की बात कर रहे हैं। वे वित्त मंत्रालय एसपीडी को देने से खफा हैं। सीडीयू के भीतर छोटे और मझौले स्तर के उद्यमों के संघ के प्रमुख ने कहा है, “गठबंधन समझौता कोई बाइबिल नहीं है।” रुढ़िवादी झुकाव रखने वाले और जर्मनी में सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले ‘बिल्ड’ अखबार ने मैर्केल पर आरोप लगाया कि उन्होंने एसपीडी को सरकार ‘तोहफे में’ दे दी है। सीडीयू की युवा शाखा ने भी मैर्केल की आलोचना की है और कहा है कि गठबंधन बनाने के लिए उन्होंने कुछ ज्यादा ही समझौते कर लिए हैं।
सियासी खींचतान के बावजूद अगर गठबंधन डील बरकरार रहती है तो मैर्केल चौथी बार जर्मनी की चांसलर बनेंगी। ऐसे में, इस सवाल का सामना भी उन्हें बार बार करना पड़ रहा है कि क्या यह उनका आखिरी कार्यकाल होगा? इसलिए इस बार उनके कंधों न सिर्फ सरकार चलाने की जिम्मेदारी होगी, बल्कि उन्हें अपना उत्तराधिकारी भी तय करना होगा।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App