The presence of the communities is poor in Lima - Jansatta
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नागरिक समुदाय की उपस्थिति कमजोर रही लीमा में

ओम थानवी राष्ट्र संघ के पर्यावरण सम्मेलन में इस बार नागरिक समुदाय और गैर-सरकारी संगठनों की शिरकत कमजोर रही। पहले के सम्मेलन के मुकाबले उनकी उपस्थिति भी बहुत कम थी। हालांकि आयोजन की अच्छी बात यह रही कि सरकारी चर्चाओं और नागरिक समुदाय के कार्यक्रम एक जगह हुए। अक्सर दोनों के कार्यक्रम अलग-अलग स्थलों पर […]

Author December 12, 2014 8:20 AM
राष्ट्र संघ के पर्यावरण सम्मेलन में इस बार नागरिक समुदाय और गैर-सरकारी संगठनों की शिरकत कमजोर रही। (फोटो: भाषा)

ओम थानवी

राष्ट्र संघ के पर्यावरण सम्मेलन में इस बार नागरिक समुदाय और गैर-सरकारी संगठनों की शिरकत कमजोर रही। पहले के सम्मेलन के मुकाबले उनकी उपस्थिति भी बहुत कम थी।

हालांकि आयोजन की अच्छी बात यह रही कि सरकारी चर्चाओं और नागरिक समुदाय के कार्यक्रम एक जगह हुए। अक्सर दोनों के कार्यक्रम अलग-अलग स्थलों पर होते हैं। दरअसल इस सिलसिले की भूमिका 1992 में रियो द जनीरो के जिस पृथ्वी सम्मेलन में बनी; वहां भी दोनों को काफी दूरी पर रखा गया था। अब जगह की उपलब्धता को देखते कभी दोनों समुदाय कभी दूर, कभी एक जगह जुटते हैं।

लीमा में आयोजन के लिए जिस सैनिक मुख्यालय के मैदान को चुना गया, वहां जगह वैसे भी कम थी। इसलिए नागरिक समुदाय के संगठनों को राष्ट्र संघ सचिवालय और स्थानीय (सरकारी) तालमेल की ओर से ही बहुत कम संभागियों को शामिल होने की अनुमति मिली। अनुमति के बगैर आयोजन में शिरकत का पंजीकरण नहीं हो सकता। भारत ही नहीं, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल से लेकर मैक्सिको तक प्रतिनिधियों की शिकायत थी कि उनके (गैर-सरकारी) संगठन को उतने संभागी लाने की इजाजत नहीं मिली, जितनी पूर्व में मिलती थी।

बहरहाल, संभागियों की तादाद पर बंदिश के बावजूद आयोजनों की आवाज भी असरदार नहीं थी। अनेक गोष्ठियों में विभिन्न मुद्दों पर उठी चर्चाएं सुनने का मौका मिला। तकनीकी मुद्दों को तो विशेषज्ञों ने खूब उठाया, पर जलवायु परिवर्तन के राजनीतिक पहलुओं को कम संगठनों ने छुआ। वैकल्पिक ऊर्जा के लिए आर्थिक मदद, विकसित देशों की विकासशील और अल्पविकसित देशों को तकनीकी मदद में कोताही की बातें दुहराई जाती रहीं।

गैर-सरकारी संगठनों की एक महत्त्वपूर्ण गोष्ठी मछुआरों की समस्याओं को लेकर रही। श्रीलंका के वक्ता ने अपने देश के साथ भारतीय मछुआरों की समस्या को भी उदार ढंग से देखने की बात कही। उनका कहना था कि अक्सर शिक्षा की कमी, भूगोल और कानून-कायदों की जानकारी का अभाव उन्हें जीवन-मरण की समस्याओं की ओर धकेल देता है। पेरू के एक स्थानीय प्रतिनिधि ने कहा कि मछुआरों को सामाजिक सुरक्षा ही मुहैया नहीं है। वे ज्यादातर बगैर बीमे वाले होते हैं। सघन चर्चा के बाद वक्ता सवालों की उम्मीद करते रहे, पर सवाल उठे नहीं। यह उल्लेख महज अहम मुद्दों पर चलताऊ चर्चाओं की एक झलक के लिए।

‘पाराकास’ नामक पंडाल में पर्यावरण के मुद्दे पर औरतों की समस्याओं पर हुई चर्चा में पंडाल भरा हुआ था। विभिन्न वक्ताओं ने बताया कि उनके यहां औरतें किस तरह जलवायु परिवर्तन के बुरे प्रभावों से बचने की कोशिशें करती हैं। नए प्रस्तावित समझौते से स्त्रियों की अपेक्षाओं को भी रेखांकित किया गया। खेती में महिलाओं की भागीदारी की बात करते हुए इस पर भी चर्चा हुई कि बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों में खेती की समस्याओं से कैसे जूझा जा सकता है।

एक्शन एंड इंटरनेशनल की टेरेसा एंडरसन ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेती में कहां क्या चल रहा है। महिलाओं और छोटे किसानों ने खेती में नेतृत्व प्रदान किया है और ऐसे प्रयास स्वत:स्फूर्त हैं। ‘प्रेक्टिकल एक्शन’ संगठन के क्रिस हैंडरसन ने पेरू की पारंपरिक खेती के विभिन्न पहलुओं पर बात की। पेरू के पहाड़ी इलाकों में पौड़ियों पर खेती की जो तकनीक इंका सल्तनत के वक्त ईजाद हुई, आज भी बदस्तूर चली आती है।

भारत के स्वैच्छिक संगठन ‘पैरवी’ के अजय झा ने एक अध्ययन के हवाले से दारुण सच्चाई की ओर संकेत किया कि दक्षिण एशिया में सत्तर प्रतिशत कामगार औरतें खेती के काम में शामिल हैं। जबकि इनमें जमीन की मिल्कियत महज दस प्रतिशत औरतों को हासिल है। कई मामलों में मिल्कियत पुरुषों के पास तक नहीं है। इस कारण उन्हें खेती के लिए आधिकारिक कर्ज तक नहीं मिल पाता।

‘बियोंड कोपेनहेगन’ समूह की मनु श्रीवास्तव राजस्थान में स्त्री कामगारों के बीच काम करती हैं। उन्होंने अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने छोटे बांधों से सिंचाई और उन्नत कृषि में स्त्रियों की पारंपरिक समझ के कई प्रसंग सामने रखे।

इस बीच पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने सरकारी स्तर की चर्चा में कहा कि भारत के पास जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिए विवेक और राजनीतिक इच्छाशक्ति है। अच्छी बात यह रही कि उन्होंने जयराम रमेश प्रसंग अर्थात कांग्रेस की नीति से मतभेद को यहां नहीं उठाया, जो चार रोज पहले दिल्ली में पेरू सम्मेलन के सिलसिले में आयोजित प्रेस वार्ता में उठा आए थे।

यही नहीं, जावड़ेकर ने तीसरी दुनिया के गरीब तबके की बात भी उठाई। उन्होंने कहा कि दुनिया में गरीब तबके की आबादी यूरोप की आबादी के दुगुने से भी ज्यादा है। उन्हें स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, पानी, स्वच्छता आदि कैसे हासिल हों, यह देखना हमारी प्रतिबद्धता है। अगर विकसित राष्ट्र अपनी प्रतिबद्धता के मुताबिक आर्थिक और तकनीकी सहयोग करें और नए समझौते में इसका स्पष्ट और केंद्रीय प्रावधान हो तभी लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं।

यह नेतृत्व की भाषा है जो विकासशील देशों के लिए भारत पहले बोलता रहा है। उसके बाद पिछड़े देश अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए भारत की ओर देखने लगे। लेकिन बाद में भारत आर्थिक विकास और पर्यावरण रक्षा में टकराव की चुनौती की बात कर नेतृत्वकारी भूमिका से बचने लगा। रियो के 2014 के सम्मेलन में मनमोहन का भाषण उनके ढुलमुल रवैये का उदाहरण था, जिसके चलते उन्होंने जयराम रमेश को पर्यावरण मंत्रालय से हटा भी दिया था।

जावड़ेकर ने- जो राष्ट्र संघ में अपना पक्ष रखने को राष्ट्र संघ महासचिव बान की-मून से भी मिले- भारत का अहम रुख रखा है। मगर देखना यह होगा कि उनकी सरकार किस तरह इस भूमिका के साथ तालमेल बिठा पाती है, जो अब तक पर्यावरण से खिलवाड़ करने वाले उद्योगपतियों के प्रति ही ज्यादा मेहरबान रही है।

भारत सरकार के लिए पर्यावरणविद अनुपम मिश्र का यह वक्तव्य प्रेरक हो सकता है- ‘‘दुर्योधन की प्रवृत्ति और निवृत्ति की तरह सब सरकारें जानती हैं कि धर्म (दायित्व) क्या है। लेकिन (सरकार) उसकी ओर प्रवृत्त नहीं होती। और अधर्म क्या है, यह जानते हुए भी लगातार अपने पूर्ववर्ती से भी तेज गति से उसकी ओर बढ़ती जाती है।’’

और अनुपमजी का यह वक्तव्य मुझे लीमा में ही जारी एक पुस्तिका में पढ़ने को मिला। ‘‘भारतीय जीवन दर्शन के संदर्भ में पर्यावरण व जलवायु परिवर्तन: संकट से समाधान की ओर’’ नामक पुस्तिका के लेखक सुरेश सोनी हैं, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संयुक्त महासचिव हैं। पुस्तिका पर्यावरण नियोजन एवं समन्वय संगठन (एप्को) ने प्रकाशित की है।

 

 

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