डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्र के नाम संबोधन के बाद वाशिंगटन के गलियारों में एक ही सवाल है- क्या अमेरिका अब भी दुनिया का नेतृत्व कर रहा है, या हमारी शक्ति अब सिर्फ हमारा भ्रम है। डोनाल्ड ट्रंप का ‘अमेरिका प्रथम’ का नारा अब ‘अमेरिका अकेला’ में तब्दील होता दिख रहा है। शांति के नोबेल के तलबगार अब अशांति के अग्रदूत बन गए हैं। भ्रम फैलाए रखना ट्रंप की शैली बन गई है। जो अस्थिरता उनके व्यक्तित्व में है, अब वह अमेरिकी विदेश नीति की पहचान बन गई है। ट्रंप और उनके हथियार ‘भ्रम’ पर सरोकार की पड़ताल।
आपरेशन एपिक फ्यूरी के 33 दिन बाद एक अप्रैल 2026 की रात डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को संबोधित किया। करीब 20 मिनट का भाषण था। चार बातें कहीं- ईरान युद्ध जरूरी था, जीत गए, जारी रहेगा, जल्द खत्म होगा। यही बातें वे हर रोज कहते हैं। कुछ नया नहीं था। जानकारों ने कहा-लोगों को किसी बड़ी घोषणा की उम्मीद थी। मिली वही पुरानी बयानबाजी।
राष्ट्र के नाम संबोधन : जो नहीं बोला वह अहम
जब ट्रंप माइक के सामने आए, अमेरिकी जनता को उम्मीद थी कि या तो युद्ध खत्म होने की घोषणा होगी या कोई बड़ा रणनीतिक एलान। 20 मिनट बाद लोगों को अहसास हुआ कि यह भाषण नहीं प्रचार था। हमारी सेना ने अभूतपूर्व जीत हासिल की है। ईरान की नौसेना गई। वायुसेना खत्म है। ये वही बातें थीं जो ट्रंप ट्रुथ सोशल पर रोज लिखते हैं।
इसमें एक वह विरोधाभास है, जो भाषण को बेनकाब करता है। 28 फरवरी को युद्ध शुरू करते हुए ट्रंप ने कहा था-जब हम युद्ध खत्म करें, ईरानी जनता अपनी सरकार खुद बना ले। एक अप्रैल को उन्होंने कहा-सत्ता बदलना हमारा लक्ष्य कभी नहीं था, लेकिन सत्ता बदल गई क्योंकि सब मारे गए। एक महीने में उन्होंने अपना ही बयान पलट दिया और इसे जीत बताया।
इस भाषण की एक और विडंबना थी। ट्रंप ने कहा- अमेरिका ऊर्जा में पूरी तरह स्वतंत्र है, मध्य-पूर्व पर निर्भर नहीं। लेकिन उसी दिन अमेरिका में पेट्रोल का औसत दाम चार अमेरिकी डालर प्रति गैलन पार कर गया। एक महीने में 30 फीसद की वृद्धि। ट्रंप की अर्थव्यवस्था पर अनुमोदन दर गिरकर 31 फीसद पर आ गई। यह उनके दूसरे कार्यकाल की सबसे निम्न दर है।
अनुमोदन : हर चुनाव एक नई गिरावट
यूनिवर्सिटी आफ मैसाचुसेट्स एमहर्स्ट के 31 मार्च के सर्वेक्षण में ट्रंप का अनुमोदन 33 फीसद था।। रायटर्स/इपसास में 36 फीसद यानी एक हफ्ते में 40 से 36 की गिरावट। सिल्वर बुलेटिन के अनुसार शुद्ध अनुमोदन -16.7 था जो दूसरे कार्यकाल का निम्न रिकार्ड है। तुलनात्मक रूप से देखें तो जो बाइडेन अपने कार्यकाल के इसी बिंदु पर -11.7 के अंक परथे। फाक्स न्यूज जैसे ट्रंप समर्थक चैनल के सर्वेक्षण में भी 80 फीसद अमेरिकी पेट्रोल दाम को लेकर चिंतित थे। कई सर्वेक्षणों में मार्च-अप्रैल 2026 में 61 फीसद अमेरिकी ईरान युद्ध के विरोध में हैं। एक महीने में 18 फीसद की वृद्धि। 62 फीसद कहते हैं, देश गलत दिशा में जा रहा है। एनपीआर के अनुसार, इराक युद्ध को साल 2003 केशुरू में 70 फीसद समर्थन था। लेकिन मौजूदा युद्ध शुरू से ही अलोकप्रिय था। जनता इसकी आदी नहीं हो पाई।
अपहरण बनाम वेनेजुएला का सत्ता हस्तांतरण
तीन जनवरी 2026 की सुबह दुनिया चौंक गई। अमेरिकी सेना ने ‘आपरेशन एब्सोल्यूट रिजाल्व’ के तहत वेनेजुएला पर हमला किया। राष्ट्रपति निकोलास मादुरो और उनकी पत्नी को मादक पदार्थों की तस्करी के आरोप में अपहृत कर न्यूयार्क लाया गया। ट्रंप ने कहा-अमेरिका सत्ता हस्तांतरण तक वेनेजुएला को चलाएगा। ट्रुथ सोशल पर उन्होंने खुद को वेनेजुएला का कार्यकारी राष्ट्रपति बताने वाला स्क्रीनशाट पोस्ट किया।
इसके बाद ट्रंप ने अपनी इस नीति को नाम दिया – डान-रो डाक्ट्रिन जो 19वीं सदी के मोनरो डाक्ट्रिन का आधुनिक संस्करण है। उन्होंने कहा-‘पश्चिमी गोलार्द्ध में अमेरिकी प्रभुत्व पर कभी सवाल नहीं उठाया जाएगा। मार्च 2026 में वर्ल्ड बेसबाल क्लासिक में वेनेजुएला के जीतने के बाद ट्रंप ने दो बार कहा-वेनेजुएला को 51वां राज्य बनाया जाए। इससे पहले वे कनाडा, ग्रीनलैंड और पनामा के लिए भी यही कह चुके थे।
ग्रीनलैंड और कनाडा- हम बिक्री के लिए नहीं
जनवरी 2026 में ट्रंप ने डेनमार्क सहित आठ यूरोपीय देशों फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, नार्वे, स्वीडन, फिनलैंड, नीदरलैंड को धमकी दी कि ग्रीनलैंड के समर्थन में तैनात उनकी सेनाओं को वापस न बुलाने पर 10 फीसद (जून तक 25 फीसद) शुल्क लगाया जाएगा। आठों देशों ने संयुक्त बयान जारी किया-यह नाटो संबंधों के लिए खतरनाक पतन है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री स्टार्मर ने कहा- सहयोगियों पर शुल्क की धमकी पूरी तरह गलत है।
इक्कीस जनवरी को दावोस में नाटो प्रमुख मार्क रूते से मुलाकात के बाद ट्रंप ने पलटी मारी। कहा, ‘हम आर्कटिक पर एक सौदे पर पहुंच गए हैं।’ शुल्क की धमकी वापस ली। लेकिन ग्रीनलैंड की संप्रभुता पर कोई स्पष्टता नहीं। डेनमार्क और ग्रीनलैंड के नेताओं ने कहा कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है। कनाडा पर उन्होंने 35 फीसद शुल्क लगाया और प्रधानमंत्री मार्क कार्नी को गवर्नर कार्नी कहकर बुलाया।
नाटो: अप्रासंगिक या अस्तित्व का सवाल?
ईरान युद्ध में जब यूरोपीय देशों ने होर्मुज जलसंधि खोलने के लिए अमेरिका के नौसेना गठबंधन में शामिल होने से मना किया, तो ट्रंप ने कहा- वे नाटो छोड़ने पर विचार कर रहे हैं। जर्मनी ने कहा- यह हमारा युद्ध नहीं है। फ्रांस, ब्रिटेन, स्पेन ने भी सैन्य भागीदारी से इनकार किया। नाटो महासचिव रूते बोले- नाटो के सदस्य होर्मुज जलमार्ग खोलने के सबसे अच्छे तरीके पर चर्चा कर रहे हैं।
टिप्पणीकारों के मुताबिक ट्रंप ने अपने पूर्व नाटो राजदूत इवो डाल्डर की टिप्पणी को सही साबित कर दिया कि ट्रंप के नेतृत्व में नियम-आधारित विश्व व्यवस्था व्यावहारिक रूप से समाप्त हो गई है। यूरोप पहली बार अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद लेने की बात कर रहा है। जर्मनी ने रक्षा बजट रिकार्ड स्तर तक बढ़ाया। फ्रांस ने ईयू की स्वायत्त सुरक्षा नीति की मांग की।
भारतीय तटस्थता पसंद नहीं
ट्रंप की डान-रो डाक्ट्रिन भारत के लिए एक बड़ा संदेश है। पश्चिमी गोलार्द्ध हमारा है, यह वही सोच है जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र तक फैल सकती है। भारत-अमेरिका व्यापार में तनाव है। ट्रंप ने भारत पर भी शुल्क की धमकियां दी हैं। ईरान युद्ध में भारत की तटस्थता ट्रंप को पसंद नहीं। होर्मुज बंद होने से भारत को भारी नुकसान हुआ। 22 जहाज फंसे। दूसरी तरफ कनाडा, यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया सब ट्रंप की नीतियों से त्रस्त हैं। उनके खिलाफ एक नया वैश्विक गठबंधन बन रहा है। कनाडा के मार्क कार्नी के शब्दों में, जो मेज पर नहीं हैं, वे मेनू में हैं। एक सबसे अहम कोण की भारत में सबसे कम चर्चा है, वह है ट्रंप का अपने ही देश में अलगाव। ‘एमएजीए’ आंदोलन के भीतर दरार पड़ रही है। कुछ समर्थक जो विदेश में युद्ध के खिलाफ थे, इस ईरान युद्ध को लेकर असहज हैं। अमेरिकी कांग्रेस में द्विदलीय आवाजें उठी हैं। ट्रंप ने संसदीय अनुमोदन के बिना युद्ध छेड़ा। यह संवैधानिक प्रश्न अभी तक अनुत्तरित है। इस बीच, अमेरिका के सेना प्रमुख को पद छोड़ने का आदेश देने पर अमेरिकी जानकार भौंचक्के हैं।
पलटते रहे बयान
ट्रंप का बयानों से पलटना वैश्विक अनिश्चितता का द्योतक है। जब दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश का नेता एक दिन कुछ कहे और अगले दिन कुछ और तो सहयोगी देश भी नीति नहीं बना पाते। यूरोपीय देश अब ट्रंप के बयानों की आधिकारिक नीति के रूप में व्याख्या करना बंद कर चुके हैं और सिर्फ लिखित संधियों को मानते हैं।
आपरेशन एपिक फ्यूरी में अमेरिका अकेला खड़ा है। इजराइल साथ है, पर यूरोप ने किनारा कर लिया। नाटो का रुख इसके 75 साल पुराने इतिहास में पन्ने पलटने को तैयार है। उसका रवैया इस सबसे पुराने मजबूत सैन्य गठबंधन की भाषा नहीं है। और इस कड़ी को आगे बढ़ाते हुए ब्रिटेन की पहल पर 60 देशों ने होर्मुज खुलवाने के लिए गहन मंथन किया है, जो अमेरिका से परे एक नए समीकरण का संकेत है। इसमें एशिया भी शामिल था तो यूरोप भी। इराक युद्ध (2003) में भी अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय समर्थन के बिना हमला किया था। पर तब इच्छुक देशों का गठबंधन था। ईरान में केवल इजराइल का साथ था। यह बदलाव ट्रंप के ग्रीनलैंड, कनाडा, वेनेजुएला के बयानों से शुरू हुआ था। सहयोगियों को डराना कोई रणनीति नहीं, विरोधाभास है।
लेन-देन पर टिकी नीति
ट्रंप की विदेश नीति लेन-देन पर टिकी है, मूल्यों पर नहीं। इन उदाहरणों को देखें-
–वेनेजुएला : मादुरो सरकार को गिराने का दावा खोखला साबित हुआ। रूस और चीन की मौजूदगी ने ट्रंप की अधिकतम दबाव रणनीति की हवा निकाल दी।
–ग्रीनलैंड का विवाद : एक संप्रभु राष्ट्र (डेनमार्क के हिस्से) को खरीदने की जिद ने नार्डिक देशों और यूरोप में अमेरिका की हंसी उड़वाई।
–ईरान और मध्य पूर्व : परमाणु समझौते (जेसीपीओए) से बाहर निकलकर ट्रंप ने जो हासिल करना चाहा, वह आज भी कोसों दूर है। ईरान अब अधिक आक्रामक है और खाड़ी देशों में असुरक्षा बढ़ी है। क्या सुलेमानी की हत्या से अमेरिका सुरक्षित हुआ? विशेषज्ञों का मानना है कि इससे सिर्फ अराजकता का विस्तार हुआ है।
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