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तेल से बदल जाएगा खेल

इस बात की पूरी संभावना है कि कोविड-19 के बाद की दुनिया का आर्थिक-व्यापारिक नक्शा पूरी तरह बदला हुआ हो। आयात-निर्यात की अनिश्चितताओं को देखते हुए क्षेत्रीय विनिर्माण केंद्रों को अधिक उभारने के साथ उसे ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनाने का प्रयास होगा।

सांकेतिक फोटो।

इस बात की पूरी संभावना है कि कोविड-19 के बाद की दुनिया का आर्थिक-व्यापारिक नक्शा पूरी तरह बदला हुआ हो। आयात-निर्यात की अनिश्चितताओं को देखते हुए क्षेत्रीय विनिर्माण केंद्रों को अधिक उभारने के साथ उसे ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनाने का प्रयास होगा। मसलन, दक्षिण पूर्वी एशियाई देश म्यांमा, वियतनाम, लाओस, कंबोडिया, फिलीपींस वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपनी भूमिका बढ़ाएंगे अन्यथा उन्हें चीन जैसे देशों पर निर्भर रहना पड़ेगा और चीन व्यापारिक मामलों में कठोर वार्ताकार है। इसी तरह अफ्रीकी, खाड़ी क्षेत्र, मध्य एशिया और लैैटिन अमेरिकी क्षेत्र भी अपनी अपनी व्यापारिक सौदेबाजी की क्षमता को बढ़ाने का प्रयास करेंगे।

खाड़ी क्षेत्र महामारी से आए बदलावों के कारण एक संक्रमणकारी स्थिति से गुजर रहे हैं। जो देश तेल निर्यातक देशों के संगठन ‘ओपेक’ के भी सदस्य हैं, उन्होंने भविष्य में तेल- गैस की राजनीति की सीमितता का आकलन कर लिया है। लिहाजा वे कोरोना उत्प्रेरित दशाओं के अधीन अपनी राजनीति और आर्थिकी दोनों में जरूरी सामंजस्य बैठाने के लिए तैयार दिख रहे हैं।

इस दौरान विश्व के अधिकतर देश अमेरिका के साथ संबंधों को पुनर्परिभाषित कर रहे हंै। खासतौर पर मध्यपूर्व में अमेरिका के निकटतम सहयोगी देश वर्तमान में रूस और चीन से नजदीकी बढ़ाते दिख रहे हैं। रूस ने जिस प्रकार सीरिया के गृहयुद्ध में बसद की सरकार का समर्थन किया, उससे रूस की विश्वसनीयता यहां बढ़ी है। तेल से होनेवाली कमाई पर निर्भरता और सत्तावादी सरकार के कारण मध्य-पूर्व के देशों की आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था अमेरिका की तुलना में रूस से कहीं अधिक नजदीक है।

जिस तरह अमेरिका ने हाल के सालों में प्राकृतिक गैस और तेल की आपूर्ति बढ़ाई, उससे तेल की कीमतों पर असर दिखा। हालांकि सऊदी अरब यह नहीं चाहता था कि अमेरिका इसमें बढ़त बना सके। इसलिए उसने तेल के उत्पादन में कटौती के विकल्प को स्वीकार नहीं किया। यह अलग बात है कि कोरोना के चलते तेल के घटते मांग की वजह से सऊदी और रूस इस बात पर सहमत हुए की कटौती की जाए।

‘वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट’ (डब्लूटीआइ) में तेल की कीमतों में आई नकरात्मक गिरावट का सीधा प्रभाव अमेरिका की तेल कंपनियों के निवेश पर पड़ेगा। चूंकि ये कंपनियां ‘आॅयल बांड’ के माध्यम से अपने पूंजी आधार को बढ़ाती हैं, तो अब इस संकट के कारण उसमें कमी आने की संभावना बढ़ेगी। यह स्थिति अमेरिका के वित्तीय संस्थाओं की वित्तीय क्षमता को प्रभावित करेगी। यह भी संभव है कि इसके कारण अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में अमेरिका की हिस्सेदारी पर भी इसका प्रभाव पड़े, जहां वह अब तक लगभग 16 फीसद की हिस्सेदारी के साथ वीटो शक्तिरखता है।

यह स्थिति चीन की कंपनियों को खाड़ी क्षेत्र की तेल कंपनियों में निवेश करने को प्रोत्साहित करेगा और अमेरिका की संभावित बढ़त को कमजोर कर सकता है। चीन की कोशिश यह भी रहेगी कि रूस को साथ लेते हुए कच्चे तेल के बाजार से अमेरिका को बाहर कर दे। यह रूस के लिए भी फायदेमंद रहेगा। क्योंकि उसे चीन के साथ एशिया और यूरोप का बड़ा बाजार अपनी तेल कंपनियों के लिए मिल सकता है। इसमें चीन के ‘बेल्ट एंड रोड’ पहल की अहम भूमिका हो सकती है।

स्थिति यह है कि वर्तमान में ओपेक का विश्व के कुल कच्चा तेल भंडार के 75 फीसद पर नियंत्रण है और वह विश्व के कुल कच्चा तेल का 42 फीसद उत्पादन करता है। हालांकि अब भी अमेरिकी और यूरोपीय तेल कंपनिया यहां बड़े निवेशक हंै, इसलिए अप्रत्यक्ष रूप में अमेरिका का प्रभाव यहां की तेल कीमतों के निर्धारण में बना हुआ है।

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