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कश्मीर मुद्दा: पाकिस्तान के लिए बड़ा झटका है तालिबान का यह रुख

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक मैसेज वायरल हो रहा था, जिसमें कहा गया कि तालिबान कश्मीर के जिहाद में शामिल हो रहा है, हालांकि तालिबान ने खुद इस मैसेज पर सफाई जारी की है।

Author नई दिल्ली | Updated: May 20, 2020 4:09 PM
तालिबान ने आधिकारिक बयान जारी कर कहा है कि उसका दिल्ली को निशाना बनाने का भी कोई इरादा नहीं है। (फोटो- रॉयटर्स)

Taliban on India: कोरोना संकट के बीच भारत के लिए एक राहत देने वाली खबर आयी है। दरअसल तालिबान ने सोशल मीडिया पर दिए अपने एक बयान में परोक्ष रुप से कश्मीर को भारत का आंतरिक मामला बताया है, जोकि पाकिस्तान के लिए एक बड़ा झटका हो सकता है। बता दें कि तालिबान की राजनैतिक शाखा इस्लामिक एमिरेट ऑफ अफगानिस्तान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने अपने एक ट्वीट में कहा है कि “मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि तालिबान कश्मीर में जिहाद में शामिल हो रहा है, ये गलत है। इस्लामिक एमिरेट की पॉलिसी है कि वह दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देता है।”

तालिबान का यह बयान क्यों है अहमः जैसा कि अधिकतर लोग जानते हैं कि अफगानिस्तान में तालिबान और अमेरिका के बीच शांति समझौता हो गया है। इस समझौते के बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि तालिबान, अफगानिस्तान में फिर से अपनी पकड़ बना सकता है। चूंकि तालिबान, पाकिस्तान के काफी करीब है और पाकिस्तान के डीप स्टेट के तालिबानी नेतृत्व से अच्छे संबंध हैं, तो ऐसे में हो सकता है कि पाकिस्तान तालिबान के जिहादियों को कश्मीर में आतंकवाद फैलाने के लिए इस्तेमाल कर सकता है। बीते दिनों से सोशल मीडिया पर ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि तालिबान की तरफ से बयान आया है कि भारत से दोस्ती नहीं हो सकती और कश्मीर में जल्द ही जिहाद शुरू होगा। बेशक इन खबरों से भारत की चिंता बढ़ना स्वभाविक है, लेकिन अब तालिबान की राजनैतिक शाखा की तरफ से आया यह बयान बड़ी राहत देने वाला है।

भारत की ये है उलझनः भारत सरकार अफगानिस्तान में चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार को अपना समर्थन देती है। यही वजह है कि तालिबान के साथ भारत ने कभी भी बातचीत को तरजीह नहीं दी। बीते समय में जब अमेरिका और तालिबान में युद्ध चल रहा था और अफगानिस्तान में हामिद करजई और उनके बाद अशरफ गनी की सरकार रही, इस दौरान भारत ने अफगानिस्तान में कई विकास कार्य कराए, जिनमें अफगानिस्तान की संसद भवन की बिल्डिंग का निर्माण और एक बांध बनाने जैसे काम शामिल हैं।

अब क्योंकि अमेरिका और तालिबान में समझौता हो चुका है और अमेरिकी सैनिक धीरे धीरे अफगानिस्तान से चले जाएंगे तो तालिबान, अशरफ गनी सरकार को हटाकर खुद अफगानिस्तान की सत्ता पर अपनी पकड़ बना सकता है। अब भारत की उलझन ये है कि यदि वह गनी सरकार के साथ ही बातचीत जारी रखती है और तालिबान सत्ता पर काबिज हो जाता है तो भारत अफगानिस्तान में पिछड़ जाएगा और पाकिस्तान की पकड़ मजबूत हो सकती है। वहीं यदि भारत अफगानिस्तान के साथ बातचीत करता है तो वहां की चुनी हुई सरकार इसका विरोध कर सकती है और उसके साथ भी भारत के संबंध खराब हो सकते हैं।

भारत और पाकिस्तान के लिए अफगानिस्तान क्यों है अहमः दक्षिणी एशियाई देशों में शांति के लिए अफगानिस्तान में शांति होना बेहद अहम है। अफगानिस्तान में तालिबान के मजबूत रहते इस क्षेत्र में आतंकवाद पनपने का खतरा हमेशा बना रहेगा। पाकिस्तान अपने फायदे के लिए तालिबान का इस्तेमाल कर सकता है। पाकिस्तान की कोशिश है कि तालिबानी जिहादियों को कश्मीर में उतारा जाए। वहीं भारत की कोशिश है कि ऐसा ना हो, क्योंकि यदि ऐसा होता है तो कश्मीर का मुद्दा अऩ्तरराष्ट्रीय स्तर पर छा सकता है, जो कि भारत के लिए चिंता की बात होगी।

दूसरा, अफगानिस्तान में यदि शांति रहती है और भारत के वहां की सरकार से अच्छे संबंध रहते हैं तो भारत और अफगानिस्तान के बीच व्यापार हो सकता है, साथ ही अफगानिस्तान के रास्ते भारत की पहुंच सेंट्रल एशिया के देशों तक हो सकती है। पाकिस्तान और चीन जिस तरह से रणनीतिक तौर पर भारत को घेरने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में अफगानिस्तान में भारत की पकड़ होने से हमें इसका रणनीतिक फायदा मिलेगा।

बहरहाल अब देखने वाली बात है कि आने वाले दिनों में परिस्थितियां अफगानिस्तान में क्या मोड़ लेती हैं और इसका भारत, पाकिस्तान समेत पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ता है?

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