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इस्‍लामिक स्‍टेट के आखिरी दिन: बच्‍चों को भूखा रख बना दिया गया कंकाल, अब तक 20 की मौत

सीरिया में यह किसी एक बच्चे की कहानी नहीं है। अस्पताल में ऐसे दर्जनों बच्चे हैं। आईएस से जुड़े माता पिताओं ने अपने खलिफा के अंतिम दिनों में बच्चों के साथ भागने के बजाए बम और गोलियां के बीच बच्चों को भूख से ही मर जाने देने का फैसला किया।

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प्रतीकात्मक तस्वीर।

सीरिया में हालात भले ही अब थोड़े सहज हो रहे हो लेकिन अभी भी वहां ज्यादातर जिंदगियां मौत से जंग लड़ रहीं हैं। संडे टाइम्स, लंदन में छपे एक लेख के जरिए सीरिया के हालात का आंदाजा लगाया सकता है। गोली और बम से जिन नवजातों को जिंदगी बच गई। उन्हें भूख ने लीलना शुरु कर दिया है उनके भूखा रहने के पीछे का कारण और  भी भयावह है। नवजात कंकाल बन रहे हैं और मौत के मुंह में जा रहे हैं। दो साल का बच्चा अस्पताल में बेड पर पड़ा हुआ है। भूख के कारण लड़के हाथ और सीने की हड्डियां ऐसे नजर आ रही हैं जैसे चिड़िया के डैनै उसकी छाती से लगे होते हैं। सिर में जुओं के चलते सिर से बाल हटवा दिए गए हैं। चेहरे और माथे पर छर्रे के निशान है बेड पर लेटा यह बच्चा इस सब से अनजान हैं।

सीरिया में यह किसी एक बच्चे की कहानी नहीं है। अस्पताल में ऐसे दर्जनों बच्चे हैं। आईएस से जुड़े माता पिताओं ने अपने खलिफा के अंतिम दिनों में बच्चों के साथ भागने के बजाए बम और गोलियां के बीच बच्चों को भूख से ही मर जाने देने का फैसला किया। अस्पताल में भर्ती ये बच्चे नर्स की तरफ देखते हैं उन्हें खुद नहीं पता कि वह बच भी जाते हैं तो उनका क्या होगा। नर्स का कहना है कि पता नहीं चलता कि यह बच्चे किस देश के हैं यह लोग अरबी भाषा भी नहीं समझते। हो सकता हैं यह लोग इंडोनेशिया , ब्रिटिश, फ्रेंच, कुर्द या किरगिज़ हो। लगभग 80 बच्चों का इलाज उत्तरी सीरिया के अस्पताल में चल रहा है जो बैगहज से सिर्फ एक घटें की दूरी पर है। इस जगह पर ही आईएस ने अपना आखिरी स्थान बनाया था।

10 प्रतिशत आते हैं अकेले:एक डॉक्टर के मुताबिक लगभग 10 प्रतिशत बच्चे बिना नाम , देश के हैं। जिंदगी और मौत से जंग लड़ रहे ये बच्चे कुछ तख्त पर पड़े मिले है तो कुछ अण्डे सेने वाली मशीन में रखे मिले। बीते महीनों में लगभग 200 बच्चे इस अस्पताल में इलाज के लिए लाए जा चुके हैं। जिसमें से 20 की मौत हो चुकी है। ज्यादातर बच्चे कुपोषण या लैंड माइन्स के हमले के शिकार होते हैं, इनको टीबी और इन्सेफेलाइटिस जैसी गंभीर बीमारियां होती हैं। ज्यादातर बच्चे अलहोल डिस्पेलस्मेटं कैंप से आते हैं जहां लगभग 10 हजार लोगों को बंधक बनाया गया था और आईएस जिन्हें अपने बचने के लिए उनका कवच के तौर पर इस्तेमाल कर रहा था।

इस जंग में बची हुई मांओं की कहानी भी अलग है। युक्रेन की 32 वर्षीय कटरीना एक आईएस महिला है। वह बैगहज में रॉकेट हमले के दौरान घायल हो गई थी।इस हमले में उसकी बेटी मर गई और तीन बेटे अस्पताल पहुंच गए। ईसाई धर्म से परिवर्तित होकर इस महिला ने आतंक का रास्ता चुना। जले बाल और उंगलियों में भरी राख को वही निकालती नहीं है ताकि उसे खलिफा की यादें संजोए रखे और लगे की खलिफा अभी इसी धरती पर हैं।कटरीना को विश्वास है कि आईएस एक बार फिर से खड़ा होगा। कटरीना का कहना है कि वह वापस युक्रेन नहीं जाएगी उसका कहना है यह सच्चा इस्लाम नहीं है। मरते बच्चों के बीच उनका अलहोल की सड़क से नीचे 3 फीट से ज्यादा ऊंची कब्रें नहीं हैं। मरते बच्चों को आईएस की यह महिलाएं शहीद मानती हैं। अस्पताल में मौजूद एक शख्स का कहना है कि यह हृदयविदारक है कि यह मां अपने बच्चों के लिए रोती भी नहीं हैं।

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