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देमचोक-देपसांग के सवाल कितने अहम

मोल्दो/चुशूल सीमा बिंदु के चीनी हिस्से पर भारत और चीन के कोर कमांडरों की 10वें दौर की वार्ता में चार क्षेत्रों से सैन्य वापसी को लेकर बातचीत हुई।

Indo-China(बाएं ) लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) संजय कुलकर्णी, रक्षा विशेषज्ञ। (दाएं ) पी स्टाबडन, पूर्व राजनयिक एवं भारत-चीन मामलों के जानकार। फाइल फोटो।

गोगरा और हॉट स्प्रिंग्स से दोनों देशों के सैनिकों के पीछे हटने की रूपरेखा को अंतिम रूप दे दिया गया, लेकिन सामरिक महत्त्व के दो क्षेत्रों- देपसांग और देमचोक को लेकर बातचीत में गतिरोध आ गया। हालांकि, 10वें दौर की इस बैठक के बाद दोनों देशों की सेना की ओर से साझा बयान जारी कर पैंगोंग-त्सो इलाके से सेनाओं के पीछे हटने की प्रक्रिया को एक सकारात्मक पहल करार दिया गया और कहा गया कि इससे पश्चिमी क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) समेत दूसरे मुद्दों के समाधान के लिए भी एक अच्छा आधार तैयार हुआ है।

बयान में देपसांग और देमचोक का नाम लेकर जिक्र नहीं आया, लेकिन पश्चिमी क्षेत्र का आशय इन्हीं दो क्षेत्रों से रहा। 10वें दौर की बैठक में आपसी बातचीत को जारी रखने को लेकर सहमति जताई गई। दोनों देशों ने स्थिति पर नियंत्रण, शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए समाधान तलाशने की बात पर भी सहमति जताई।

बयान को लेकर उठते सवाल

10वें दौर की वार्ता को लेकर सामरिक और रक्षा क्षेत्र के जानकारों ने सवाल उठाए हैं। रक्षा विशेषज्ञ अजय शुक्ला के मुताबिक, संयुक्त बयान बेहद साधारण है। इसमें पश्चिमी क्षेत्र के बारे में पीछे हटने के चरण का ब्योरा नहीं है। कहा गया था कि बैठक में अन्य क्षेत्रों से हटने को अंतिम रूप दिया जा सकेगा, लेकिन इस पर बात ही नहीं हुई।

सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में वरिष्ठ शोधार्थी सुशांत सिंह के मुताबिक, अभी सभी समस्याओं का हल मान लेना गलत होगा। भारत की कोशिश थी कि अप्रैल 2020 से पहले की स्थिति बरकरार हो जाए, लेकिन यह होता हुआ नहीं दिखता। हां, शांति जरूर दिख रही है। उनका कहना है कि देपसांग का मसला हल हो पाना बेहद मुश्किल है, क्योंकि भारत के पास सिर्फ पैंगोंग त्सो में बढ़त थी, समझौते के बाद वो भी अब नहीं रही।

अब देपसांग और डेमचोक के लिए काफी समस्या होने वाली है। वे कहते हैं कि देपसांग की स्थिति और पैंगोंग की स्थिति को एक-जैसा नहीं मान सकते। पैंगोंग झील के इलाके में सेनाएं इतनी करीब थीं कि कभी भी युद्ध जैसी स्थिति हो सकती थी। लेकिन देपसांग में सेनाएं बिल्कुल आमने-सामने नहीं हैं। यह जरूर है जरूरत होने पर कम समय में आमने-सामने आ सकती हैं।

देपसांग की फांस

चीनी सैनिकों ने देपसांग मैदान पर 1962 में कब्जा कर लिया था। कई वार्ताओं के बाद वहां से पीछे हटे। लेकिन 2013 में चीनी सैनिकों ने इसके 19 किलोमीटर भीतर आकर भारत के सैन्य शिविर उखाड़ दिए। चीनी सेना ने 2002 और 2013 के समझौतों के अंगूठा दिखाते हुए इस क्षेत्र में लगभग एक हजार वर्ग किलोमीटर जमीन फंसा रखी है।

देपसांग मैदान के बज्ल कहे जाने वाले इलाकों में चीनी सैनिक और टैंक जमे हुए हैं। बंकर और अन्य निर्माण भी कर लिए हैं। भारतीय सेना बीते 15 साल से डेपसांग के सामरिक महत्त्व के अपने इलाकों में स्थिर नहीं रह पाई है। वहां चीन ने दो ब्रिगेड तैनात कर रखे हैं, जिससे भारतीय सेना का गश्त बिंदु 10 से 13 तक का संपर्क टूट गया है। भारत के लिए देपसांग अहम है। वहां पूर्व में काराकोरम दर्रा, दौलत बेग ओल्डी पोस्ट से 30 किमी दूर है। यह क्षेत्र 972 वर्ग किमी में है।

कितना महत्त्वपूर्ण देमचोक

चीन-भारत के रणनीति ठिकानों के लिहाज से देमचोक गांव की काफी अहमियत है। भारत-चीन की वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) इस गांव से गुजरती है। गांव के एक हिस्से में भारत तो दूसरे में चीन की हुकूमत चलती है। चीन यह दावा करता है कि यह पूरा इलाका उसके तिब्बत का हिस्सा है। गांव के दक्षिण-पूर्व की ओर चार्डिंग नाला है, जो एलएसी तक गया है।

झरने के उस पार, मुश्किल से एक किलोमीटर दूर, चीन अपना दखल जमाए हुए है। वहां इस गांव का नाम है डेमकोग। यह चीन के कब्जे में है। भारत कहता है कि देमचोक के दक्षिण-पूर्व में कम से कम साढ़े चार किलोमीटर तक सीमा फैली हुई है। दूसरी तरफ, चीन का कहना है कि देमचोक के उत्तर-पश्चिम में 16 किलोमीटर तक सीमा रेखा चली गई है।

क्या कहते
हैं जानकार

जो बातचीत हुई है, उसमें दोनों देशों ने एक तरह से संतोष जताया है। पैंगोंग त्सो इलाके के गतिरोध का बातचीत से समाधान निकाला है। लेकिन हमें 25 जून की वार्ता को भी नहीं भूलना चाहिए, जब गलवान से एक-डेढ़ किलोमीटर पीछे हटकर चीनी सैनिक ठहर गए थे।
– लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) संजय कुलकर्णी, रक्षा विशेषज्ञ

चीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। अब तक जो भी आरंभिक कदम उठाए गए हैं, वे संकेत देते हैं कि स्पानगुर खड्ड के सामने पड़ते पैंगोंग त्सो झील के दक्षिणी किनारे पर स्थित पहाड़ियों की ऊंचाई पर तैनात सैनिकों को नीचे नहीं उतारा गया है।
– पी स्टाबडन, पूर्व राजनयिक एवं भारत-चीन मामलों के जानकार

भविष्य की चुनौती

रक्षा विशेषज्ञ लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) एसएस पनाग 10वें दौर की वार्ता के नतीजों को लेकर कहते हैं, ‘कुल मिलाकर कहें तो भारत ने चीन की 1959 की दावेदारी को सिंधु घाटी में डेमचोक-फुकचे क्षेत्र को छोड़ बाकी पूरे क्षेत्र में नई एलएसी के तौर पर स्वीकार कर लिया है। संभवत: बफर जोन के साथ और देपसांग मैदान के दक्षिणी आधे हिस्से, उत्तरी पैंगोग त्सो और विविध धारणाओं वाले अन्य क्षेत्रों में और सैन्य तैनाती/गश्त/बुनियादी ढांचे के निर्माण के बिना।

वर्ष 1959 की दावेदारी की बिंदु पहले से ही अच्छी तरह से रेखांकित है और इसी तरह बफर जोन भी, जो इसके और मौजूदा एलएसी के बीच स्थित हैं। इस समझौते के कारण चीन को मध्य क्षेत्र और पूर्वोत्तर में अन्य सभी दावों को मामूली बदलावों के साथ छोड़ना पड़ सकता है। विडंबना यह है कि इस तरह के समझौते का अंतिम स्वरूप नवंबर 1959 में चाऊ एनलाई की तरफ से रखे गए प्रस्ताव की मिरर इमेज लग सकता है।’

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