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बच्ची से महिला पुलिस अफसर ने कहा- बोल इस नेता ने मेरा रेप किया, झूठ नहीं बोलने पर कैद कर बार-बार मेडिकल करवाया

श्रीलंका में महिला पुलिस अधिकारी को सुप्रीम कोर्ट ने एक नाबालिग बच्ची को गैरकानूनी हिरासत में रखने और डराने-धमकाने के मामले में दोषी पाया है। अदालत ने इस मामले में महिला पुलिस अधिकारी द्वारा पीड़ित को 1 लाख रुपये हर्जाना देने का भी आदेश दिया।

Author नई दिल्ली | June 15, 2019 10:57 AM
अदालत ने पुलिस से लोगों के मूलभूत अधिकारों की रक्षा की बात याद दिलाने को कहा। (फाइल फोटोःएपी)

श्रीलंका में एक महिला पुलिस अधिकारी को  15 साल की नाबालिग बच्ची को गैरकानूनी ढंग से हिरासत में रखने और उसे डराने धमकाने के मामले में सजा सुनाई। वहीं की सुप्रीम कोर्ट ने महिला पुलिस अधिकारी की तरफ से पीड़ित बच्ची को 1 लाख रुपये दिए जाने का भी आदेश दिया।

अदालत ने कहा कि इसमें से 50 हजार रुपये तुरंत दिए जाएं। मामले के अनुसार चीफ इंस्पेक्टर वारुणी बोगहावट्टे बच्ची पर यह स्वीकार करने के लिए दबाव डालती रही की एक स्थानीय राजनेता ने उससे रेप किया है। ऐसा नहीं करने पर महिला पुलिस अधिकारी ने बच्ची का बार-बार मेडिकल कराया जिससे कि यह साबित किया जा सके कि उसका यौन उत्पीड़न किया गया है। वारुणी को साल 2017 में सर्वेश्रेष्ठ महिला पुलिस अधिकारी का पुरस्कार मिल चुका है।

तीन जजों की पीठ ने कहा कि महिला पुलिस अधिकारी ने अपने अधिकारा का दुरुपयोग किया के साथ ही लड़की के मूलभूत अधिकारों का भी हनन किया है। इसके साथ ही उनसे लड़की के परिवार वालों को भी डराया धमकाया। इससे पहले साल 2012 में पुलिस इंस्पेक्ट वारुणी ने अकुरेसा के दक्षिणी शहर में लड़की को बार-बार स्थानीय नेता के खिलाफ गलत बयान देने के लिए जोर डाला।

जब लड़की ने कहा कि उसके साथ रेप या यौन उत्पीड़न की घटना नहीं हुई है तो उसे मटारा पुलिस स्टेशन में गैरकानूनी रूप से बंद कर दिया है। इसके अलावा लड़की का चार बार मेडिकल भी कराया जिसमें रिपोर्ट नेगेटिव रही। महिला इंस्पेक्टर ने लड़की को जूवेनाइल नियमों का उल्लंघन करते हुए व्यस्कों के सेल में बंद किया।

दोषी पाए जाने पर जा सकती है नौकरीः  पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि कोर्ट के इस फैसले के बाद महिला पुलिस अधिकारी को दिए अवॉर्ड वापस ले लिए जाएंगे। इसके अलावा उसके खिलाफ आंतरिक जांच भी की जाएगी। इसमें दोषी पाए जाने पर महिला चीफ इंस्पेक्टर की नौकरी भी जा सकती है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस से कहा कि वह अपने स्टाफ को यह बताए कि नागरिकों के मूलभूत अधिकारों की रक्षा किए जाने की जरूरत है।

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