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बांग्लादेश के स्कूलों में पढ़ाई से वंचित किए जा रहे रोहिंग्या मुस्लिमों के बच्चे

रोहिंग्या मुस्लिमों की भाषा और संस्कृति दक्षिण-पूर्वी बांग्लादेश के लोगों से मिलती-जुलती है। अधिकारी रोहिंग्या को अस्थायी मेहमान मानते हैं और उनके बच्चों को स्थानीय स्कूलों में दाखिले से रोका जाता है।

Author ढाका | Published on: June 18, 2019 5:54 PM
हिंग्या बच्चों को बांग्लादेश के स्थानीय स्कूलों में पढ़ाई से वंचित होना पड़ा है। इनमें से कई बच्चों को पढ़ाई के लिए अब मदरसों का रुख करना पड़ा है।

करीब पांच लाख रोहिंग्या बच्चों को बांग्लादेश के स्थानीय स्कूलों में पढ़ाई से वंचित होना पड़ा है। इनमें से कई बच्चों को पढ़ाई के लिए अब मदरसों का रुख करना पड़ा है, जिसके बारे में आलोचकों का कहना है कि मदरसों में शिक्षा का स्तर नीचा है और वहां छात्रों में कट्टरपंथी भावनाएं पैदा करने की आशंका रहती है। साल 2017 में म्यांमा की सेना की ओर से की गई दमनकारी कार्रवाई के कारण करीब 740,000 रोहिंग्या मुस्लिमों को भागकर बांग्लादेश में पनाह लेनी पड़ी। इससे बांग्लादेश में रोहिंग्या मुस्लिमों की संख्या बढ़कर करीब 10 लाख हो गई।

रोहिंग्या मुस्लिमों की भाषा और संस्कृति दक्षिण-पूर्वी बांग्लादेश के लोगों से मिलती-जुलती है। अधिकारी रोहिंग्या को अस्थायी मेहमान मानते हैं और उनके बच्चों को स्थानीय स्कूलों में दाखिले से रोका जाता है। इससे एक पूरी पीढ़ी के अशिक्षित रहने की आशंका पैदा हो गई है। कई रोहिंग्या बच्चे इस साल की शुरुआत तक पकड़ में आने से बचते रहे, लेकिन जब प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार ने सख्ती की और स्कूलों को इन बच्चों को निष्कासित करने के आदेश दिए तो उनकी मुश्किलें बढ़ गईं।

हनीला विलेज स्कूल की छात्रा लकी अख्तर (15) को अपना स्कूल छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। उसके स्कूल में एक-तिहाई बच्चे शरणार्थी शिविरों के थे। अब उसके पास घर में अपनी मां के काम में हाथ बंटाने के अलावा कोई काम नहीं बचा। अख्तर ने रोते हुए एएफपी को बताया, ‘‘मैं डॉक्टर बनना चाहती थी, लेकिन मुझे नहीं लगता कि यह संभव होगा।’’ मानवाधिकार संगठनों ने सरकार की नीति की आलोचना की है।

परमार्थ संगठनों और संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी यूनिसेफ ने शरणार्थी शिविरों में करीब 1800 अस्थायी इकाइयां बनाई हैं, जिनमें करीब 180,000 छात्रों को प्राथमिक स्तर की शिक्षा दी जा रही है। रोहिंग्या संगठनों एवं बांग्लादेशी इस्लामियों ने 1000 से ज्यादा मदरसे स्थापित किए हैं। एक स्थानीय मदरसे के प्रधानाध्यापक ने कहा, ‘‘यदि किसी में शिक्षित होने और अल्लाह की बताई राह पर चलने की ललक है तो हम लोगों के बीच राष्ट्रीयता के आधार पर कोई अंतर नहीं करते।’’

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