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भारत कर सकता है पेशकश, पहले एनएसजी के लिए चीन पर दबाव डाले रूस, तभी परमाणु संयंत्रों पर नए सौदे

चीन पर रूस दबाव डाले और भारत से कुडनकुलम परमाणु संयंत्र की दो नई इकाइयों का सौदा हासिल कर ले।

Author नई दिल्ली | Published on: May 22, 2017 2:57 AM
चीन ने भारत की एनएसजी सदस्यता का विरोध किया था और एनपीटी को इसके लिए एक अनिवार्य शर्त बताया था।

चीन पर रूस दबाव डाले और भारत से कुडनकुलम परमाणु संयंत्र की दो नई इकाइयों का सौदा हासिल कर ले। परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) की सदस्यता के लिए अपनी राह में रोड़ा बने चीन को साधने के लिए भारत रूस से यह पेशकश करने की तैयारी में है। एक जून से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस यात्रा के दौरान वहां के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ उनकी बातचीत में एनएसजी का मुद्दा शिद्दत से उठाए जाने की तैयारी है। जून में स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न में होने जा रहे एनएसजी के अगले पूर्ण अधिवेशन में भारत की सदस्यता के मुद्दे पर चर्चा होनी है। इस मुद्दे पर चीन के लगातार और खुलेआम भारत विरोधी रुख के कारण सदस्यता का मामला लगातार अटक रहा है। विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, एनएसजी के अगले पूर्ण अधिवेशन से पहले भारत ने 48 देशों के इस समूह की सदस्यता हासिल करने के लिए अपनी कोशिशें फिर से शुरू कर दी हैं। उसने सभी सदस्य देशों से बात की है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस जैसे अन्य प्रमुख देशों के समर्थन के बावजूद चीन अब भी अपने रुख पर अड़ा है।

रूस के जरिए चीन को साधने के लिए विदेश मंत्रालय ने हाल में अपनी रणनीति को ठोस रूप दिया है। प्रधानमंत्री मोदी की रूस यात्रा का एजंडा निर्धारित करने के लिए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और भारत यात्रा पर आए रूस के उप प्रधानमंत्री दमित्री रोगोजिन के बीच मुलाकात में एनएसजी पर चीन का रुख और कुडनकुलम परियोजना की इकाई नंबर पांच और छह पर समझौते के बाबत बातचीत हुई। रोगोजिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात में भी इस मुद्दे को उठाया पर कोई ठोस आश्वासन पाने में नाकाम रहे। भारत का तर्क है कि एनएसजी की सदस्यता में रोड़ा अटकने से हम इस संयंत्र के लिए स्वदेशी तकनीक विकसित करने को मजबूर हैं। वहां एक और दो नंबर का इकाइयों में उत्पादन चल रहा है। तीन और चार का निर्माण चल रहा है।

विदेश मंत्रालय के एक आला अधिकारी के अनुसार, चीन के वन बेल्ट-वन रोड (ओबीओआर) परियोजना में रूस महत्त्वपूर्ण भागीदार है। रूस को साथ लाने के लिए चीन ने बेहद कसरत की थी। इस परियोजना के लिए बेजिंग में बुलाए सम्मेलन में शिरकत करने से भारत ने साफ इनकार कर दिया। भारतीय अधिकारियों का मानना है कि कुडनकुलम का दबाव डालने से रूस एनएसजी के मुद्दे पर चीन पर दबाव डालेगा। इसी योजना के तहत सुषमा और दमित्री की बैठक में एनएसजी और कुडनकुलम को जोड़ते हुए बात रखी गई। भारतीय अधिकारी उम्मीद जता रहे हैं कि रूस से दबाव डलवाने से चीन के रुख में बदलाव आ सकता है। ओबीओआर में भारत के नहीं शामिल होने से भी इस देश पर दबाव बढ़ा है। हालांकि, चीन के राजदूत लुओ झाओहुइ ने यहां पिछले महीने एक कार्यक्रम में संकेत दिया था एनएसजी की सदस्यता के लिए भारत की कोशिशों के प्रति उनके देश के रुख में कोई फर्क नहीं आया है। उन्होंने कहा था, ‘परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) मुद्दे पर हम यह मानते हुए किसी देश की सदस्यता का विरोध नहीं करते कि पहले दाखिले के लिए किसी मानक पर सहमत होना जरूरी है।’ जबकि, भारत ने लगातार कहा है कि चीन ‘एक देश’ है जो उसकी कोशिशों को रोक रहा है।

…तो फिर स्वदेशी तकनीक

भारत ने एक तरह स्पष्ट कर दिया है कि अगर उसे एनएसजी की सदस्यता नहीं मिली तो परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में विदेशी सहयोग का कोई मतलब नहीं है और इसकी बजाय वह स्वदेशी तकनीक विकसित करेगा। रूस हालांकि एनएसजी में भारत की सदस्यता का पक्षधर है। पर भारत का कहना है कि चीन का घनिष्ठ सहयोगी होने के नाते रूस एनएसजी की सदस्यता में रोड़े नहीं अटकाने के लिए उस पर दबाव डाले।
कुडनकुलम पर अब तक लाल झंडी
मोदी की यात्रा की तैयारियों को अंतिम रूप देने के लिए हाल ही में भारत आए रूसी उप प्रधानमंत्री दमित्री रोगोजिन ने विदेश मंत्री सुषमा स्वाराज से बातचीत में कुडनकुलम में परमाणु संयंत्रों के निर्माण के समझौते पर बात की। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के समक्ष भी इस मुद्दे को उठाया पर कोई ठोस आश्वासन पाने में नाकाम रहे। इस समझौते पर पिछले साल गोवा में हुई ब्रिक्स बैठक के दौरान ही दस्तखत होने थे।

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