यह 900 साल पुराना धाकेश्वरी मंदिर है। यहां दर्शन करने के लिए 36 साल का एक शख्स अपनी 3 साल की बेटी के साथ आया है। मंदिर के आंगन में छोटी बच्ची खेल रही है और पिता अपने परिवार की सुरक्षा के लिए प्रार्थना कर रहा है। वह बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति पर चिंता जताते हुए कहता है, “मेरे माता-पिता इसी देश में शिक्षक रहे हैं। उन्होंने सम्मानजनक पद पर काम किया है। 2001 से 2006 के बीच, जब मैं स्कूल में पढ़ता था, तब यहां हिंदुओं के खिलाफ काफी हिंसा हो रही थी। उस समय बांग्लादेश में बीएनपी-जमात गठबंधन की सरकार थी। तब हमने सोचा था कि हमें देश छोड़ देना चाहिए, लेकिन मेरे माता-पिता कहते थे कि हम इस देश से प्यार करते हैं, हम यहीं के रहने वाले हैं, तो इसे छोड़कर क्यों जाएं? लेकिन आज जब मैं अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोचता हूं, तो लगता है कि तब हमने गलती कर दी थी।”

ढाका से करीब 100 किलोमीटर दूर अप्पू दास के भाई दीपू दास की भी बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। उसे जिंदा जला दिया गया। आज भी दास का परिवार न्याय की उम्मीद लगाए बैठा है। दीपू को याद करते हुए परिवार कहता है कि वह बेहद नेकदिल इंसान था और घर का अकेला कमाने वाला सदस्य था। “हमने उसे बहुत जल्दी खो दिया। अब बस यही उम्मीद है कि हमें न्याय मिल जाए।”

दूसरी ओर, कम्युनिटी लीडर बासुदेव धार ढाका से किशोरगंज गए। उन्हें सूचना मिली थी कि हिंदुओं को डराया-धमकाया जा रहा है, ताकि वे मतदान न कर सकें। वासुदेव धार ने तुरंत स्थानीय प्रशासन से बात की और आश्वासन मिलने के बाद लौट आए। बांग्लादेश में 12 फरवरी को मतदान होना है, लेकिन हिंदू समुदाय में असुरक्षा का माहौल साफ दिखाई दे रहा है। लोग डर के साए में जी रहे हैं और अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। चर्चा है कि बीएनपी और जमात का गठबंधन एक बार फिर सत्ता में लौट सकता है, जिससे अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय में बेचैनी बढ़ी हुई है।

बांग्लादेश में करीब 90 फीसदी आबादी मुस्लिम है, जबकि लगभग 1.3 करोड़ हिंदू रहते हैं। 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से देश की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। सत्ता परिवर्तन के बाद हिंदू समुदाय खुद को निशाने पर महसूस कर रहा है, जिसे कभी शेख हसीना का बड़ा वोट बैंक माना जाता था। कम्युनिटी लीडर्स के मुताबिक, पिछले 18 महीनों में टारगेटेड हिंसा के 27 मामले सामने आए हैं।

कम्युनिटी ग्रुप के सदस्य मनिंद्र कुमार नाथ का कहना है कि मोहम्मद यूनुस ने सभी की सुरक्षा का वादा किया था, लेकिन अंतरिम सरकार इस मोर्चे पर विफल रही है। इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय डर और तनाव में जीने को मजबूर है। हत्याएं, बलात्कार और मंदिरों पर हमलों की घटनाएं हो रही हैं। उनका कहना है कि इस समय सेक्युलरिज्म सबसे बड़ा मुद्दा है और देश में सभी को समान अधिकार मिलने चाहिए। वे यह भी आरोप लगाते हैं कि मोहम्मद यूनुस हमलों को राजनीतिक हत्याएं बताकर अल्पसंख्यकों पर हो रही हिंसा को स्वीकार नहीं कर रहे हैं।

फिलहाल, सभी की नजर बीएनपी और जमात के गठबंधन पर है। कहा जा रहा है कि यह गठबंधन चुनाव में सबसे बड़ी ताकत बनकर उभर सकता है। बीएनपी के मेनिफेस्टो में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का वादा किया गया है। इसमें कहा गया है कि धर्म निजी मामला है, लेकिन देश सभी का है। धार्मिक स्वतंत्रता की भी बात कही गई है और भरोसा दिलाया गया है कि हर व्यक्ति बिना डर के अपने धर्म का पालन कर सकेगा। वहीं जमात-ए-इस्लामी ने अपने घोषणापत्र में कहा है कि वह ऐसा माहौल बनाना चाहती है, जहां सभी लोग, चाहे वे किसी भी धर्म या जाति के हों, खुलकर अपनी बात रख सकें और सम्मान के साथ जीवन जी सकें।

हालांकि, अल्पसंख्यक समुदाय के नेता इन बयानों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम क्या होंगे। एक अन्य नेता राणा दास गुप्ता का कहना है कि पिछले 18 महीनों से वे छिपकर रहने को मजबूर हैं और उन्हें जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं। आंकड़ों के मुताबिक, 300 सीटों में बीएनपी ने केवल कुछ ही अल्पसंख्यक उम्मीदवारों को टिकट दिया है, जबकि जमात-ए-इस्लामी ने भी बहुत सीमित प्रतिनिधित्व दिया है।

शिक्षा सलाहकार डॉ. सी.आर. अबरार का कहना है कि अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमले किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हैं। दीपू चंद्र दास की हत्या जैसे मामलों को किसी भी हालत में सही नहीं ठहराया जा सकता। उनका कहना है कि सरकार भले ही सहायता और सुरक्षा के दावे कर रही हो, लेकिन किसी की जान जाने के बाद वह भरपाई संभव नहीं है।

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