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क्या आपको पहले विश्व युद्ध की चीखें नहीं सुनाई देतीं?

चंद हफ्ते और बचे हैं. फिर 2018 इतिहास के पन्नों में सिमट जाएगा. लेकिन उससे पहले थोड़ा रुकिए और इतिहास के कुछ पन्नों को पलटिए. ठीक सौ साल पहले की बात है. नवंबर का ही महीना था, जब चार साल तक चलने वाला और करोड़ों लोगों की बलि लेने वाला पहला विश्व युद्ध खत्म हुआ था।

Author November 13, 2018 4:08 PM
अतीत का हिस्सा बन चुकी इन त्रासदियों को आज याद करना जरूरी है कि क्योंकि आए दिन हम इस सवाल से रूबरू होते हैं कि क्या दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के कगार पर खड़ी है? (Source: Wikipedia)

चंद हफ्ते और बचे हैं. फिर 2018 इतिहास के पन्नों में सिमट जाएगा. लेकिन उससे पहले थोड़ा रुकिए और इतिहास के कुछ पन्नों को पलटिए. ठीक सौ साल पहले की बात है. नवंबर का ही महीना था, जब चार साल तक चलने वाला और करोड़ों लोगों की बलि लेने वाला पहला विश्व युद्ध खत्म हुआ था. लेकिन इतिहास में दफन चीखों से दुनिया ने कोई सबक नहीं लिया. तभी तो पहला विश्व युद्ध खत्म होने के सिर्फ बीस साल बाद करोड़ों लोगों को फिर दूसरे विश्व युद्ध में झोंक दिया गया. अतीत का हिस्सा बन चुकी इन त्रासदियों को आज याद करना जरूरी है कि क्योंकि आए दिन हम इस सवाल से रूबरू होते हैं कि क्या दुनिया तीसरे विश्व युद्ध के कगार पर खड़ी है? हाल के सालों में आपने कई बार सुना होगा कि दुनिया मंदी की चपेट में है. और किसी ना किसी तरह उनके दुष्परिणाम भी झेले होंगे. लेकिन क्या कभी आपने किसी हथियार कंपनी को यह कहते हुए सुना है कि इस साल उसे घाटा हुआ है. दुनिया में हथियारों का उद्योग उफान पर है. जब भी किसी डिफेंस डील का जिक्र आता है तो सौदा अकसर अरबों डॉलर में होता है. गरीबी, भुखमरी और कुपोषण से लड़ने के लिए सरकारें सालों तक सोच विचार करती हैं और लंबी चौड़ी योजनाएं बनाती हैं. तब कहीं जाकर कुछ होता है. लेकिन अरबों डॉलर के रक्षा सौदों पर फैसले कई बार एक झटके में ले लिए जाते हैं. इसकी वजह युद्धोन्माद नहीं तो क्या है?

सीरिया, इराक, यमन, अफगानिस्तान और अफ्रीका के कई देशों में खूनी संघर्ष की चिंगारियां लगातार सुलग रही हैं, जिनकी लपटें यूरोप और अमेरिका तक भी पहुंच रही हैं. लेकिन हम दुनिया के कई इलाकों में लड़ाई के नए मोर्चे बनते देख रहे हैं. अगर ऐसा नहीं है तो फिर पश्चिमी सैन्य संगठन नाटो को क्यों नॉर्वे में शीत युद्ध के बाद अपना सबसे बड़ा सैन्य अभ्यास करना पड़ रहा है. अमेरिका और जर्मनी समेत कुल 31 देशों ने अपने 50 हजार सैनिक, 10 हजार बख्तरबंद गाड़ियां, 250 विमान और 65 पोत इस सैन्य अभ्यास में उतारे. यह असाधारण तैयारी युद्ध के लिए ही हो सकती है. खासकर यूरोप को खतरा रूस से है, जो लगातार ऐसे ही बड़े सैन्य अभ्यास कर डराने की पूरी कोशिश करता रहता है.
जब से रूस ने यूक्रेन के इलाके क्रीमिया को कब्जाया है, तब से यह साफ हो गया है कि जंग का डर निराधार भी नहीं है।

इसी साल रूस ने परमाणु क्षमता वाली इस्कांदेर मिसाइल को बाल्टिक सागर के पास अपने इलाके कालिनिनग्राद में तैनात किया. कालिनिनग्राद की सीमाएं पोलैंड और लिथुआनिया से मिलती हैं. 310 मील की दूर तक मार करने वाली मिसाइल कालिनिनग्राद में तैनात है तो इसका मतलब है कि पोलैंड, लिथुआनिया, लात्विया और एस्टोनिया जैसे नाटो सदस्य उसकी जद में हैं. उधर, एशिया में जिस रफ्तार से चीन और भारत की अर्थव्यवस्थाएं बढ़ रही हैं, उससे भी कहीं तेजी से उनके अत्याधुनिक हथियारों का जखीरा बढ़ रहा है. इस बारे में सुरक्षा चुनौतियों के तर्क हमेशा दिए जाएंगे. उन पर बहस की जा सकती है. लेकिन आखिरकार नतीजा यही निकलता है कि हथियारों की रेस लगातार तेज होती जा रही है. इससे एक तरफ दुनिया भर में एक दूसरे को लेकर भरोसे में आ रही लगातार कमी का पता चलता है, वहीं संवाद और कूटनीति में भी अविश्वास बढ़ता जा रहा है. ऐसे में, युद्ध के रास्ते पर ही आगे बढ़ने के सिवाय हम कहां जा रहे हैं. चीन की आक्रामकता ने जापान, दक्षिण कोरिया और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों को अपनी रक्षा तैयारियां बेहतर करने के लिए मजबूर कर दिया है।

दुनिया भर में हथियारों की खरीद फरोख्त पर नजर रखने वाली संस्था सिपरी का कहना है कि 2017 में दुनिया ने 1.7 ट्रिलियन डॉलर सिर्फ हथियारों और अपनी सेनाओं पर खर्च किया. सबसे ज्यादा सैन्य खर्च वाले टॉप 5 देशों में भारत भी शामिल है जिसका सैन्य खर्च लगभग 64 अरब डॉलर था. हालांकि इस लिस्ट में 610 अरब डॉलर के साथ अमेरिका पहले नंबर पर है जबकि 228 अरब डॉलर के साथ चीन दूसरे नंबर पर. भारत का प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान इस मामले भले ही काफी पीछे हो, लेकिन उसके पास भारत से ज्यादा परमाणु बम बताए जाते हैं. यही नहीं, अब वह छोटे छोटे परमाणु बम बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है. ऐसे में भारत का परेशान होना लाजिमी है. दूसरी तरफ भारत ने जब रूस से एस-400 मिसाइल रक्षा सिस्टम खरीदने का एलान किया तो पाकिस्तान ही नहीं बल्कि चीन की भवें भी तन गईं।

शांति के नारे बुलंद करने वाले कितना भी शोर मचाएं, लेकिन परमाणु हथियार हासिल करने की लालसा दुनिया में बढ़ती जा रही है. खासकर इस वक्त सबसे बड़ा सिरदर्द उत्तर कोरिया के शासक किम जोंग उन हैं, जिनके परमाणु परीक्षणों की गूंज बीते दो साल में बराबर गूंजती रही है. कुछ साल पहले ऐसी ही चिंताएं ईरान को लेकर जताई जाती थी. फिर जब ईरानी परमाणु कार्यक्रम को लेकर डील हुई तो ये चिंताएं कुछ कम हुईं. लेकिन अब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने परमाणु डील से निकलने के बाद ईरान पर प्रतिबंधों का घेरा तंग कर दिया है, तो देखना होगा कि ईरान किस तरफ जाएगा. अब तक वह बातचीत और संवाद की राह पर ही कायम है, लेकिन हालात बिगड़े तो वह फिर से उसी रास्ते पर लौट सकता है. कम से कम दुनिया पर दबाव बनाने के लिए तो वह ऐसा कर ही सकता है।

कुल मिलाकर एशिया से लेकर अफ्रीका और यूरोप से लेकर अमेरिका तक, दुनिया बारूद के ढेर पर बैठी दिखाई देती है. लगता है कि बस एक चिंगारी की जरूरत है. इसीलिए इतिहास के पन्नों को पलटना जरूरी है. उनमें दबी पहले और दूसरे विश्व युद्ध की चीखों को सुनना जरूरी है. तभी हमारे कान खुलेंगे. वरना युद्धोन्माद के गगनभेदी नारों के बीच शांति की पुकारों को हमारे कानों ने सुनना ही बंद कर दिया है।

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