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जर्मनी और यहूदी विरोध की समस्या

पिछले सालों में जर्मनी में यहूदियों के खिलाफ आपराधिक घटनाओं में तेजी आई है। घरेलू खुफिया एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार यहूदियों और यहूदी संस्थानों पर हमले के करीब 1500 मामले दर्ज किए। इनमें से अधिकांश अपराधी उग्र दक्षिणपंथी थे।

Military Budget, Military Budget of world, Military Budget of germany, Military Budget of europe, Military Budget in india, Military Budget in germany, Military Budget article, article on Military Budget, Tensions in Germany, International newsजर्मन चांसलर एंजेला मर्केल। (Reuters Photo)

बर्लिन में मारपीट की एक छोटी घटना ने अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बटोरीं। वजह थी यहूदी टोपी किप्पा पहने दो लोगों पर किया गया हमला। पहले गाली गलौज, फिर बेल्ट से पिटाई। पीड़ित यहूदी नहीं थे, उन्होंने दोस्तों से तोहफे में मिला किप्पा पहन रखा था और संदिग्ध हमलावर सीरिया का शरणार्थी था। पीड़ित ने बाद में बताया कि वह इस्राएल का अरब है और इस बात की जांच करने के लिए निकला था कि क्या जर्मनी सचमुच यहूदियों के लिए खतरनाक जगह हो गई है। जर्मनी और यूरोप में यहूदी विरोध का लंबा इतिहास रहा है। इसकी पराकाष्ठा नाजी जर्मनी में यहूदी नरसंहार के रूप में सामने आई। यहूदियों का देश इस्राएल बनने के बाद जर्मनी ने अपनी जिम्मेदारी स्वीकार की है और इस्राएल के समर्थन और एंटी सेमिटिज्म के विरोध को राजकीय सिद्धांत मानता है। यहूदियों के लिए जर्मनी में फिर से पांव जमाने और यहां एक जीवंत यहूदी समाज के लिए माहौल तैयार किया गया है। फिर भी उग्र दक्षिणपंथी समुदायों के बीच यहूदी विरोध एक समस्या रही है।

खासकर इस्राएल फलस्तीनी विवाद के दौरान यहूदी विरोध इस्राएल के विरोध के रूप में भी सामने आया है। जब से जर्मनी ने मध्यपूर्व के मुस्लिम देशों से लाखों की तादाद में शरणार्थी लिए हैं, ये समस्या नए रूप में सामने आ रही है। मुस्लिम देशों में इस्राएल विरोध का लंबा इतिहास रहा है। लेकिन अक्सर इस्राएल और यहूदियों में अंतर नहीं किया जाता। कुछ समय पहले अमेरिका द्वारा येरूशलम को मान्यता देने के बाद जर्मनी में एक प्रदर्शन के दौरान इस्राएल के झंडे और यहूदी प्रतीकों को जलाए जाने पर जर्मनी का राजनीतिक और बुद्धिजीवी वर्ग चौंक गया। जर्मनी में लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन की परंपरा में झंडों को जलाने जैसा कोई चलन नहीं है और फिर जर्मनी में यहूदी सितारे को जलाया जाना द्वितीय विश्वयुद्ध की आग में झुलसे देश के लिए पुरानी यादों को कुरेदने जैसा था। जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल सहित सभी राजनेताओं इस घटना पर क्षोभ व्यक्त किया और शरणार्थियों के बीच यहूदी विरोध बहस का बड़ा मुद्दा बन गया।

पिछले सालों में जर्मनी में यहूदियों के खिलाफ आपराधिक घटनाओं में तेजी आई है। घरेलू खुफिया एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार यहूदियों और यहूदी संस्थानों पर हमले के करीब 1500 मामले दर्ज किए। इनमें से अधिकांश अपराधी उग्र दक्षिणपंथी थे। ऐसे मामलों की संख्या भी कम नहीं है जिनमें पीड़ित पुलिस को रिपोर्ट नहीं करते हैं। पिछले समय में स्कूलों में भी यहूदी बच्चों को तंग किए जाने की घटनाएं सामने आई हैं। बर्लिन में दूसरी क्लास की एक बच्ची को इसलिए साथी बच्चों ने तंग किया कि वह अल्लाह को नहीं मानती।

जर्मन राजनेता इस स्थिति से चिंतित हैं। सत्ताधारी सीएसयू पार्टी के नेता अलेक्जांडर डोब्रिंट का कहना है कि स्कूल धार्मिक विवाद की जगह बनें, इसे स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। उग्र दक्षिणपंथी एएफडी स्कूलों में इस्लामी कट्टरपंथ के बढ़ने की चेतावनी दे रही है तो बहुत से प्रांतों में इसके खिलाफ उठाए जा सकने वाले कदमों पर भी बहस हो रही है। शरणार्थियों के लिए जर्मन इतिहास का कोर्स अनिवार्य करने जैसे प्रस्ताव भी दिए जा रहे हैं। एसपीडी नेता और विदेश मंत्री हाइको मास का मानना है कि एक दूसरे के साथ आदरपूर्ण संबंधों के लिए एक दूसरे के साथ आदरपूर्ण भाषा का इस्तेमाल भी जरूरी है।

समाज में विदेशियों के समन्वय में लगे एक्टिविस्ट भी समाज में पनपता एक तनाव देख रहे हैं। आप्रवासी बच्चों और युवाओं में यहूदी विरोधी भावना के लिए वे परिवारों को भी जिम्मेदार मानते हैं और उन तक पहुंचने की और उन्हें भी इस बहस में शामिल करने की मांग कर रहे हैं। जर्मन मुसलमानों की केंद्रीय समिति के आयमान माजियेक ने स्कूलों में मुस्लिम इमामों और यहूदी रब्बी की संयुक्त सभाओं का भी सुझाव दिया है ताकि बच्चों को एक-दूसरे का आदर करने की बात बताई जा सके।

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