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नस्लवाद पर एक हुए जर्मनी के अल्पसंख्यक

मेसुत ओएजिल ने जर्मनी में एक ऐसी बहस की शुरुआत की है जो फुटबॉल स्टेडियम से बाहर निकल गयी है। फुटबॉल को जर्मनी में विदेशी मूल के लोगों के समाज में घुलने मिलने का साधन समझा जाता रहा है। इसलिए समाज में स्वीकृत समझे जाने वाले ओएजिल की प्रतिक्रिया से पूरा देश हक्का बक्का रह गया।

जर्मनी इस समय एक अलग तरह के मीटू बहस में उलझा है। यौन उत्पीड़न वाले मीटू से अलग ये बहस देश में नस्लवाद को लेकर है। फुटबॉल खिलाड़ी मेसुत ओएजिल ने नस्लवाद का आरोप लगाकर जर्मन राष्ट्रीय टीम से इस्तीफा दे दिया था। ठीक उसके बाद तुर्क मूल के पत्रकार अली खान ने ये मीटू अभियान चलाया जो उन लोगों की आवाज बन गया जो विदेशी मूल के हैं और अब जर्मनी के नागरिक हैं। इस हैशटैग के आने के बाद करीब पचास हजार लोगों ने अपने नस्लवादी अनुभवों के बारे में बताया है और देश में नस्लवाद पर एक बहस की शुरुआत की है। जर्मन संविधान के अनुसार किसी को लिंग, मूल, नस्ल, भाषा, उसके विश्वास या धार्मिक और राजनीतिक विचारों के कारण न तो फायदा पहुंचाया जा सकता है और न ही भेदभाव किया जा सकता है। लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है। यह मीटू पर सोशल मीडिया में चली बहस ने एक हफ्ते के अंदर साबित कर दिया है। शुरू में लोगों ने स्कूलों में अपने साथ हुए भेदभाव के बारे में बताया कि किस तरह उन्हें हायर सेकंडरी स्कूल में जाने से हतोत्साहित किया जाता। फिर मामला कार्य स्थानों पर भेदभाव, नौकरी और मकान मिलने में समस्याओं पर आ गया। जन्म से जर्मनी में रहने वाले लेकिन विदेशी दिखने वाले से भाषा और मूल के बारे में पूछा जाना भी चोट पहुंचाने वाला हो सकता है। या फिर गर्लफ्रेंड के पिता का ये कहना कि विदेशी होने के बावजूद तुम विनम्र लगते हो। लोगों ने सोशल मीडिया पर अपना दिल उड़ेलकर रख दिया।

मेसुत ओएजिल ने जर्मनी में एक ऐसी बहस की शुरुआत की है जो फुटबॉल स्टेडियम से बाहर निकल गयी है। फुटबॉल को जर्मनी में विदेशी मूल के लोगों के समाज में घुलने मिलने का साधन समझा जाता रहा है। इसलिए समाज में स्वीकृत समझे जाने वाले ओएजिल की प्रतिक्रिया से पूरा देश हक्का बक्का रह गया। समस्या की जड़ में जाते हुए प्रतिष्ठित समाचार पत्रिका डेअ श्पीगेल के लिए काम करने वाले दक्षिण एशियाई मूल के पत्रकार हसनैन काजिम कहते हैं, “जबतक दूसरे देशों के लोग मशीन पर काम कर रहे थे, कूड़ा फेंक रहे थे या सफाई कर रहे थे, तब तक सब ठीक था। उस समय वे सिर पर स्कार्फ भी पहन सकते थे। अब जब उनके बच्चे, नाती-पोते डॉक्टर, इंजीनियर, वकील और पत्रकार हैं, अब जब वे सहभागिता की मांग कर रहे हैं, जो उनके जर्मन होने के नाते स्वाभाविक है, तो उनके समाज में घुलने मिलने में कमियों की बात की जा रही है।” सोशल मीडिया में चल रही बहस को जर्मन मीडिया में भी काफी स्थान मिला है। न सिर्फ विदेशी मूल के लोगों के अनुभवों पर चर्चा की जा रही है बल्कि आप्रवासन विशेषज्ञों के साथ बातचीत भी की जा रही है।

मीटू बहस के दौरान हुए एक सर्वे में जर्मनी के करीब 64 प्रतिशत लोगों ने नस्लवाद को बड़ी समस्या माना है। वामपंथी रुझान वाले एसपीडी और ग्रीन पार्टियों में 77 प्रतिशत लोग न्स्लवाद को समस्या मानते हैं जबकि चांसलर अंगेला मैर्केल की रूढ़िवादी सीडीयू में भी करीब 59 प्रतिशत लोग नस्लवाद को देश की चुनौती समझते हैं। सिर्फ उग्र दक्षिणपंथी और आप्रवासन विरोधी एएफडी पार्टी से जुड़े सिर्फ 37 प्रतिशत लोग इसे एक समस्या समझते हैं।

मीटू बहस ने जहां एक और समाज में व्याप्त नस्लवाद को सामने लाने का काम किया है तो ऐसे लोग भी हैं जिनका कहना है कि सभी जर्मनों पर नस्लवादी होने का आरोप लग रहा है। जर्मनी के सबसे ज्यादा बिकने वाले अखबार बिल्ड ने कहा है कि बहस में उन जर्मनों को आम तौर पर नस्लवादी ठहराया जा रहा है जो विदेशी पृष्ठभूमि के नहीं हैं। बहुत से आप्रवासी भी इस आलोचना में शामिल हो गए हैं कि आप्रवासियों को खुद को पीड़ित नहीं समझना चाहिए। अभियान चलाने वाले अली खान का कहना है कि लोग आप्रवासियों की बात सुनें और मानें कि हजारों लोगों ने नस्लवादी अनुभव किए हैं। इन अनुभवों के आधार पर ही भविष्य में उन्हें रोकने के कदम उठाए जा सकेंगे। यूं तो जर्मनी में 2007 से ही समान बर्ताव कानून लागू है जो लिंग, मूल, भाषा और अन्य आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को रोकता है। लेकिन इसके बावजूद समाज से भेदभाव पूरी तरह दूर नहीं हुआ है। अली खान जैसे लोग नस्लवादविरोधी ट्रेनिंग की वकालत करते हैं ताकि लोगों की नस्लवाद के प्रति संवेदना बढ़ाई जा सके। जर्मनी में हर पांचवां निवासी आप्रवासी पृष्ठभूमि का है जबकि करीब 40 लाख लोग तुर्क मूल के हैं। मीटू जैसी बहस इस तरह की संवेदनाओं को सामने लाने में अहम भूमिका निभा रही है।

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