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वही डाल, वही बैताल : पाक में बाजवा की बैठक से उठे सवाल

पाकिस्तान की विकास दर दो फीसद है। यह सरकारी आंकड़ा है। बजट घाटा 8.9 फीसद हो चुका है। यह 30 साल में सर्वाधिक है। खस्ताहाल अर्थव्यवस्ता का बहाना लेकर वहां के सेना प्रमुख ने जिस तरह से उद्योगपतियों के साथ बैठक की है, उससे पूरी दुनिया में सवाल उठने लगे हैं। आसानी से हासिल हो सकता है।

Author Published on: October 8, 2019 5:59 AM
पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा

क्या पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान एक बार फिर वहां की लोकतांत्रिक सरकार के तख्ता पलट और सेना की अगुवाई में मार्शल लॉ के कगार पर खड़ा है। वहां की खस्ताहाल अर्थव्यवस्ता का बहाना लेकर वहां के सेना प्रमुख ने जिस तरह से उद्योगपतियों के साथ बैठक की है, उससे पूरी दुनिया में सवाल उठने लगे हैं। क्रिकेटर से राजनेता बने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने वहां की विपक्षी पार्टियों पीपीपी और पीएमएल-नवाज को मात देने के लिए जिस पाकिस्तानी सेना और चरमपंथी गुटों को साथ लिया था, अब वे उनकी राह के कांटे बनने लगे हैं। आर्थिक मोर्चे पर विफल इमरान को कुछ सूझता नहीं दिख रहा। वे कश्मीर का राग अलापने में जुटे हैं।

बीते हफ्ते पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने उद्योगपतियों के साथ बैठक कर एक संकेत दिया। तब संयुक्त राष्ट्र महासभा में कश्मीर मुद्दे को जोर-शोर से उठा कर इमरान के स्वदेश लौटे 24 घंटे भी नहीं हुए थे। दूसरी तरफ, चरमपंथी मौलाना फजलुर रहमान ने भी इमरान की परेशानियां बढ़ानी शुरू कर दी हैं। जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (जेयूआई-एफ) के प्रमुख फजलुर रहमान ने अपने आजादी मार्च को सरकार के खिलाफ जंग करार दिया। मौलाना ने पेशावर में ऐलान किया, ‘पूरा देश हमारा युद्धक्षेत्र (वॉरजोन) है। विपक्षी दलों ने भी इसका समर्थन किया। ऐसे में वहां की सेना ने तख्तापलट का संकेत देना शुरू कर दिया है।

पाकिस्तानी सेना प्रमुख जावेद बाजवा ने वहां के प्रमुख कारोबारियों से गुप्त मुलाकात की। इस पर सिटी बैंक के पूर्व अधिकारी, लेखक और बैंकर यूसुफ नजर ने कहा कि यह तख्तापलट करने का नर्म तरीका है, इसके अलावा कुछ नहीं। दरअसल, इमरान के प्रधानमंत्री बनने के एक साल के भीतर ही पाकिस्तान में गरीबी व बेरोजगारी अपने चरम स्तर पर पहुंच गई है। इमरान हालांकि भारत विरोधी बयानों और कश्मीर राग अलापते हुए जनता का ध्यान बंटाने में लगे हुए हैं। सेना प्रमुख बाजवा और प्रमुख कारोबारियों के बीच यह इस साल की तीसरी गुप्त बैठक थी। ये तीनों बैठकें कराची और रावलपिंडी के सैन्य मुख्यालयों में हुईं। इस दौरान सुरक्षा और गोपनीयता की जिम्मेदारी भी सेना ने ही संभाली। इसके चलते बैठक की ज्यादा जानकारी मीडिया तक नहीं पहुंची।

जो जानकारियां सामने आई हैं, उनके मुताबिक, बाजवा ने कारोबारियों से कहा कि वे लोग अर्थव्यवस्था सुधारने के उपाय बताएं, ज्यादा निवेश करें। इन सुझावों को फौरन संबंधित अधिकारियों और मंत्रालयों तक पहुंचाने और इन पर अमल के आदेश भी दिए गए। सेना ने इसपर प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया। इस बैठक में जो लोग शामिल हुए, उन्हें पाकिस्तानी उद्योग जगत की ऐसी हस्तियां माना जाता है, जो राजनीतिक समीकरणों में अच्छा-खासा दखल रखती हैं।

इस बैठक को लेकर पाकिस्तानी सेना की जनसंपर्क इकाई आइएसपीआर ने एक बयान जारी किया, जिसमें कहा गया कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था : चुनौतियां एवं रास्ते विषय पर रक्षा अध्ययन, शोध एवं विश्लेषण संस्थान ने राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय में एक राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया। फौज की दोनों संस्थाओं द्वारा आयोजित इस राष्ट्रीय परिचर्चा को लेकर सवाल उठना लााजिमी था। मीडिया में आई रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसमें शामिल वक्ताओं ने एक सुर में इमरान सरकार की आर्थिक नीतियों को बेकार और भ्रष्टाचार को बढ़ाने वाला बता दिया और इशारों ही इशारों में सेना द्वारा मामला संभाल लेने को वक्त की जरूरत बता डाली। वक्ताओं के पैनल में पाकिस्तानी पंजाब सरकार के मुख्यमंत्री के आर्थिक सलाहकार डॉ. सलमान शाह, लाहौर चैंबर आॅफ कॉमर्स के अध्यक्ष अलमस हैदर, कई रक्षा संस्थाओं के पदाधिकारी, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के वित्त, राजस्व व आर्थिक सलाहकार डॉ. अब्दुल हाफिज शेख समेत कई ऐसे लोग शामिल हुए, जिन्हें मार्शल लॉ का हीमायती माना जाता रहा है। इस बैठक को लेकर पाकिस्तानी फौज तर्क दे रही है कि रक्षा-सुरक्षा एवं अर्थव्यवस्था एक दूसरे पर निर्भरशील हैं, इस लेकर इस कवायद पर सवाल नहीं उठने चाहिए।

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