Professor Stephen Hawking passes away at 76 - Jansatta
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ब्रिटिश वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग: अभी तो आपकी सबसे ज्यादा जरूरत थी

ब्रिटिश वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग को जो बीमारी हुई थी, उसका नाम है मोटर न्यूरॉन था।

ब्रिटिश वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग को जो बीमारी हुई थी, उसका नाम है मोटर न्यूरॉन था। एनएचएस के मुताबिक यह एक असाधारण स्थिति है जो दिमाग और तंत्रिका पर असर डालती है। इससे शरीर में कमजोरी पैदा होती है जो समय के साथ बढ़ती है।

ब्रिटिश वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग को जो बीमारी हुई थी, उसका नाम है मोटर न्यूरॉन था। एनएचएस  के मुताबिक यह एक असाधारण स्थिति है जो दिमाग और तंत्रिका पर असर डालती है। इससे शरीर में कमजोरी पैदा होती है जो समय के साथ बढ़ती है। यह बीमारी हमेशा जानलेवा होती है। हालांकि कुछ लोग ज़्यादा जीने में कामयाब हो जाते हैं। हॉकिंग के मामले में ऐसा ही हुआ। इस लाइलाज बीमारी को कुछ चिकित्सीय तरीकों से कुछ हद तक सीमित किया जा सकता है।

कृपया उनके लिए रेस्ट इन पीस न लिखें…जो आत्मा को नहीं मानता उसकी आत्मा कहां विश्राम करेगी….हॉकिंग आप ऐसे समय में हमें छोड़ गए जब उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी…। धीरेंद्र अस्थाना लिखते हैं, ‘मैं खुशनसीब हूं कि मैंने महान विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग को देखा और सुना था’। सोशल मीडिया पर दुखी प्रशंसक कह रहे थे कि अभी-अभी तो हम ब्रह्मचारी मोर के आंसुओं से संतति का जनन देख रहे थे, सुन रहे थे कि किसी ने बंदर को इंसान बनते नहीं देखा है तो डार्विन को क्यों पढ़ें। इन दिनों ज्ञान, विज्ञान और तर्क जिस तरह सहमा हुआ घूम रहा है तभी आप भी अलविदा कह गए। सितौला केदार टिप्पणी करते हैं, ‘रेस्ट इन फिजिक्स’।
हॉकिंग सर चाहे कितना भी डांट-फटकार लें हम कहां मानने वाले। आपकी वैज्ञानिकता और ईश्वर की मुठभेड़ करवा कर ही रहेंगे। आशुतोष कुमार लिखते हैं ‘समय के सारे परमाणु उलट-पुलट कर तुमने यह घोषणा की कि ब्रह्मांड के निर्माण में किसी ईश्वर की कोई भूमिका नहीं हो सकती। इतने ठोस सबूतों के आधार पर कि ईश्वर भी उसे काट नहीं सका। मुझे लगता है, उसी दिन से वह तुम्हारी राह देख रहा था, तुम्हारे साथ शास्त्रार्थ करने के मूड में’।

अपनी किताब ‘द ग्रांड डिजाइन’ में हॉकिंग भगवान के अस्तित्व को नकारते हैं और एक जगह सवाल पूछते हैं दिव्य ब्रह्मांड की रचना के पहले भगवान क्या कर रहा था। इस धरती के निर्माण के लिए भगवान के बदले गुरुत्वाकर्षण के नियमों को श्रेय देनेवाले हॉकिंग की देह अब नहीं रही और आत्मा पर विश्वास नहीं। असीम ब्रह्मांड के बीच वैज्ञानिकता को खड़ी करने के लिए ही वे जाने जाएंगे। प्रशंसक कह रहे हैं कि क्या यह संयोग है कि 14 मार्च को जब दुनिया अल्बर्ट आइंस्टीन का जन्मदिन मना रही थी तो हॉकिंग दुनिया छोड़ गए।
हॉकिंग सिर्फ एक तेज दिमाग नहीं जिजीविषा के प्रतीक बन गए थे। वे खुद को एक वैज्ञानिक ही मानते थे लेकिन दुनिया का एक बहुत बड़ा हिस्सा उन्हें मोटिवेशनल गुरु के तौर पर देखता था। सापेक्षता, ब्लैक होल और बिग बैंग थ्योरी। सैद्धांतिक भौतिकी, ब्रह्मांड के रहस्यों को जैसे मां की लोरियों में शामिल कर दिया था जो अपने बच्चे को बिस्तर पर सुलाते हुए सुना सकती थी। चंदा मामा दूर के पुए पकाएं गुड़ के सुनने वाला बच्चा स्कूली शिक्षा के बाद पूरे ब्रह्मांड को अपनी कक्षा से लेकर खेल के मैदान तक महसूस सकता था। हॉकिंग तंज करते थे कि उनकी किताबों और सिद्धांतों को समझने में लोगों को दिक्कत होती है। लेकिन यह सच है कि उनके सिद्धांतों को हर कोई अपने-अपने हिस्से का समझ लेता है।

वे ऐसे वैज्ञानिक थे जिन्होंने ज्ञान का ईमान से मेल कराया। उन्होंने आगाह किया कि कंप्यूटर हर दूसरे महीने अपनी क्षमता दोगुनी कर लेता है। कृत्रिम बुद्धि विकसित करने और सोचने वाली मशीनें बनाने के प्रयास मानव नस्ल को खत्म कर सकते हैं। ईश्वरीय सत्ता के उपासकों के इस ग्रह के वासियों को उन्होंने इंसानियत के पक्ष में खड़ा करने की कोशिश की।
खगोलशास्त्र के इस सबसे चमकते सितारे का पूरा जीवन ही आम लोगों के लिए उम्मीदों की आकाशगंगा बनता है। लोगों को अपने पैरों को छोड़ सितारों की ओर देखना सिखाया। गांधी की तरह उन्हें भी अपने जीवनकाल में नोबेल पुरस्कार नहीं मिला। विज्ञान के साथ पूरे जीवन का दर्शन रच गए। उनका जीवन हमें गहरी निराशा से बाहर निकालता है। उनका जाना लोक से जुड़े वैज्ञानिक का जाना है जो पूरी मानवता के लिए चिंतित था।

मानव सभ्यता का भविष्य

स्टीफन यह भी सिद्ध करते हैं कि समाज, सभ्यता और संस्कृति के सरोकारों के पक्ष में खड़े हुए बिना कोई अपने समय का सबसे तेज दिमाग साबित नहीं हो सकता है। उन्होंने मानव सभ्यता के भविष्य पर भी बात की। उन्होंने कहा कि हम इस छोटे, तेजी से प्रदूषित हो रहे और भीड़ से भरे ग्रह  पर अपनी और अंदर की तरफ देखते नहीं रह सकते। वे इंसानों को कह रहे थे कि हम पूरी आकाशगंगा में अकेले बुद्धिमान लोग हैं तो हमें तय करना चाहिए कि हमारा अस्तित्व बना रहे और चलता रहे। अगले सौ सालों में विनाश से बच पाना मुश्किल होने जा रहा है, आगे हजार या दस लाख की बात तो छोड़ ही दीजिए। अपने समय के बड़े युद्धों की उन्होंने पुरजोर मुखालफत की थी।

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