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साझा आधार, नया विस्तार, एशियाई सदी का सपना पूरा करने के लिए प्रणब ने दिए आठ सिद्धांत

चीन प्रवास के तीसरे दिन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भारत-चीन के विरासती संबंधों को नया विस्तार दिया। पेइचिंग विश्वविद्यालय में गुरुवार को राष्टÑपति ने दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत करने के लिए आठ सिद्धांतों का जिक्र किया।

Author बेजिंग | May 27, 2016 12:20 AM
चीन प्रवास के तीसरे दिन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और साथ में शी जिनपिंग

चीन प्रवास के तीसरे दिन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भारत-चीन के विरासती संबंधों को नया विस्तार दिया। पेइचिंग विश्वविद्यालय में गुरुवार को राष्टÑपति ने दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत करने के लिए आठ सिद्धांतों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत और चीन दोनों उभरती शक्तियां हैं, इसलिए यह दोनों की जिम्मेदारी है कि वैश्विक समृद्धि के लिए एकजुट होकर काम करें। प्रणब मुखर्जी की अगुआई में गुरुवार को दस भारतीय विश्वविद्यालयों ने शिक्षा क्षेत्र में सहयोग के लिए चीनी विश्वविद्यालयों के साथ समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए।
मुखर्जी ने कहा कि विकास पर आधारित करीबी साझेदारी के लिए दोनों देशों के बीच राजनीतिक समझ जरूरी है। उन्होंने कहा कि चीन के साथ साझेदारी मजबूत करने के लिए एक द्विपक्षीय प्रतिबद्धता है। संबध सुधार को लेकर अपने आठ सूत्रीय स्तंभ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, ‘हमने साझा आधार को विस्तार दिया है और अपने मतभेदों को दूर करना सीखा है। सीमा के सवाल के साथ-साथ कई चुनौतियां हैं, जिन्हें समग्र रूप से निपटाने की जरूरत है।

पड़ोसियों के बीच समय-समय पर कुछ मुद्दो पर मतभेद होना स्वाभाविक है। मैं इसे हमारी सियासी समझ का इम्तहान मानता हूं। हमें हमारे सभ्यतापरक विवेक का इस्तेमाल करते हुए इन मतभेदों को दोनों पक्षों के आपसी संतोष तक सुलझाना चाहिए। दोनों पक्षों को इस मकसद के साथ काम करना चाहिए कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों पर अपनी अनसुलझी समस्याओं का बोझ न लादें’। मुखर्जी ने कहा कि पिछले सात दशकों में हमारे द्विपक्षीय रिश्ते को कई तरह की मुश्किलों और चुनौतियों से गुजरना पड़ा। लेकिन चीन के साथ भाईचारा बनाए रखने की भारतीय सोच मजबूती से टिकी रही। उन्होंने कहा, ‘इस काल के दौरान हमारे रिश्ते खासे विस्तार और विविधीकरण के गवाह बने। हमारा साझा सभ्यतात्मक अतीत और हमारी साझी एशियाई अस्मिता इस आकांक्षा के केंद्र में है। हम दोनों दोस्त रहना चाहते हैं और एशियाई सदी का अपना साझा सपना पूरा करना चाहते हैं’।

राष्टÑपति ने इस बात पर भरोसा जताया कि मतभेदों को आगे और न बढ़ाना तय करके और आपसी चिंताओं के प्रति संवेदनशील होकर हम साझा उद्देश्यों को साथ ला सकते हैं। उन्होंने कहा, ‘हम अपने मतभेदों को न्यूनतम और सहमतियों को अधिकतम कर सकते हैं’। राष्टÑपति ने कहा कि जनता-केंद्रित साझेदारी के लिए दोनों देशों के बीच एक दूसरे के प्रति सम्मान और एक-दूसरे के राजनीतिक व सामाजिक तंत्र के प्रति अधिक सराहना का भाव होना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘मैं इस बात से सहमत हूं कि हमारे संबंधों में गुणवत्तापूर्ण सुधार के लिए जनता को केंद्र में रखा जाना जरूरी है। इसलिए मेरा सुझाव है कि दोनों देशों के बीच व्यापक स्तर का संपर्क बनाने के लिए दोनों पक्षों को जनता-केंद्रित साझेदारी को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इसे सभी स्तरों पर करीबी संपर्कों से हासिल किया जा सकता है। भारत ने एक धर्मनिरपेक्ष संसदीय लोकतंत्र होने का विकल्प चुना। हमारी भागीदारी वाली शासन व्यवस्था सहिष्णुता, समावेश और आम सहमति के सिद्धांतों पर आधारित है। आतंकवाद के जरिए हमारी शांति भंग करने की कोशिश की गई लेकिन दहशतगर्दी हमारे भरोसे को नहीं डिगा पाई’।

उन्होंने कहा, ‘हमारे विकास संबंधी अनुभव एक-दूसरे के लिए बेहद प्रासंगिक हैं। अवसंरचना, परिवहन, ऊर्जा, कौशल विकास, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और शहरीकरण में हमारी उपलब्धियां आपस में आदान-प्रदान और सहयोग के लिए एक उपजाऊ जमीन देती हैं। हमारे रक्षा एवं सुरक्षा आदान-प्रदान में अब वार्षिक सैन्य अभ्यास शामिल हैं। चीन ने भारत में बहुत निवेश किया है और भारत ने भी चीन में बहुत निवेश किया है’।
सरकार को इस प्रक्रिया के प्रति और संबंधों के लिए एक स्थायी ढांचा बनाने को लेकर प्रतिबद्ध बताते हुए मुखर्जी ने कहा कि वे मजबूती से यह मानते हैं कि अगर भारत और चीन को 21वीं सदी में एक अहम और रचनात्मक भूमिका निभानी है तो उन्हें अपने द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाना चाहिए।
अपने आठ सिद्धांतों के तहत उन्होंने सबसे पहले दोनों देशों के बीच आपसी भरोसा और समझ विकसित करने पर जोर दिया। दूसरे सिद्धांत के तहत उन्होंने दोनों देशों के युवाओं के बीच संपर्क बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया। तीसरे सिद्धांत में उन्होंने डिजिटल मित्रता की बात कही जिसके जरिए दोनों देश अपनी फिल्मों और अन्य कार्यक्रमों को एक-दूसरे तक पहुंचाएं और डिजिटल नजदीकी से दिलों की दूरी कम करें। चौथे सिद्धांत में उन्होंने बौद्धिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की बात करते हुए कहा कि भारत का योग और चीन का ताई ची ऐसी विरासत हैं जो हम एक-दूसरे के साथ साझा कर सकते हैं। बौद्धिक व सांस्कृतिक आदान-प्रदान और विशेष तौर पर कैलाश मानसरोवर एवं बौद्ध तीर्थ स्थलों की यात्राआें के जरिए दोनों पक्षों के नागरिक समाजों के बीच तालमेल बढ़ सकता है।

पांचवें सिद्धांत में उन्होंने पर्यटन को बढ़ावा देने की बात कही। छठे सिद्धांत के तहत उन्होंने दोनों देशों के नागरिक समुदायों को जोड़ने का एजंडा बताते हुए कहा कि दोनों समुदायों में नागरिक समाज की अहम भूमिका है। सातवें सिद्धांत में उन्होंने वैश्विक व विकास मुद्दों के प्रति साझा रुख का जिक्र किया। जी20, ब्रिक्स, पूर्व एशिया शिखर सम्मेलन, एशियाई अवसंरचना एवं निवेश बैंक और शंघाई कोआॅपरेशन फोरम और यूनाइटेड नेशन जैसी संस्थाओं के साथ दोनों देश अपना सहयोग बढ़ाएं। अंत में आठवें सिद्धांत में उन्होंने कहा कि हमें एक-दूसरे का पूरक बनाने में व्यापार और वाणिज्य सबसे अहम भूमिका निभा सकता है। उन्होंने कहा कि पिछले दशक में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय कारोबार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है लेकिन अभी इस क्षेत्र में दोनों देशों के पास असीम संभावनाएं हैं। उन्होंने चीनी कारोबारियों को ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्टार्ट अप इंडिया’ के साथ जुड़ने का न्योता दिया।

आतंकवाद का मतलब सिर्फ विनाश

प्रणब मुखर्जी ने चीन के शीर्ष नेताओं के साथ अपनी बैठकों में भारत का रुख साफ करते हुए कहा कि अच्छे और बुरे आतंकवाद जैसी कोई चीज नहीं होती। आतंकवाद का हर रूप मानवता के लिए विनाशकारी है और इसके खिलाफ साझा जंग की जरूरत है। प्रणब मुखर्जी ने अपनी यात्रा के तीसरे दिन गुरुवार को चीन के राष्ट्रीसंघ शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री ली क्विंग के साथ बातचीत की। भारत के विदेश सचिव एस जयशंकर ने पत्रकारों को बताया कि प्रणब ने जोर देकर कहा कि आतंकवाद एक वैश्विक समस्या है और दोनों देश इससे बराबर प्रभावित हैं।

प्रणब के सम्मान में चीन के राष्ट्रीसंघ ने ग्रेट हॉल आॅफ पीपुल में भव्य स्वागत समारोह रखा। कार्यक्रम स्थल पर चीन और भारत के राष्ट्रीसंघ ध्वज एक साथ लहरा रहे थे। भारतीय राष्ट्रीसंघ की धुन के साथ मुखर्जी को 21 तोपों की सलामी दी गई। प्रणब ने चीन से कहा कि भारत ने आतंकवाद के कारण कई जानें गवाई हैं और इसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। आतंकवाद का एकमात्र मकसद विनाश होता है और इसे कुचलने की जरूरत है। उन्होंने चीन को आतंकवाद के खिलाफ जंग में संयुक्त राष्ट्रीसंघ का साथ देने के लिए प्रेरित किया।

क्या शीर्ष चीनी नेताओं के साथ बैठक में जैश-ए-मुहम्मद के सरगना मसूद अजहर का भी मसला उठा, विदेश सचिव पत्रकारों के इस सवाल का सीधा जवाब टाल गए। उन्होंने कहा, ‘आतंकवाद के मसले पर बातचीत हुई और पड़ोसी देश को भारत के इस रुख के बारे में बताया गया कि अच्छे और बुरे आतंकवाद जैसी कोई चीज नहीं होती’। उन्होंने कहा कि सीमा और क्षेत्रीय विवाद पर भी दोनों देशों के बीच चर्चा हुई और प्रणब ने चीनी समकक्ष से सीमा पर शांति और सौहार्द बनाए रखने की अपील की। बैठक में दोनों देशों के बीच आपसी समझ बढ़ाने पर सहमति बनी और प्रणब ने कहा कि पड़ोसियों में मतभेद होते रहते हैं लेकिन यह उनके रिश्ते को आगे बढ़ाने के आड़े नहीं आना चाहिए।
अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि चीनी नेतृत्व इस बात पर सहमत है कि मतभेदों को दरकिनार कर हमें द्विपक्षीय रिश्ते मजबूत करने चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि परमाणु ऊर्जा उत्पादन जैसे कई मुद्दों पर दोनों देशों को आपसी समझ बढ़ाने की जरूरत है। और इस समझ को बढ़ाने की कवायद के तहत प्रणब मुखर्जी ने चीनी राष्टÑपति को भारत आमंत्रित किया।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने शी से कहा, ‘अगर हम साथ काम करते हैं तो शांति, समृद्धि और विकास के लिए तेज रफ्तार पैदा कर सकते हैं जो न केवल हमारी अपनी जनता को फायदा पहुंचाएगी बल्कि पूरी मानवता को लाभान्वित करेगी। मेरी यात्रा हमारे दोनों देशों और हमारी जनता के बीच दोस्ती की पुष्टि है। मुझे इस बात में कोई संदेह नहीं है कि यह सार्वजनिक सहयोग और रिश्तों की समझ बढ़ाएगी’।
शी ने प्रणब से कहा, ‘आप अनुभवी राजनेता और चीनी जनता के पुराने मित्र हैं जो चीन और भारत के बीच दोस्ती को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध रहे हैं’। सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ चाइना के महासचिव शी ने कहा, ‘जब मैं 2014 में भारत गया था तो आपने और भारत सरकार ने मेरा गर्मजोशी से स्वागत किया था। उस यात्रा में हमने चीन-भारत संबंधों के साथ आपसी हितों के मुद्दों पर गंभीर और स्पष्ट बातचीत की। हम कई साझा सहमतियों पर पहुंचे। आपकी यात्रा से विभिन्न क्षेत्रों में हमारे संपूर्ण रिश्तों और मित्रवत सहयोग को आगे ले जाने की उम्मीद है’।
मुखर्जी ने शी से कहा, ‘मैं अपने साथ भारत सरकार की और 1.25 अरब जनता की शुभकामनाएं लाया हूं। भारत और चीन दो बढ़ती अर्थव्यवस्थाएं हैं और दुनिया के मंच पर बड़ी महाशक्ति हैं। हम 40 फीसद आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। हमारे रिश्ते द्विपक्षीय दायरे को बढ़ाते हैं और उन्होंने क्षेत्रीय, वैश्विक और रणनीतिक महत्त्व हासिल किया है। हमारी सभ्यताएं पुरानी भी हैं जिन्होंने एक-दूसरे को समृद्ध बनाया है। हमारे विकास के समान स्तर हैं। इन सबसे ऊपर हम पड़ोसी हैं जो इतिहास के बड़े हिस्से में सद्भावपूर्ण तरीके से रहे हैं’।

शी ने कहा, ‘ऐतिहासिक रूप से चीन और भारत के बीच लगातार आदान-प्रदान का प्रवाह रहा है जहां हमने एक-दूसरे से सीखा है और अपने देशों में वैभवशाली संस्कृतियां सृजित की हैं। हमने मिलकर देशों के विकास और प्रगति में योगदान दिया है। हमने दुनिया को शांति, सद्भाव और उदारता के मूल्य प्रसारित किए और अंतर-सभ्यतागत आदान-प्रदानों में एक सुंदर अध्याय रचा’। वर्तमान में भारत और चीन दोनों को सुधारों और विकास के अहम स्तर पर बताते हुए शी ने कहा कि दोनों राष्ट्रीय पुनर्जागरण के महान लक्ष्य का अनुसरण कर रहे हैं और 2.6 अरब चीनी और भारतीय जनता के जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

’आपसी भरोसा और समझ विकसित करें दोनों देश

’युवाओं के बीच संपर्क बढ़ाने की जरूरत पर दिया जोर
’डिजिटल मित्रता : सिनेमा जैसे माध्यमों से घटे दिलों की दूरियां
’योग, कैलाश मानसरोवर और बौद्ध तीर्थस्थल से करीब आएं नागरिक
’एक-दूसरे के पर्यटन स्थलों को घूमकर साझी संस्कृति महसूस करें
’दोनों देशों के नागरिक समुदायों को एक साथ जोड़कर जन केंद्रित नीति बने
’जी20, ब्रिक्स, पूर्व एशिया शिखर सम्मेलन जैसी संस्थाओं का साझा इस्तेमाल
’एक-दूसरे का पूरक बनाने में व्यापार और वाणिज्य की अहम भूमिका

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