जलवायु संकट से दर-बदर आबादी

दुनिया कई तरह के खतरों से आज एक साथ जूझ रही है।

सांकेतिक फोटो।

दुनिया कई तरह के खतरों से आज एक साथ जूझ रही है। ये खतरे हिंसा, आतंक और अर्थ से लेकर महामारी तक कई रूपों में हमारे सामने हैं। अलबत्ता इन तमाम खतरों के बीच जो चिंता लगातार सबसे तेजी से गहरा रही है, वह है जलवायु संकट। इस बारे में दुनिया के तमाम मुल्कों ने साझा हल निकालने की कई पहल भी की पर वे जिम्मेदारी को एक-दूसरे पर डालने के खेल साबित हुए। इस तरह का गैर जवाबदेह रवैया आगे सबको भारी पड़ेगा। इस बारे में कई अध्ययन आ चुके हैं जो ये बताते हैं कि अगले कुछ सालों में अगर सार्थक और ठोस पहल नहीं हुई तो दुनिया में जीवन का संकट काफी बढ़ जाएगा। तब विकास और वैज्ञानिक सूझ का कोई भी दावा शायद ही हमारी मदद करे। आलम यह है कि जलवायु के बदले लक्षण और प्रभाव के कारण विभिन्न देशों की बहुत बड़ी आबादी आज दर-बदर होने को मोहताज है। शरणार्थी समस्या और जलवायु संकट का एक साथ जुड़ना एक ऐसी चुनौती है, जिस पर वैश्विक मंचों पर भी अभी ढंग से बात नहीं हुई है।

इस बात को अलग से कहने-समझने की जरूरत नहीं कि जलवायु परिवर्तन के खतरे आज पहले की तुलना में ज्यादा महसूस किए जा रहे हैं। यह भी कि ऐसा दुनिया के एक नहीं बल्कि तमाम हिस्सों में एक साथ हो रहा है। बदलते मौसम और जलवायु के बदलते ढंग के कारण दुनिया भर के देशों के आगे अब जलवायु शरणार्थियों की समस्या से निपटने के लिए अलग से समझ बनाने की नैतिक और रणनीतिक विवशता है। जलवायु शरणार्थियों की समस्या को बाकी शरणार्थियों की समस्या के साथ जोड़कर सरलीकृत तौर पर नहीं देखा जा सकता है।

दरअसल, जलवायु शरणार्थी वे लोग हैं जिन्हें जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण अपने मूल इलाके, समुदाय या प्रदेश छोड़कर कहीं और रोजगार आदि के लिए जाना पड़ता है। दुनिया का पहला जलवायु शरणार्थी समूह पापुआ न्यू गिनी के कार्तेरेट द्वीप के वे चालीस परिवार हैं, जिनकी कुल जनसंख्या दो हजार है। 2009 से अब तक उन इलाकों में समुद्री जल स्तर खासा बढ़ गया है। हालांकि उन लोगों ने भी इस बारे में काफी आवाज उठाई है। पर उनकी मांगों पर 2013 तक कोई खास ध्यान नहीं दिया गया। ऐसी उपेक्षापूर्ण स्थिति के कारण आखिरकार अप्रैल 2014 में उन्हें वो इलाके छोड़ने पड़े जिनके बारे में अंदेशा था कि वे पानी में पूरी तरह डूब जाएंगे। इस संकट को हम इस तरह देखें तो इसकी भयावहता ज्यादा समझ में आएगी कि हम उस दौर में आ चुके हैं जब दुनिया में रहने लायक सुरक्षित जगह बढ़ने की जगह कम होनी शुरू हो गई है।

जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आइपीसीसी) के अनुमान के अनुसार 1990 और 2100 के बीच समुद्र का जल स्तर 0.18 से 0.6 मीटर तक बढ़ जाएगा। इसका मतलब यह हुआ कि बांग्लादेश जैसे देश अपनी जमीन का कुल 17 फीसद हिस्सा 2050 तक इस समुद्री बाढ़ में गंवा देंगे। इसका मतलब यह हुआ कि तब अकेले बांग्लादेश में दो करोड़ जलवायु शरणार्थी पैदा हो जाएंगे।

जलवायु शरणार्थी, जलवायु परिवर्तन की मार के अलावा अन्य बहुत सारी समस्याएं भी झेलते हैं। उनके लिए राजनीतिक समस्याएं दूसरों के मुकाबले बहुत तकलीफदेह होती हैं। अक्सर ही देखा जाता है कि नई जगह पर उनके पास रहने या बसने का कानूनी अधिकार नहीं होने के कारण उन्हें वापस अपनी जगहों पर जाने के लिए मजबूर किया जाता है।

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