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रोहिंग्या मुसलमानों पर जुल्म: आंग सांग सू ची का नोबेल वापस लेने का अभियान

‘‘स्टॉकहोम और ओस्लो की किसी भी पुरस्कार समिति ने पुरस्कार प्रदान किये जाने के बाद उसे वापस लेने के बारे में विचार नहीं किया है।’’

Author Published on: September 8, 2017 8:10 PM
म्यांमार के नाएप्यीडॉ शहर में पीएम नरेन्द्र मोदी के सम्मान में 5 सितंबर को आंग सांग सू ची ने राजकीय भोज दिया। (फोटो-पीटीआई)

नार्वे के नोबेल संस्थान ने आज कहा कि म्यांमार की नेता आंग सांग सू ची को वर्ष 1991 में दिये गये पुरस्कार को वापस नहीं लिया जा सकता। नॉर्वे के नोबेल संस्थान के प्रमुख ओलव जोल्सताद ने एक ईमेल के जरिये ‘एसोसिएटेड प्रेस’ को बताया कि ना ही पुरस्कार के संस्थापक अल्फ्रेड नोबेल के वसीयत के अनुसार और ना ही नोबेल फाउंडेशन के नियमों के अनुसार प्राप्तकर्ताओं से पुरस्कार वापस लेने का कोई प्रावधान है। उन्होंने कहा है, ‘‘एक बार नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किये जाने के बाद प्राप्तकर्ता से पुरस्कार वापस नहीं लिया जा सकता।’’ ओलव ने कहा, ‘‘स्टॉकहोम और ओस्लो की किसी भी पुरस्कार समिति ने पुरस्कार प्रदान किये जाने के बाद उसे वापस लेने के बारे में विचार नहीं किया है।’’ बता दें कि म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हो रहे कथित उत्पीड़न को लेकर करीब 3,86,000 लोगों ने ऑनलाइन पिटीशन पर हस्ताक्षर कर सू ची से नोबेल पुरस्कार वापस लेने की मांग की है। सू ची म्यांमार की सुप्रीम लीडर हैं। उन्हें म्यांमार की भाषा में स्टेट काउंसलर कहा जाता है।

इधर संयुक्त राष्ट्र के एक वरिष्ठ प्रतिनिधि ने कहा है कि म्यांमार के रखाइन प्रांत में अबतक एक हजार से ज्यादा लोगों के मारे जाने की आशंका है, जिनमें ज्यादातर रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय के सदस्य हैं। यह संख्या सरकारी आंकड़ों से लगभग दुगुनी है। म्यांमार में मानवाधिकारों के संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदक, यांघी ली ने कहा, ‘‘मुमकिन है कि अबतक एक हजार या उससे ज्यादा लोगों की जान गई हों।’’ ‘‘इसमें दोनों तरफ के लोग हो सकते हैं लेकिन ज्यादा बड़ी संख्या रोहिंग्या की होगी।’’ पिछले केवल दो सप्ताह में 1,64,000 नागरिक भागकर बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में चले गए हैं। इनमें से ज्यादातर रोहिंग्या हैं। यह शिविर पहले से ही लोगों से खचाखच भरे हुए हैं। कई अन्य की मौत रखाइन में हो रही हिंसा से बचने के क्रम में भागने के दौरान हुई। प्रत्यक्षर्दिशयों का कहना है कि यहां रोहिंग्या चरमपंथियों द्वारा 25 अगस्त को श्रृंखलाबद्ध तरीके से शुरू किए गए हमलों के कारण सेना की जवाबी कार्रवाई शुरू हुई जिसमें समूचे गांव जल गए।

रोंहिंग्या मुसलमानों को बौद्ध वर्चस्व वाले म्यांमार में लंबे समय से कथित रूप से भेदभाव का सामना करना पड़ा है। इस देश में कई पीढ़ियों से निवास करने के बावजूद उन्हें यहां की नागरिकता से वंचित रखा गया है और उनको बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों के तौर पर देखा जाता रहा है। ली द्वारा दिए गए यह आंकड़े आधिकारिक आंकड़ों से कहीं ज्यादा हैं जिसके मुताबिक मृतकों की कुल संख्या 475 ही है। बृहस्पतिवार को अधिकारियों द्वारा जारी किए गए नए आंकड़ों के मुताबिक, म्यांमार की ओर से बताया गया है कि 25 अगस्त से अबतक रोहिंग्या के 6,600 घर और गैर-मुस्लिम लोगों के 201 घर जलकर खाक हो गए हैं। उन्होंने बताया कि इस संघर्ष में 30 नागरिक मारे गए जिनमें सात रोहिंग्या, सात हिंदू और 16 रखाइन बौद्ध शामिल थे। म्यांमार की सेना ने इससे पहले कहा था कि उन्होंने 430 रोहिंग्या आतंकियों को मार गिराया। अधिकारियों ने बताया था कि अगस्त के हमलों में 15 सुरक्षाकर्मियों की भी मौत हो गई थी।

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