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टूटते टूटते बचा यूरोप

इटली और ग्रीस खुश हैं कि वे यूरोपीय संघ की सीमा पर होने के बावजूद अकेले नहीं हैं। 2015 के शरणार्थी संकट के बाद नौकाओं पर सवार होकर लाखों लोग यूरोप में पहुंचे। उत्तरी अफ्रीकी देशों से चलने वाली ऐसी नौकाओं की मंजिल इटली और ग्रीस के तट होते हैं जहां से शरणार्थी यूरोपीय संघ की सीमा में दाखिल होते हैं।

पूरा यूरोप ब्रसेल्स की तरफ टकटकी लगाए देख रहा था। यूरोपीय संघ के 28 देशों के नेताओं के फैसले का सबको इंतजार था। दांव पर यूरोपीय संघ की एकता थी। जर्मनी के लिए मामला और संजीदा था, क्योंकि ब्रसेल्स के फैसले पर चांसलर अंगेला मैर्केल की सरकार का भविष्य भी टिका था। 12 घंटों की माथापच्ची के बाद शुक्रवार तड़के डील हो जाने की खबर आई। डील शरणार्थियों के मुद्दे पर, जिसे लेकर यूरोपीय संघ दोफाड़ है। जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों को जहां यह राहत है कि शरणार्थियों के मुद्दे पर आखिरकार पूरा यूरोप एक साथ आया है, वहीं पोलैंड, चेक रिपब्लिक, हंगरी और स्लोवाकिया इस बात से खुश है कि उन्हें अब शरणार्थियों को लेने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। इटली और ग्रीस खुश हैं कि वे यूरोपीय संघ की सीमा पर होने के बावजूद अकेले नहीं हैं। 2015 के शरणार्थी संकट के बाद नौकाओं पर सवार होकर लाखों लोग यूरोप में पहुंचे। उत्तरी अफ्रीकी देशों से चलने वाली ऐसी नौकाओं की मंजिल इटली और ग्रीस के तट होते हैं जहां से शरणार्थी यूरोपीय संघ की सीमा में दाखिल होते हैं। एक तरफ सीरिया और इराक जैसे संकटग्रस्त देशों से लोग जान बचाकर यूरोप की तरफ भाग रहे हैं, तो वहीं उत्तरी अफ्रीका के साथ साथ अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे देशों के बहुत सारे लोग भी बेहतर जिंदगी की आस में समंदर का खतरनाक सफर तय करके यूरोप पहुंच रहे हैं।

शरणार्थियों की बड़ी संख्या को देखते हुए यूरोपीय संघ ने तय किया था कि इस जिम्मेदारी को सभी सदस्य देश मिल कर उठाएंगे। इसके लिए एक कोटा व्यवस्था तैयार की गई जिसमें तय किया गया कि किस देश को अपने यहां कितने लोगों को जगह देनी है। लेकिन यही कोटा झगड़े की जड़ बन गया। पोलैंड, चेक रिपब्लिक, हंगरी और स्लोवाकिया के नेता शरणार्थियों को लेने के लिए बिल्कुल राजी नहीं हुए। यही नहीं, उन्होंने यूरोपीय संघ के भीतर मध्य यूरोपीय देशों का एक गुट बना लिया। जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों पर आरोप लगे कि वे यूरोपीय संघ के छोटे देशों पर अपनी मर्जी थोप रहे हैं।

अब नई डील में सभी सदस्य देशों से कहा गया है कि वे इटली और ग्रीस जैसे देशों में आने वाले शरणार्थियों को रोकने के लिए हर संभव कदम उठाएं। डील के मुताबिक उत्तरी अफ्रीका के जिन देशों से नौकाओं पर सवार होकर शरणार्थी यूरोप का रुख करते हैं, उन्हें वहीं रोकने के लिए कदम उठाए जाएं। साथ ही यूरोप की सीमा से बाहर क्षेत्रीय सेंटर बनाने की बात भी कही गई है जहां अंतरराष्ट्रीय जल सीमा में पकड़े गए आप्रवासी लोगों को रखा जाए।

इसके अलावा, यूरोपीय संघ के सदस्य अपने यहां माइग्रेशन प्रोसेसिंग सेंटर कायम कर सकते हैं जिसके जरिए वे यह तय करेंगे कि आने वाले लोगों को आर्थिक आप्रवासी मान कर वापस उनके देश वापस भेजा जाए या फिर उन्हें शरणार्थी के तौर पर वे अपने यहां जगह दें। इस तरह के केंद्रों के लिए पैसा यूरोपीय संघ देगा। लेकिन यह सब स्वेच्छा के आधार पर होगा। इसके लिए किसी पर कोई बाध्यता नहीं होगी।

इटली ने इस प्रस्ताव का स्वागत किया है, लेकिन यह नहीं बताया है कि वह अपने यहां इस तरह के सेंटर बनाएगा या नहीं। इटली ने हाल के दिनों में अपने तटों पर पहुंचने वाली कई नौकाओं को वापस भेजा है। यूरोपीय संघ के शिखर सम्मेलन में सबसे ज्यादा नजरें भी इटली पर ही थीं जहां एक महीने पहले शरणार्थियों का विरोध करने वाली दो पार्टियों ने गठबंधन सरकार बनाई है। ब्रसेल्स में इटली के प्रधानमंत्री जुसेप कोंते की हर मांग को जब तक नहीं मान लिया गया, वे यूरोपीय संघ के हर निष्कर्ष पर वीटो करते रहे। अब वह डील से बहुत संतुष्ट हैं।

खुश पोलैंड, चेक रिपब्लिक, हंगरी और स्लोवाकिया भी हैं जिन्होंने शरणार्थियों के मुद्दे पर यूरोपीय संघ में बगावत का झंडा उठा रखा था। पोलैंड और चेक गणराज्य के नेता माइग्रेशन डील को यूरोपीय संघ के भीतर मध्य यूरोपीय देशों की जीत बता रहे हैं। चेक गणराज्य के प्रधानमंत्री आंद्रे बाबिस ने ट्वीट किया, “हम अब उस बिंदु पर पहुंच गए हैं जहां लोग कोटे की बात नहीं कर रहे हैं। (शरणार्थियों का) बंटवारा और पुर्नवास स्वैच्छिक होगा, मतलब कोई हम पर आप्रवासियों को थोप नहीं सकता।”
जर्मन चांसलर मैर्केल को घरेलू स्तर पर इस डील से राहत मिलने की उम्मीद है। इस मुद्दे पर बगावती तेवर अपनाने वाली उनकी गठबंधन सहयोगी सीएसयू पार्टी ने डील पर संतोष जताया है। मैर्केल की सरकार में गृह मंत्री और सीएसयू पार्टी के नेता हॉर्स्ट जेहोफर ने साफ कर दिया था कि अगर जर्मनी में आने वाले शरणार्थियों की संख्या पर पाबंदी नहीं लगाई तो वह एकतरफा कदम उठाएंगे। उन्होंने जर्मन प्रांत बवेरिया की सीमा पर पहुंचने वाले शरणार्थियों को वापस भेजने की धमकी दी थी। इससे मैर्केल की सीडीयू पार्टी से उनकी पार्टी का 70 साल पुराना गठबंधन टूटने की आशंका पैदा हो गई थी। दक्षिणी राज्य वबेरिया में सीएसयू ही सरकार है। मैर्केल को निश्चित तौर पर अपनी सरकार की चिंता होगी, लेकिन वह शरणार्थी संकट का एक यूरोपीय हल चाहती हैं। दस लाख से ज्यादा शरणार्थियों को जर्मनी में जगह देने के लिए जहां घरेलू स्तर पर मैर्केल की लोकप्रियता घटी है, वहीं यूरोपीय स्तर पर कोटा व्यवस्था को लेकर लगातार उन्हें आलोचना झेलनी पड़ी।

नई डील पर यूरोपीय राजनेता जहां राहत की सांस ले रहे हैं, वहीं कई राहत संस्थाओं ने इसकी आलोचना की है। डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स का कहना है कि इस डील का मकसद जरूरतमंद और बेहसारा लोगों को यूरोपीय संघ से बाहर रखना है। संस्था का कहना है कि यूरोप पहुंचे लोगों को वापस लीबिया जैसे देशों में भेजा जा सकता है जहां बहुत खराब हालात हैं। संयुक्त राष्ट्र की बाल संस्था यूनिसेफ यूरोपीय संघ के भीतर बनाए जाने वाले माइग्रेशन प्रोसेसिंग केंद्रों को लेकर आशंकित है। यूनिसेफ की प्रवक्ता साराह क्राउन को चिंता है कि इन केंद्रों में बच्चों को भी हिरासत में रखा जाएगा। ऐसे केंद्रों को ‘नियंत्रित केंद्र’ कहा जा रहा है। इससे संकेत मिलता है कि वहां रहने वाले लोगों को बाहर जाने की अनुमति नहीं होगी। जर्मनी में शरणार्थियों के लिए काम करने वाली एक संस्था प्रो असिल के प्रमुख ग्युंठर बुर्कहार्ट कहते हैं कि प्रताड़ित और सताए गए लोगों को कैद करना अमानवीय है। उनके मुताबिक अगर कोई व्यक्ति किसी अन्य देश में शरण मांगता है तो यह कोई अपराध नहीं है।

जरूरतमंदों की तरफ मदद का हाथ बढ़ाना इंसानियत का तकाजा है। लेकिन सियासत के अपने अलग तकाजे होते हैं और यूरोप में शरणार्थी आजकल सबसे बड़ा सियासी मुद्दा हैं। इस मुद्दे पर जनता की भावनाओं को भड़का कर कई पार्टियां सत्ता में पहुंच चुकी हैं। जिन देशों में वे सत्ता में नहीं है, वहां सत्ताधारी पार्टियों पर दबाव है। यही वजह है कि शुरू में खुले दिल से शरणार्थियों के लिए जर्मनी की सीमाएं खोलने वाली मैर्केल भी अब बैकफुट पर हैं। कुल मिलाकर नई डील इंसानियत की कसौटी पर भले खरी ना उतरे पर सियासत की कसौटी पर बिल्कुल माकूल है। वैसे भी इंसानियत की चिंता किसे है।

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