पाकिस्तान इस वक्त काफी चर्चा में है। इसकी प्रमुख वजह है कि वो अमेरिका और ईरान के बीच एक प्रमुख मध्यस्थ के रूप में उभरा है। इसमें सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दो हफ्ते के युद्धविराम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पाकिस्तान ने शुक्रवार को अमेरिका और ईरान दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता के लिए इस्लामाबाद में मंच तैयार किया है।

पाकिस्तान की इस मध्यस्थता को लेकर भारत में स्पष्ट रूप से बेचैनी है। आधिकारिक तौर पर यह माना जा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक रास्ता चाहते थे और पाकिस्तान ने मदद के लिए तुरंत हस्तक्षेप किया।

हालांकि, घटनाओं का क्रम स्पष्ट करता है कि पाकिस्तान ने सुनियोजित तरीके से रणनीति अपनाई। इस्लामाबाद ने ऐसे कदम उठाए जिससे उसे अपनी क्षमता से कहीं ज्यादा प्रभाव डालने में मदद मिली। पिछले साल अप्रैल में हुए क्रिप्टो डील और मई में हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद से व्हाइट हाउस तक मिली अपनी नई पहुंच का फायदा उठाते हुए इस्लामाबाद ने ट्रंप प्रशासन के बीच अपनी एक खास जगह बनाई।

अमेरिका और ईरान ने पाकिस्तान की तारीफ की

दो हफ्ते के युद्धविराम को लेकर ट्रंप और ईरानी विदेश मंत्री अरागची दोनों ने पाकिस्तान की प्रशंसा की। ट्रंप ने इस सीजफायर का श्रेय प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के साथ हुई बातचीत को दिया, जबकि अरागची ने युद्ध खत्म करने के प्रयासों के लिए मुनीर और शरीफ की तारीफ की।

प्रधानमंत्री शरीफ ने युद्धविराम तक पहुंचने में अमूल्य और पूर्ण समर्थन देने के लिए चीन, सऊदी अरब, तुर्की, मिस्र और कतर को धन्यवाद दिया, जो व्यापक समर्थन गठबंधन का संकेत है। उन्होंने खाड़ी सहयोग परिषद के मित्र देशों और अमेरिकी नेतृत्व को शांति को संभव बनाने में उनके असाधारण रणनीतिक दूरदर्शिता, बुद्धिमत्ता और धैर्य के लिए भी धन्यवाद दिया।

कई हफ्तों की कूटनीति

पाकिस्तान के प्रमुख डेली डॉन के अनुसार, घोषणा से पहले दो हफ्ते से ज्यादा समय तक गहन और काफी हद तक गुप्त कूटनीति चली। रिपोर्ट के मुताबिक, 28 फरवरी को संघर्ष शुरू होने के बाद इस्लामाबाद ने तुरंत कार्रवाई की। पहले हमले के कुछ ही दिनों के भीतर, पाकिस्तानी अधिकारियों ने कई राजधानियों में राजनयिक संपर्क स्थापित करना शुरू कर दिया। अखबार ने कहा, “सार्वजनिक रूप से तटस्थता बनाए रखते हुए, पाकिस्तान ने चुपचाप खुद को वाशिंगटन और तेहरान के बीच एक सेतु के रूप में स्थापित किया। ये दोनों ऐसे विरोधी हैं जिनके बीच सीधे राजनयिक संबंध नहीं हैं। पाकिस्तान वाशिंगटन में ईरान के हितों का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे उसे दोनों राजधानियों में एक दुर्लभ संस्थागत पकड़ प्राप्त होती है।

रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के प्रयासों का सबसे स्पष्ट चरण 29-30 मार्च को सामने आया, जब पाकिस्तान, सऊदी अरब, मिस्र और तुर्की के विदेश मंत्रियों ने इस्लामाबाद में मुलाकात की। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार के नेतृत्व में हुई इन परामर्श बैठकों का मुख्य उद्देश्य सैन्य तनाव को और बढ़ने से रोकना और अमेरिका-ईरान वार्ता शुरू करने के लिए एक ढांचा तैयार करना था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इसमें इस्लामाबाद में सुनियोजित वार्ता की परिकल्पना की गई थी। हालांकि तत्काल बातचीत नहीं हो पाई, लेकिन इस्लामाबाद ने अपनी पहुंच कम करने के बजाय उसे और तेज कर दिया।

मुनीर ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समेत वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों से बातचीत की और शरीफ ने वाशिंगटन, मॉस्को, बीजिंग, प्रमुख यूरोपीय राजधानियों, खाड़ी सहयोग परिषद के देशों, तुर्की, मिस्र और सऊदी अरब में एक दर्जन से अधिक विश्व नेताओं और वरिष्ठ अधिकारियों से बात की। रिपोर्ट में कहा गया है कि इसका उद्देश्य औपचारिक वार्ता की दिशा में पहले कदम के रूप में सीमित युद्धविराम पर आम सहमति बनाना था।

पाकिस्तानी अधिकारी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर से जुड़े लोगों सहित ईरानी समकक्षों के साथ संपर्क में रहे। यह सुनिश्चित करते हुए कि उस समय संचार चैनल खुले रहें जब वाशिंगटन और तेहरान के बीच सीधे आदान-प्रदान गंभीर रूप से बाधित थे।

युद्धविराम ढांचा

रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल की शुरुआत में इस्लामाबाद ने एक युद्धविराम ढांचा तैयार किया। इसमें दुश्मनी को तत्काल रोकने का प्रस्ताव था। इसमें प्रमुख समुद्री मार्गों के आसपास तनाव कम करना भी शामिल था।

हालांकि, देरी जारी रही और मतभेद तीखे बने रहे। विशेष रूप से क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था और समुद्री पहुंच को लेकर बढ़ते सैन्य और राजनीतिक दबाव ने समझौते के लिए जगह बनाई। जैसे-जैसे समय सीमा नजदीक आती गई और व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का डर बढ़ता गया, पाकिस्तान के प्रस्ताव को समर्थन मिलने लगा और इसके परिणामस्वरूप 7 अप्रैल को युद्धविराम हुआ। अगले चरण की शुरुआत 10 अप्रैल को इस्लामाबाद में होने की उम्मीद है।

पिछले साल मई में ट्रंप द्वारा ऑपरेशन सिंदूर में युद्धविराम की घोषणा वाले ट्वीट और पाकिस्तान द्वारा समर्थित मध्यस्थता के उनके बार-बार के दावों के बाद से ही भारत सतर्क है। दिल्ली को इस बात की चिंता है कि पाकिस्तान, जिसे उसने कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिश की है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक शक्ति गलियारों में एक प्रमुख स्थान हासिल कर चुका है। कई हलकों में इस बात का आकलन है कि विदेश मंत्री एस जयशंकर की अप्रत्याशित टिप्पणी और युद्ध के संदर्भ में पाकिस्तान को ‘दलाल’ कहना और उनके द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा उचित नहीं थी।

खाड़ी क्षेत्र में सेवा दे चुके एक पूर्व राजनयिक ने कहा कि अगर अमेरिका-ईरान वार्ता आगे बढ़ती है और हमारे सहयोगियों को शामिल करते हुए उस बेहद जटिल रास्ते पर प्रगति होती है, तो भारत के लिए पाकिस्तान को अलग-थलग करना और उसे खलनायक के रूप में चित्रित करना मुश्किल होगा। खासकर हमारी ऊर्जा जरूरतों और इस क्षेत्र पर हमारी निर्भरता को देखते हुए।

भारतीय प्रतिष्ठान आने वाले हफ्तों और महीनों में वाशिंगटन के साथ संपर्क स्थापित करके कुछ हद तक सफलता हासिल करने के तरीके तलाशेगा। क्योंकि विदेश सचिव विक्रम मिसरी अमेरिका जा चुके हैं और जयशंकर 11-12 अप्रैल को यूएई की यात्रा करेंगे।

सीजफायर पर जेडी वेंस बोले- स्थिति अभी भी नाजुक, बातचीत को लेकर ट्रंप बेचैन

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान युद्ध को खत्म करने की दिशा में प्रगति करने को लेकर बेचैन हैं और उन्होंने अपनी बातचीत करने वाली टीम को निर्देश दिया है कि वे ईरानियों के साथ सद्भावना से बातचीत करें। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने बुधवार को यह बात कही। पढ़ें पूरी खबर।