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जी-सात : ‘बी3डब्लू’ योजना, नई वैश्विक गोलबंदी की कितनी जरूरत

विश्व के ताकतवर देशों के समूह जी-सात को नई वैश्विक गोलबंदी की जरूरत महसूस हो रही है। फ्रांस में हुए तीन दिवसीय सम्मेलन में जी-सात समूह ने ‘निम्न और मध्यम’ आय वाले देशों का समर्थन करने की योजना बनाई।

( बाएं) पिनाक रंजन चक्रवर्ती, पूर्व राजनयिक। सीएम भंडारी, पूर्व राजनयिक।

विश्व के ताकतवर देशों के समूह जी-सात को नई वैश्विक गोलबंदी की जरूरत महसूस हो रही है। फ्रांस में हुए तीन दिवसीय सम्मेलन में जी-सात समूह ने ‘निम्न और मध्यम’ आय वाले देशों का समर्थन करने की योजना बनाई। जी-सात देश इन्हें बेहतर बुनियादी ढांचा खड़ा करने में मदद करेंगे। वैश्विक स्तर पर चीन जिस तरह से औद्योगिक, सामरिक, रणनीतिक चुनौतियां पेश करता रहा है, उसमें विकसित औद्योगिक देशों को अपना दायरा विस्तृत करने की जरूरत महसूस हो रही है।

ऐसी कवायद में भारत प्रमुख साझीदार के रूप में उभरा है। भारत के साथ आॅस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और दक्षिण अफ्रीका को साथ लिया गया है। कुछ अरसा पहले चार देशों के समूह ‘क्वाड’ की बैठक में भी अहम मुद्दा चीन की नीतियां रहीं। ‘क्वाड’ की बैठक में बनी भूमिका को जी-सात की बैठक में आगे बढ़ाया गया। अपने भाषण में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने ‘बी3डब्लूू’ (बिल्ड बैक बेटर वर्ल्ड) योजना रखी, जिसे चीन की आर्थिक-वाणिज्यिक योजनाओं के सामने एक उच्च गुणवत्ता वाले विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है।

वैकल्पिक योजना

चीन की ‘बेल्ट एंड रोड परियोजना’ (बीआरआइ) ने कई देशों में ट्रेनों, सड़कों और बंदरगाहों को सुधारने के लिए आर्थिक मदद की है। इस बात को लेकर चीन की आलोचना भी होती रही है कि उसने कुछ देशों को मदद के नाम पर कर्ज में डुबोने के बाद, उनको अपने चंगुल में फंसाने और उन देशों के रणनीतिक महत्त्व के क्षेत्रों पर काबिज होने की कोशिश की, जैसे श्रीलंका का बंदरगाह। चीन की इस नीति के विकल्प को लेकर वैश्विक स्तर पर अरसे से बहस चल रही थी।

अमेरिका विशेष रूप से चीन की तथाकथित अमेरिका विशेष रूप से चीन की ‘ऋण कूटनीति’ की आलोचना करता रहा है। जी-सात नेताओं ने अपने संयुक्त बयान में कहा, ‘वे मूल्यों द्वारा संचालित, उच्च-मानकों वाली, एक पारदर्शी साझेदारी की पेशकश करेंगे।’ हालांकि, इस बारे में अभी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई है कि इस जी-सात योजना के तहत कैसे वित्तपोषित किया जाएगा। बैठक में जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल ने कहा कि जी-सात की यह योजना अभी उस चरण में नहीं है, जब वित्तपोषण के बारे में जानकारी सार्वजनिक की जा सके।

लोकतांत्रिक देशों की एकजुटता

जी-सात में दुनिया के सात सबसे धनी लोकतांत्रिक देश शामिल हैं। इसमें अमेरिका और ब्रिटेन के अलावा कनाडा, फ़्रांस, जर्मनी, इटली और जापान का नाम है। ‘क्वाड’ में अमेरिका, जापान के अलावा भारत और आॅस्ट्रेलिया शामिल हैं। जी-सात की बैठक को अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अपनी कूटनीतिक पहुंच को बढ़ाने का मंच बनाया है।

राष्ट्रपति के रूप में अपने पहले बड़े विदेशी दौरे पर उन्होंने अपनी यह मंशा रेखांकित की कि विश्व की बड़ी चुनौतियों और भविष्य के लिहाज से महत्त्वपूर्ण मसलों से निपटने के मामले में दुनिया के लोकतांत्रिक देश एकजुट हैं। बैठक के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति और ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के बीच बैठक के बाद अटलांटिक घोषणापत्र के नए प्रारूप पर हस्ताक्षर किए गए। इसके तहत वैश्विक चुनौतियों के समाधान और लोकतंत्र की रक्षा, सामूहिक सुरक्षा की महत्ता और एक उचित एवं सतत वैश्विक व्यापार तंत्र जैसे विभिन्न मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने का संकल्प लिया गया।

भारत की पेशकश

2014 के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दूसरी बार जी-सात सम्मेलन को संबोधित किया। उन्होंने डिजिटल माध्यम से सम्मेलन में हिस्सा लिया और ‘एक विश्व, एक स्वास्थ्य’ की बात उठाई। कोविड-19 टीकों की न्यायसंगत उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए टीके के पेटेंट में अस्थायी ढील देने से जुड़े भारत और दक्षिण अफ्रीका के प्रस्ताव को जी-7 शिखर सम्मेलन में व्यापक समर्थन मिला।

प्रधानमंत्री मोदी की अपील को दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा, आॅस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मोरिसन, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूटीओ) की महानिदेशक एन्गोजी ओकोंजो इवेला और संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतारेस का समर्थन मिला। विदेश मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव (आर्थिक संबंध) पी हरीश के मुताबिक, डब्लूटीओ में ट्रिप्स संबंधी छूट के भारत-दक्षिण अफ्रीका के प्रस्ताव को चर्चा में व्यापक समर्थन मिला। डब्लूटीओ की ट्रिप्स (बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार संबंधित पहलू) परिषद में प्रस्ताव पर पाठ आधारित बातचीत शुरू होने की उम्मीद है।

जी-सात कितना प्रभावी

जी-सात की आलोचना यह कह कर की जाती है कि यह कभी भी प्रभावी संगठन नहीं रहा है, हालांकि समूह कई सफलताओं का दावा करता है, जिनमें एड्स, टीबी और मलेरिया से लड़ने के लिए वैश्विक फंड की शुरुआत करना भी है। इसने 2002 के बाद से अब तक 2.7 करोड़ लोगों की जान बचाई है। 2016 के पेरिस जलवायु समझौते को लागू करने के पीछे इसकी भूमिका है।

चीन दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवथा के बावजूद इस समूह का हिस्सा नहीं है। इसकी वजह यह है कि यहां दुनिया की सबसे बड़ी आबादी रहती हैं। प्रति व्यक्ति आय संपत्ति जी-सात समूह देशों के मुकाबले बहुत कम है। ऐसे में चीन को उन्नत या विकसित अर्थव्यवस्था नहीं माना जाता। 1998 में इस समूह में रूस भी शामिल हो गया था और यह जी-7 से जी-8 बन गया था लेकिन 2014 में यूक्रेन से क्रीमिया हड़प लेने के बाद रूस को समूह से निलंबित कर दिया गया था।

क्या कहते
हैं जानकार

अंतरराष्ट्रीय कारोबार, सुरक्षा, रणनीतिक कूटनीति और चरमपंथ जैसे मसलों पर नई वैश्विक गोलबंदी हो रही है। जी-सात और क्वाड जैसे संगठन आने वाले दिनों में वैश्विक पटल पर अहम भूमिका निभाएंगे।
– पिनाक रंजन चक्रवर्ती,
पूर्व राजनयिक

चीन के वैश्विक अभियान के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए एक बुनियादी ढांचा योजना सामने है। लेकिन इस पर सहमति जरूरी कि मानवाधिकारों के उल्लंघन पर चीन को किस तरह रोका जाए।
– सीएम भंडारी,
पूर्व राजनयिक

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