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सीमा विवाद पर चर्चा के लिए डोभाल जाएंगे चीन

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल लंबित सीमा विवाद और अन्य रणनीतिक मुद्दों पर अपने चीनी समकक्ष के साथ अनौपचारिक वार्ता करने के लिए अगले सप्ताह चीन यात्रा करेंगे.

Author बेजिंग | January 1, 2016 00:51 am
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल (फाइल फोटो)

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल लंबित सीमा विवाद और अन्य रणनीतिक मुद्दों पर अपने चीनी समकक्ष के साथ अनौपचारिक वार्ता करने के लिए अगले सप्ताह चीन यात्रा करेंगे। इस संबंध में गुरुवार को यहां घोषणा की गई। चीनी अधिकारियों ने बताया कि चीन-भारत सीमा वार्ता के लिए विशेष प्रतिनिधि डोभाल पांच जनवरी को अपने चीनी समकक्ष और राजकीय काउंसिलर यांगी जीची के साथ अनौपचारिक वार्ता करेंगे। इस दौरान दोनों अधिकारी सीमा मुद्दे पर हुई प्रगति की समीक्षा करेंगे। इस यात्रा के दौरान डोभाल छह जनवरी को चीनी प्रधानमंत्री ली क्विंग से भी भेंट करेंगे।

भारत और चीन 3488 किलोमीटर लंबी सीमा को लेकर चल रहे विवाद को सुलझाने की दिशा में 18 दौर की वार्ता कर चुके हैं। सीमा पर वार्षिक वार्ता के अलावा विशेष प्रतिनिधि विभिन्न रणनीतिक मुद्दों के संदर्भ में हुई प्रगति की समीक्षा करने और उन पर चर्चा करने के लिए अनौपचारिक रूप से भी मिलते हैं। इनमें आस-पड़ोस और द्विपक्षीय संबंध से जुड़ी बातें भी शामिल हैं। यह वार्ता ऐसे समय में हो रही है जब चीन दक्षिण एशिया के देशों के साथ अपनी नजदीकियां बढ़ाना चाहता है। चीन के इस प्रयास से भारत में चिंता पैदा हो गई है।

चीन का कहना है कि सीमा विवाद महज पूर्व क्षेत्र खासकर अरुणाचल प्रदेश को लेकर है और वह उस पर दक्षिण तिब्बत के हिस्से के रूप में दावा करता है जबकि भारत इस बात पर बल देता है कि विवाद पश्चिमी क्षेत्र खासकर 1962 की लड़ाई में चीन द्वारा कब्जा लिए गए क्षेत्र को लेकर है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का पदभार ग्रहण करने के बाद डोभाल दो बार बेजिंग की यात्रा कर चुके हैं और इस साल उन्होंने नई दिल्ली में सीमा वार्ता के 18वें दौर में हिस्सा लिया था।

वह चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा से पहले सितंबर 2014 में चीन गए थे। इसके बाद जब इस साल के प्रारंभ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन यात्रा पर गए थे तब वह उनके प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे। जटिल सीमा वार्ता के अलावा दोनों पक्षों ने इस साल अपनी बातचीत चीनी सैनिकों द्वारा विशेषकर लद्दाख सेक्टर में बार बार घुसपैठ पर केंद्रित रखी। इस घुसपैठ की वजह से सीमा पर तनाव पैदा हो गया।

इनमें से दो घुसपैठ 2013 में ली की और 2014 में शी की भारत यात्रा के दौरान हुई। दोनों ही मौकों पर लंबे समय तक गतिरोध रहा जो लंबी बातचीत से हल हुआ। चीन का कहना है कि सीमा को लेकर अलग-अलग धारणाओं की वजह से समस्या खड़ी होती है। दोनों पक्षों ने इस साल यहां संवाद व समन्वय कार्यप्रणाली की बैठक की थी जिसमें घुसपैठ के मुद्दे पर चर्चा हुई। यह मुद्दा चीन के सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के अध्यक्ष जनरल फान चांगलोग की भारत यात्रा और भारत की उत्तरी कमान की कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल डी एस हुड्डा की हाल की चीन यात्रा के दौरान भी उठा था।

दोनों पक्षों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैनिकों के बीच संवाद में सुधार के लिए कई सीमा केंद्र खोले। जुलाई में डोभाल ने कहा था कि सीमा विवाद का निस्तारण भारत चीन संबंध के लिए अहम है और उन्होंने सभी पेचीदा मुद्दों के हल के लिए उस देश से ‘निपटने’ के लिए व्यापक योजना का आवाह्न किया था। नई दिल्ली में डोभाल ने एक व्याख्यान में कहा था कि चीन के साथ संबंध तो सुधर रहे हैं लेकिन हमें पूर्वी क्षेत्र को लेकर विशेष चिंता है जहां तवांग (अरूणाचल प्रदेश) पर दावा किया गया है लेकिन यह स्वीकृत सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत है।

उन्होंने इस बात पर भी आश्चर्य प्रकट किया कि चीन मैकमोहन रेखा पर बर्मा तक सहमत हुआ था लेकिन उसके बाद उसे स्वीकार नहीं किया जा रहा। इस सीमा रेखा का नाम ब्रिटिश कालीन भारत सरकार में विदेश सचिव रहे सर हेनरी मैकमोहन के नाम पर रखा गया था जो 1914 में विवाद निस्तारण के लिए मुख्य वार्ताकार थे। डोभाल ने कहा था, ‘चीन के साथ अब द्विपक्षीय संबंध के लिए हमारे पास बड़ी लंबी सीमा है हमारे पास 3,488 किलोमीटर लंबी, बिल्कुल कठिन और पहाड़ी सीमा है। सीमा अहम मुद्दा है।’

डोभाल के बयान पर चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनियिंग ने कहा था, ‘चीन सरकार मैकमोहन रेखा को मान्यता नहीं देती, यह अवैध है।’ उन्होंने कहा था, ‘चीनी पक्ष दोस्ताना संवाद से यथाशीघ्र इस सीमाप्रश्न का हल करने के लिए भारतीय पक्ष के साथ काम करने को तैयार है ताकि द्विपक्षीय संबंध के विकास के लिए और अनुकूल माहौल बने।’

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