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रूस-जर्मन गैस पाइपलाइन पर क्यों बंटे यूरोपीय देश?

फिनलैंड की सीमा पर स्थित रूस के वायबॉर्ग से जर्मनी के ग्राइफ्सवाल्ड को जोड़ने वाली इस पाइपलाइन की मदद से रूस पश्चिम यूरोप को सालाना 55 अरब घनमीटर साइबेरियाई भूगैस की सप्लाई करेगा। इस वैकल्पिक पाइपलाइन की योजना रूस यूक्रेनी विवाद के साए में बनी थी जब यूक्रेन ने गैस कीमतों पर हुए विवाद के बाद रूस से होने वाली ट्रांजिट सप्लाई को रोक दिया था।

इस गैस पाइपलाइन का एक और भूराजनैतिक महत्व है।

बाल्टिक सागर से होकर रूस और जर्मनी को जोड़ने वाली नॉर्ड स्ट्रीम गैस पाइपलाइन ने यूरोपीय देशों को दोफाड़ कर दिया है। रूसी कंपनी गाजप्रोम इस पाइपलाइन को 2019 तक पूरा कर लेना चाहती है। इसके लिए दस-दस मीटर की लंबाई वाले स्टील के पाइप बनकर तैयार हैं और पूर्वी जर्मनी के पोर्ट शहर मुकरान में उन पर कंक्रीट का खोल चढ़ाया जा रहा है। इन पाइपों को जोड़कर ही 1224 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बनाई जाएगी। लेकिन उन्हें समुद्र में बिछाने से पहले ही यूक्रेन को होने वाले संभावित नुकसान ने इस योजना को भूराजनीतिक सवाल बना दिया है। फिनलैंड की सीमा पर स्थित रूस के वायबॉर्ग से जर्मनी के ग्राइफ्सवाल्ड को जोड़ने वाली इस पाइपलाइन की मदद से रूस पश्चिम यूरोप को सालाना 55 अरब घनमीटर साइबेरियाई भूगैस की सप्लाई करेगा। इस वैकल्पिक पाइपलाइन की योजना रूस यूक्रेनी विवाद के साए में बनी थी जब यूक्रेन ने गैस कीमतों पर हुए विवाद के बाद रूस से होने वाली ट्रांजिट सप्लाई को रोक दिया था और कई देशों में ऊर्जा का संकट पैदा हो गया था।

8 अरब यूरो की इस पाइपलाइन परियोजना में रूसी कंपनी गाजप्रोम के अलावा फ्रांस की एंजी, ब्रिटिश डच कंपनी शेल, ऑस्ट्रिया की ओएमवी और जर्मनी की यूनिपर और विंटरशाल कंपनियां शामिल हैं। जर्मनी के पूर्व चांसलर गेरहार्ड श्रोएडर नॉर्ड स्ट्रीम कंपनी के निगरानी बोर्ड के प्रमुख हैं। भले ही यह परियोजना पश्चिम यूरोप को गैस सप्लाई की गारंटी देती हो, लेकिन पिछले सालों में व्लादिमीर पुतिन के रूस के साथ जिस तरह से पश्चिमी देशों के रिश्ते बिगड़े हैं, उसके चलते सारी परियोजना सिर्फ आर्थिक मुद्दा भर नहीं रह गई है। परियोजना के जितने समर्थक हैं, उतने ही विरोधी भी हैं। कुछ इसका विरोध इसलिए कर रहे हैं कि इससे रूस आर्थिक तौर पर मजबूत होगा तो कुछ दूसरे यूक्रेन के साथ एकजुटता की वजह से इसका विरोध कर रहे हैं। रूस द्वारा यूक्रेनी इलाके क्रीमिया के अधिग्रहण और यूक्रेन के पूर्वी हिस्से में रूस समर्थित विद्रोह के बाद अभी तक दोनों देशों के संबंध सुधरे नहीं हैं।

इस गैस पाइपलाइन का एक और भूराजनैतिक महत्व है। जर्मनी, नीदरलैंड्स और ब्रिटेन में भूगैस का भंडार कम होता जा रहा है। नॉर्वे में भी सालाना गैस निकासी की मात्रा में कमी के संकेत हैं। ऐसे में, रूस पश्चिम यूरोप में इस कमी को पूरा कर सकता है। लेकिन दूसरी ओर इस समय 30 प्रतिशत हिस्से के साथ रूस पश्चिम यूरोप का सबसे बड़ा गैस सप्लायर है। नई पाइपलाइन के बनने से यह हिस्सा भविष्य में और बढ़ सकता है और इसी पर यूरोपीय संघ के देशों में राजनीतिक विवाद है। खासकर पूर्वी यूरोप के देशों का अनुभव रूस के साथ बहुत अच्छा नहीं रहा है। कभी सोवियत प्रभाव क्षेत्र में रहे इन देशों के ईयू में शामिल होने के फैसले के बाद रूस ने गैस की कीमतें कई गुना बढ़ा दी। इसके अलावा जहां कहीं गाजप्रोम को बाजार में प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है, वहां गैस की कीमतें कम हैं, लेकिन पूर्वी यूरोप के देशों में जहां उसका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं, गैस की कीमतें ज्यादा हैं।

जिन देशों के पास से पाइपलाइन गुजरेगी उनमें एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया और पोलैंड के अलावा फिनलैंड, स्वीडन और डेनमार्क भी हैं, फिनलैंड ने पाइपलाइन के अपने पानी से गुजरने की अनुमति दे दी है। रूस, डेनमार्क और स्वीडन के अधिकारियों को अभी अनुमति देनी है। जर्मन अधिकारियों ने मार्च के अंत में ही इस परियोजना को मंजूरी दे दी थी, लेकिन चांसलर अंगेला मैर्केल ने इस हफ्ते कहा है कि योजना यूक्रेन की ट्रांजिट भूमिका पर स्पष्टता के बिना आगे नहीं बढ़ सकती। यूक्रेन और उसके साथी देशों को डर है कि नॉर्ड स्ट्रीम 2 के पूरा हो जाने पर रूस यूक्रेन और पोलैंड से होकर भेजी जाने वाली गैस की मात्रा घटा सकता है। इससे यूक्रेन और पोलैंड को मिलने वाली ट्रांजिट फीस कम हो जाएगी। इस समय यूक्रेन ट्रांजिट फीस से 2 अरब यूरो की कमाई करता है।

चांसलर मैर्केल के बयान के बाद गाजप्रोम के प्रमुख अलेक्सी मिलर ने कहा है कि कंपनी का इरादा कभी भी यूक्रेन होकर गैस की सप्लाई को रोकने का नहीं था। उन्होंने भविष्य में भी 10 से 15 अरब घनमीटर गैस यूक्रेन से होकर भेजने की बात कही है, लेकिन यूक्रेन ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया है। उसे अपनी आमदनी की चिंता है। यूं भी दोनों देश गैस की कीमत और ट्रांजिट फीस को लेकर नियमित रूप से लड़ते रहे हैं। यूक्रेन का कहना है कि कम से कम 40 अरब घनमीटर गैस की सालाना सप्लाई के बिना यूक्रेनी ट्रांजिट लाभप्रद नहीं रहेगा। 2017 में रूस ने यूक्रेन से होकर 93.5 अरब घनमीटर गैस यूरोपीय देशों को भेजी।

यूरोपीय गैस बाजार में अमेरिका के भी हित हैं। उसने जर्मनी को चेतावनी देते हुए कहा है कि नॉर्ड स्ट्रीम परियोजना को मंजूरी देने से रूस पर निर्भरता बढ़ जाएगी। पिछले सालों में अमेरिका ने फ्रैकिंग के जरिए भूगैस निकालना शुरू किया है। इसने अमेरिका की विदेशी खरीद पर निर्भरता घटाई है और साथ ही आमदनी का नया जरिया भी दिया है। खासकर अमेरिका के जिन 38 प्रातों में फ्रैकिंग के जरिए गैस निकल रही है, उसके सांसद रूस जर्मन पाइपलाइन का विरोध कर रहे हैं। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने पोलैंड और यूरोप के दूसरे देशों को ऊर्जा की खरीद को व्यापक बनाने में मदद का आश्वासन दिया है। इसमें अमेरिकी गैस की बिक्री के अलावा उसका भंडार बनाने पर जोर है। ट्रंप का पूरा ध्यान अमेरिका में नए रोजगार पैदा करने पर भी है।

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