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चीन का तिब्बतियों को फरमान, नया दलाई लामा हमारी हामी के बगैर नहीं बनेगा

मृत्यु के बाद 13वें दलाई लामा के शरीर को इस तरह रखा गया था कि सिर दक्षिण दिशा की तरफ था। कुछ दिन बाद शिष्यों ने देखा कि चेहरा पूरब दिशा की तरफ घूम गया है और शव रखने के स्थान पर उत्तरपूर्व की दिशा में एक फफूंदी उग आई थी। इन संकेतों की व्याख्या हुई तो उत्तर मिला कि दलाई लामा का जन्म तिब्बत के उत्तरपूर्व हिस्से में हुआ है।

चीन का तिब्बतियों को फरमान, नया दलाई लामा हमारी हामी के बगैर नहीं बनेगा
मौजूदा दलाई लामा की तस्वीर। फोटो- एक्सप्रेस आर्काइव

चीन के सम्राट कभी दलाई लामाओं को नमस्कार करते थे। आज वही चीन कह रहा है कि अगले दलाई लामा के नाम पर उसकी मोहर ज़रूरी है। उसका कहना है कि ऐसा पहले से होता आया है। लेकिन भारत में रह रहे तिब्बती तो ऐसा कतई नहीं मानते।

इतिहास बड़ी विचित्र चीज़ है। कुछ भी हो सकता है। कोई कल्पना कर सकता है कि दलाई लामा शब्द का चंगेज खान से कनेक्शन है। यह नाम चंगेज खानदान के अलतान खान ने दिया था। दलाई का अर्थ होता है सागर और लामा मायने ज्ञान। दलाई लामा=ज्ञान सागर।

तो चीन जैसे दक्षिण सागर को कंट्रोल करना चाहता है वैसे ही वह ज्ञान सागर, दलाई लामा के अगले अवतार को नियंत्रित करना चाहता है। हालांकि दलाई लामा यह इशारा करते आए हैं कि उनके बाद अब कोई दलाई लामा न होगा, लेकिन चीन ने अभी से कह दिया कि जो भी हो, हमारा अनुमोदन जरूरी होगा। उसने इस बात को कहने के लिए शुक्रवार को एक श्वेत पत्र जारी किया है। इसमें कहा गया है कि हर दलाई लामा के नाम पर चीनी सत्ता की मोहर लगती रही है।

यह ऐतिहासिक परम्परा किंग साम्राज्य के समय (1644-1911) से चली आई है। इस चीनी दस्तावेज में यह भी बताया गया है कि तिब्बत प्राचीन काल से चीन का हिस्सा रहा है। इसमें कहा है कि 1793 में आक्रमणकारी गुरखाओं को हराने के बाद किंग वंश के सम्राट ने एक हुक्मनामा जारी किया था। इसमें कहा गया था कि दलाई लामा और दूसरे जीवित बुद्धावतारों की खोज के लिए सोने के कलश से पर्चियां निकाली जाएंगी। इसके बाद जो नाम तय होगा, उसे चीन के सम्राट करेंगे। तभी वह दलाई लामा माना जाएगा।

चीन कुछ भी कहे। दलाई लामा को चुनने की एक लंबी और प्रक्रिया होती है। वह क्या होती है इस मौजूदा दलाई लामा की चयन प्रक्रिया से समझा जा सकता है। इनको साढ़े चार साल की आयु में गद्दी पर बिठाया गया था। नाम दिया गया था तेनज़िन ग्यात्सो। उनकी तलाश 13वें दलाई लामा के निधन के साथ ही शुरू हो गई थी। उनके निकटस्थ शिष्यों ने उसी दिन से वे चिह्न ढूंढ़ने और समझने शुरू कर दिए जो उन्हें नए दलाई लामा तक ले जाने वाले थे। हालांकि यह भविष्यवाणियां पहले से हो चुकी होती हैं कि दलाई लामा कहां और कब पैदा होंगे लेकिन उन भविष्यवाणियों को कठिन परीक्षा से गुजरना होता है।

मृत्यु के बाद 13वें दलाई लामा के शरीर को इस तरह रखा गया था कि सिर दक्षिण दिशा की तरफ था। कुछ दिन बाद शिष्यों ने देखा कि चेहरा पूरब दिशा की तरफ घूम गया है और शव रखने के स्थान पर उत्तरपूर्व की दिशा में एक फफूंदी उग आई थी। इन संकेतों की व्याख्या हुई तो उत्तर मिला कि दलाई लामा का जन्म तिब्बत के उत्तरपूर्व हिस्से में हुआ है। इसके बाद लात्सो नाम की झील में कुछ संकेत तलाशने का काम हुआ। अंततः तमाम संकेतों को जब मिला कर पढ़ा गया तो वे एक बालक के पास जा पहुंचे। इस बालक का नाम था ल्हामो धोंडुप। उसकी उम्र दो साल थी। यह आयु 13 दलाई लामा की मौत के समय के साथ फिट बैठती थी। यही बालक आज के मौजूदा अर्थात14वें दलाई लामा है।

दलाई लामा इस वक्त 85 साल के हैं। वे इस पद पर बैठने वाले 14वें व्यक्ति हैं। सो, उम्र के नाते 15वें दलाई लामा पर बात उठती रही है। मौजूदा दलाई लामा कई बार कहते रहे हैं कि अब और दलाई लामाओं की जरूरत नहीं। लेकिन उनके न रहने पर आगे का फैसला अनुयायी ही करेंगे। और, इस बात की पूरी संभावना है कि अगले दलाई लामा का चयन पूरे विधिविधान से होगा। उधर, अमेरिका भी कई बार कह चुका है कि चयन की पूरी स्वतंत्रता तिब्बतियों को मिलनी चाहिए।

आप यह तो जानते ही हैं कि चीन ने तिब्बत पर 1950 में हमला बोला था और उसके नौ साल बाद 1959 में मौजूदा दलाई लामा अपने समर्थकों के साथ जान बचाकर भारत आ गए थे। यहां इन्हें भारत सरकार ने हिमाचल में बसाया था। तब से तिब्बती समुदाय यहीं रह रहा है। इन लोगों ने निर्वसन अवस्था में तिब्बत की कथित सरकार भी बना रखी है।

चीन और तिब्बत के बीच रिश्ते तो थे। यह ऐतिहासिक तथ्य है। लेकिन क्या तिब्बत चीन का हिस्सा था। इस बात को भारत में बसे तिब्बती नहीं मानते। जहां तक ब्रिटेन की बात है तो उन्होंने बस इतना किया था कि उन्होंने रूसी महत्वाकांक्षाओं के मद्देनजर तिब्बत को एक तरह से अपने संरक्षण में ले लिया था। अंग्रेजों को डर था कि तिब्बत तक रूसी ज़ार आ जाएगा तो उनको दिक्कत थी। सो, इसके पहले रूस कुछ करता उन्होंने अपनी सेना भेज कर तिब्बत को पस्त कर दिया। ध्यान देने की बात है कि इस लड़ाई में चीन ने नहीं तिब्बत ने भाग लिया था।

लड़ाई के बाद तिब्बत को अंग्रेजों की सारी बाते माननी पड़ीं थीं। उन्हें कारोबार करने की अनुमति मिल गई थी और तिब्बत ने युद्ध क्षतिपूर्ति के रूप में 75 लाख रुपए देना स्वीकार किया था। तिब्बत ने यह भी स्वीकार किया था कि अंग्रेजों की अनुमति के बिना वह किसी देश से रिश्ते नहीं बनाएगा।

लेकिन चीन के तिब्बत से रिश्ते तब भी थे। इसीलिए अंग्रेजों ने जब मैकमहोन रेखा खींची थी, उन्होंने तिब्बत के साथ चीन के प्रतिनिधि को भी बुलाया था। चीन के प्रतिनिधि ने दस्तावेज पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। इसी बिनह पर चीन मैकमहोन लाइन को गैरकानूनी मानता है।

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First published on: 21-05-2021 at 10:30:49 pm