हल्के पीले रंग की इमारत के गलियारों में दर्जनों स्थानीय लोग बैठे हैं। इनमें से कुछ लोग हर महीने लगने वाला टीका (vaccine) लगवाने के लिए इंतजार कर रहे हैं। वहीं कोई घुटने की चोट दिखाने आया है तो कोई दांत में दर्द के इलाज के लिए डेंटिस्ट (दांत के डॉक्टर) की मदद का इंतजार कर रहा है।
नेपाल के चीन से लगे सीमावर्ती जिले रसुवा की पहाड़ी पर स्थित जिबजिबे ग्रामीण अस्पताल में आपका स्वागत है। यह इलाका पिछले महीने के आखिर में इस क्षेत्र में आई विनाशकारी अचानक बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में शामिल था।
यह स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र आमतौर पर आसपास के लोगों के लिए रोजमर्रा की बीमारियों, टीकाकरण, सामान्य स्वास्थ्य जांच और छोटी-मोटी चोटों के इलाज के लिए पहला पड़ाव होता है। लेकिन पिछले करीब एक हफ्ते से इस स्वास्थ्य केंद्र की भूमिका कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। बाढ़ में घायल हुए लोगों के लिए यह अस्पताल अब उम्मीद की एक किरण बन गया है।
इंडियन एक्सप्रेस सिटीजंस रिलीफ फंड
अप्रैल 2015 में आए भूकंप के बाद के हालात की तरह ही 11 साल बाद एक बार फिर द इंडियन एक्सप्रेस के पाठक मदद के लिए आगे आए। उस समय भी इस अखबार की अपील पर लोगों ने बढ़-चढ़कर सहयोग किया था। इनमें स्कूली बच्चों ने अपनी जेब खर्च का पैसा दिया था जबकि कंपनियों ने अपने कर्मचारियों की एक दिन की सैलरी दान की थी और सेना से रिटायर हुए लोगों ने अपनी पेंशन तक साझा की थी।
इन लोगों के योगदान से बने द इंडियन एक्सप्रेस सिटिजंस रिलीफ फंड से नेपाल के सिंधुपालचोक, रसुवा और नुवाकोट जिलों के अस्पतालों के लिए करीब 1.2 करोड़ नेपाली रुपये के जरूरी चिकित्सा उपकरण खरीदे गए थे। इनमें एक्स-रे मशीन, नवजात बच्चों के लिए रेडिएंट वार्मर, ऑपरेशन थिएटर की टेबल और सर्जरी में इस्तेमाल होने वाले उपकरण शामिल थे।
जिबजिबे ग्रामीण अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. निराजन भट्ट ने बताया, ”पिछले महीने बाढ़ आने वाले दिन हमारे अस्पताल में बाढ़ की वजह से घायल 10 मरीज आए थे। इनमें कुछ की हड्डियां टूट गई थीं, कुछ के सिर में चोट लगी थी और कुछ के फेफड़ों में खून जमा हो गया था। हमने इनमें से पांच मरीजों का इलाज यहीं किया जबकि बाकी को जिला मुख्यालय धुंचे भेज दिया गया। वहां से गंभीर रूप से घायल मरीजों को हेलीकॉप्टर से काठमांडू ले जाया गया।”
बाढ़ से पहले इस अस्पताल में रोजाना करीब 80 से 100 मरीज इलाज के लिए आते थे। अब मरीजों की संख्या बढ़कर 100 से 130 प्रतिदिन हो गई है।
ज्यादातर लोगों को मानसिक तनाव की समस्या
डॉ. भट्ट के मुताबिक, अब अस्पताल आने वाले ज्यादातर लोगों को पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) यानी किसी गंभीर घटना के बाद होने वाले मानसिक तनाव के लिए मनो-सामाजिक उपचार की जरूरत पड़ रही है।
उन्होंने बताया, ”कल ही हमारे पास एक मरीज आई थी जो तेज दर्द और काफी बेचैनी की शिकायत कर रही थी। लेकिन जब मैंने उसकी जांच की तो उसके सभी जरूरी स्वास्थ्य मानक सामान्य थे। बाद में पता चला कि बाढ़ में उसके पिता की मौत हो गई थी और इसके बाद के कई दिनों तक उसने बहुत कम खाना खाया था। यह अचानक पैदा हुए मानसिक तनाव (एक्यूट स्ट्रेस) का स्पष्ट मामला था।”
यह प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र फिलहाल एक छोटे ऑपरेशन थिएटर (OT), एक एक्स-रे मशीन, तीन इमरजेंसी बेड, दो ऑब्जर्वेशन बेड, एक ओपीडी रूम, डेंटल ओपीडी, डिलीवरी रूम और एक लैब की सुविधा के साथ काम कर रहा है।
अब इसे एक बड़े अस्पताल में बदला जा रहा है जिसमें 15 मरीजों के लिए बेड होंगे। अस्पताल प्रबंधन समिति के अध्यक्ष हरिकृष्ण देवकोटा ने बताया, ”इमारत का काम लगभग पूरा हो चुका है और ठेकेदार इसे एक सप्ताह में हमें सौंप देगा।”
देवकोटा ने कहा, ”द इंडियन एक्सप्रेस के पाठकों से मिले दान से इस स्वास्थ्य केंद्र को काफी मदद मिली। जिबजिबे में सर्जरी के उपकरण और ऑपरेशन थिएटर की टेबल उपलब्ध होने से लोगों को हर छोटी प्रक्रिया के लिए यहां से 90 किलोमीटर दूर, धुंचे या काठमांडू नहीं जाना पड़ता था।”
