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यूएन की रिपोर्ट: जातीय संघर्ष और आपदा की वजह से भारत में एक साल में 28 लाख लोग हुए विस्थापित

रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘संघर्ष अधिकतर पहचान एवं जातियता से संबद्ध रहते हैं और क्षेत्रीयता एवं जातीयता आधारित संघर्ष समेत यह हिंसक अलगाववाद तथा पहचान-आधारित आंदोलनों के साथ स्थानीय हिंसा का रूप ले लेता है।’’

Author May 22, 2017 7:14 PM
संयुक्त राष्ट्र। (फोटो-रॉयटर्स)

संयुक्त राष्ट्र के एक निगरानी केंद्र की नई रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में पिछले साल आपदाओं और पहचान एवं जातीयता से संबद्ध संघर्षों के चलते करीब 28 लाख लोग आंतरिक तौर पर विस्थापित हुए। नॉर्वे शरणार्थी परिषद (एनआरसी) के आंतरिक विस्थापन निगरानी केंद्र की ओर से जारी एक नई रिपोर्ट में विस्थापन की समस्या से सबसे अधिक प्रभावित देशों में भारत का स्थान तीसरा है, इसके बाद चीन और फिलीपीन हैं।

रिपोर्ट के अनुसार भारत में संघर्ष एवं हिंसा के चलते 4,48,000 नये विस्थापित हुए हैं। करीब 24,00,000 लोग आपदाओं के चलते विस्थापित हुए। रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘चीन और फिलीपीन के साथ देश में लगातार सबसे अधिक संख्या में विस्थापन देखा जा रहा है। हालिया वर्षों में विस्थापन मुख्यत: बाढ़ एवं तूफानी घटनाओं से संबद्ध रहे। हालांकि भारत के करीब 68 प्रतिशत क्षेत्र सूखा संभावित, 60 प्रतिशत भूकंप संवेदी और देश के 75 प्रतिशत तटीय हिस्से चक्रवातों एवं सुनामी संभावित क्षेत्र हैं।’’

रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘संघर्ष अधिकतर पहचान एवं जातियता से संबद्ध रहते हैं और क्षेत्रीयता एवं जातीयता आधारित संघर्ष समेत यह हिंसक अलगाववाद तथा पहचान-आधारित आंदोलनों के साथ स्थानीय हिंसा का रूप ले लेता है।’’

बहरहाल, भारत की उल्लेखनीय आर्थिक वृद्धि और इसकी सामाजिक सुरक्षा प्रणाली में सुधार के हालिया प्रयास सामाजिक समूहों एवं शहरी तथा ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों के बीच की असमानता को पाटने में नाकाम रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया, ‘‘जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में सशस्त्र बल विशेष शक्ति अधिनियम अब भी लागू हैं और अत्यधिक एवं असंगत बल प्रयोग के लिये किसी भी तरह के दंड के प्रावधान से मिली छूट के चलते मानवाधिकार उल्लंघन होते हैं।’’

नोटबंदी से नहीं रुका ब्लैकमनी
इससे पहले यूएन की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में अनुमानित ब्लैक मनी देश की जीडीपी की 20 से 25 फीसदी के आस-पास हो सकती है। इनमें वैल्यू के लिहाज से कैश का हिस्सा सिर्फ 10 फीसदी के ही आस-पास है। ऐसे में नोटबंदी ब्लैक मनी पर पुरी तरह से कंट्रोल करने का उपाय नहीं हो सकता है। इसके लिए सरकार को दूसरे उपायों पर विचार करना होगा।

संयुक्त राष्ट्र ने अपने रिपोर्ट में कहा था कि नोटबंदी सभी तरह की ब्लैक मनी पर कंट्रोल करने के लिए काफी साबित नहीं हुई। कैश के अलावा दूसरी तरह की संपत्ति के रूप में भी लोगों के पास अघोषित संपत्ति है। यूएन की रिपोर्ट के मुताबिक प्रॉपर्टी के पंजीकरण की प्रक्रिया में बदलाव करने की जरूरत है, जिससे कि प्रॉपर्टी में निवेश को लेकर पारदर्शिता आए।

वहीं, पारदर्शिता के लिए सभी तरह के टैक्स, आय घोषणा स्कीम और करदाता पहचान संख्या के माध्यम से ऊंचे मूल्य के लेनदेन पर नजर शामिल हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि नोटबंदी के दौर में कैश के विकल्पों को लेकर बढ़ी जागरूकता और सरकार की ओर से डिजिटल भुगतान को प्रोत्साहन दिए जाने से कैशलेस लेनदेन बढ़ने की संभावना है।

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