अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (NASA) अब चंद्रमा पर सिर्फ इंसानों को भेजने की तैयारी नहीं कर रही, बल्कि वहां स्थायी ठिकाना बनाने की दिशा में भी तेजी से काम कर रही है। नासा ने करीब 20 बिलियन डॉलर यानी लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपये का बड़ा प्लान तैयार किया है, जिसके तहत चंद्रमा पर एक परमानेंट बेस बनाया जाएगा। इस बेस पर रोवर, ड्रोन और कई वैज्ञानिक उपकरण तैनात किए जाएंगे, ताकि इंसान लंबे समय तक चंद्रमा पर रहकर काम कर सके।
नासा ने मंगलवार को इस महत्वाकांक्षी योजना का खुलासा किया। एजेंसी के प्रमुख जेरेड आइजैकमैन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि अमेरिका फिर से चंद्रमा पर लौट रहा है और यह सिर्फ मिशन नहीं बल्कि इंसानियत के भविष्य की तैयारी है। उनका कहना है कि चंद्रमा पर बनने वाला यह बेस किसी दूसरे ग्रह या खगोलीय दुनिया पर इंसानों की पहली स्थायी चौकी होगी।
नासा का मकसद सिर्फ चंद्रमा तक पहुंचना नहीं है, बल्कि वहां रहने और काम करने की तकनीक विकसित करना भी है। इसके लिए एजेंसी अगले कुछ सालों में तीन बड़े मिशन लॉन्च करेगी। इन मिशनों के जरिए चंद्रमा की सतह पर जरूरी उपकरण भेजे जाएंगे और वहां इंसानों के रहने लायक माहौल तैयार किया जाएगा।
नासा ने बताया कि पहला मिशन “Moon Base-I” इस साल सितंबर के बाद लॉन्च किया जा सकता है। इसके लिए Blue Origin के “Blue Moon Mark 1 Endurance” लैंडर को चुना गया है। यह मिशन चंद्रमा पर कई वैज्ञानिक उपकरण पहुंचाएगा। इनमें खास कैमरे और लेजर सिस्टम शामिल होंगे, जो यह समझने में मदद करेंगे कि चंद्रमा की सतह पर लैंडिंग के दौरान रॉकेट के थ्रस्टर कैसे असर डालते हैं।
यह मिशन चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास Shackleton Connecting Ridge इलाके में उतरेगा। नासा का मानना है कि यह इलाका भविष्य के मानव मिशनों के लिए काफी अहम साबित हो सकता है। यहां पर कई ऐसे प्रयोग होंगे जो आने वाले Artemis मिशनों का रास्ता आसान बनाएंगे।
नासा का दूसरा मिशन “Moon Base-II” भी इसी साल लॉन्च किया जाएगा। इस मिशन में 1100 पाउंड से ज्यादा सामान चंद्रमा तक पहुंचाया जाएगा। खास बात यह है कि इसमें एक खास रोवर “FLIP Rover” भी भेजा जाएगा। यह रोवर चंद्रमा की कठिन सतह पर चलने और वहां काम करने की तकनीक को बेहतर बनाने में मदद करेगा।
नासा ड्रोन जैसी तकनीक पर भी काम कर रहा है
इसके अलावा नासा ड्रोन जैसी तकनीक पर भी काम कर रहा है। भविष्य में ये ड्रोन चंद्रमा की सतह का सर्वे करेंगे, संसाधनों की खोज करेंगे और इंसानों के लिए सुरक्षित रास्ते तलाशेंगे। नासा चाहता है कि आने वाले समय में इंसान चंद्रमा पर उसी तरह काम कर सके जैसे आज धरती पर करता है।
तीसरा मिशन “Moon Base-III” भी इस साल के अंत तक लॉन्च करने की योजना है। यह मिशन चंद्रमा की सतह पर मौजूद रहस्यमयी चमकीले निशानों यानी “लूनर स्वर्ल्स” का अध्ययन करेगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि ये निशान चंद्रमा के अंदर मौजूद चुंबकीय ताकतों से जुड़े हो सकते हैं। इस मिशन में यूरोपियन स्पेस एजेंसी और कोरियन स्पेस एजेंसी भी हिस्सा लेंगी।
नासा ने इस पूरे प्रोजेक्ट को तीन चरणों में बांटा है। पहला चरण अगले तीन साल तक चलेगा, जिसमें तकनीकों की टेस्टिंग और बेसिक तैयारी होगी। इसी दौरान चंद्रमा पर चलने वाले वाहन और जरूरी सिस्टम तैयार किए जाएंगे। नासा का लक्ष्य 2028 तक इंसानों को दोबारा चंद्रमा पर उतारना है।
दूसरे चरण में, जो 2029 से 2032 तक चलेगा, चंद्रमा पर स्थायी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाएगा। इसमें बिजली व्यवस्था, संचार नेटवर्क और रहने की सुविधाएं शामिल होंगी।
तीसरे चरण में नासा चंद्रमा पर लगातार मानव मौजूदगी बनाए रखने की तैयारी करेगा। यानी वहां नियमित तौर पर अंतरिक्ष यात्री भेजे जाएंगे और लगातार वैज्ञानिक गतिविधियां चलती रहेंगी।
नासा के अधिकारियों का कहना है कि एक दिन ऐसा आएगा जब इंसान चंद्रमा पर स्थायी रूप से रहेगा। यह मिशन सिर्फ अंतरिक्ष की खोज नहीं बल्कि भविष्य में दूसरे ग्रहों पर इंसानी बस्तियां बसाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। (पीटीआई के इनपुट के साथ)
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अंतरिक्ष हमेशा से इंसान के लिए जिज्ञासा का केंद्र रहा है। इसके रहस्यों का पता लगाने के लिए अब तक तमाम प्रयास हुए हैं, लेकिन तकनीकी उन्नति के बावजूद आज भी इसकी राह बेहद कठिन है। अगर ऐसा न होता, तो वर्ष 1969 में चांद पर मानव भेजने के बाद अमेरिकी अंतरिक्ष एजंसी नासा को अपना अगला चंद्र मिशन भेजने में साढ़े पांच दशक का वक्त नहीं लगता। अभी भी जिस आर्टेमिस-2 नामक चंद्र अभियान के तहत चार अंतरिक्ष यात्री गए थे, वे चंद्रमा पर उतरने के बजाय उसकी परिक्रमा ही कर पाए हैं। मगर इसे भी एक बड़ी कामयाबी माना जा रहा है, क्योंकि इससे आर्टेमिस के अगले चरणों में वर्ष 2030 तक चंद्रमा पर इंसान को फिर से उतारने की नासा की योजनाओं को पंख लग सकते हैं। मगर क्या चांद पर इंसान को एक बार फिर भेजना जरूरी है? उस चांद पर, जिसके करीब नब्बे फीसदी हिस्से को दूरबीनों, अंतरिक्षयानों और भारत-अमेरिका समेत कुछ देशों के चंद्र अभियानों के जरिए खंगाला जा चुका है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
