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रोहिंग्या मुस्लिमों की आपबीती: सेना ने मां-बाप को मार दी गोली, बिलखते बच्चों को नदी में फेंका

लाखों रोहिंग्या मुस्लिमों ने म्यांमार छोड़कर बांग्लादेश में शिविरों में शरण ली है।

बुजुर्ग महिला को गोद में उठाकर लाता एक रोहिंग्या मुस्लिम युवक।(Photo Source: REUTERS)

म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिमों की दिक्कतें कम होती नजर नहीं आ रही हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक सैंकड़ों लोगों को मार दिया गया और लाखों लोग म्यांमार छोड़कर बांग्लादेश आ गए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक रोहिंग्या मुस्लिमों के नरसंहार का आरोप म्यांमार के सैनिकों पर है। शिविरों में रह रहे रोहिंग्या मुस्लिमों का कहना है कि सेना के जवानों ने गांवों के गांव फूंक दिए हैं। लोगों को गोलियां मार रहे हैं और सबूत मिटाने के लिए स्थानीय बौद्ध लोगों के साथ मिलकर मारे गए लोगों के शवों को जला रहे हैं।

अंग्रेजी अखबार गार्डियन ने शिविरों में रह रहे रोहिंग्या मुस्लिमों से उनकी आपबीती जानी। जाहिर अहमद नाम के शरणार्थी ने अखबार को इंटरव्यू में बताया कि सेना के जवानों ने हमारे गांव के पास की एक नदी के किनारे पर भाग रहे लोगों को रोक लिया। वहां पर कुछ लोगों को तो मौके पर ही गोली मार दी और कुछ लोग जो भागने की कोशिश कर रहे थे, उन्हें पानी में डुबो दिया गया। जाहिर अहमद नदी के दूसरे किनारे पर जंगल में छुपा हुआ था और अपने परिवार के सदस्यों को खत्म होता देख रहा था। अहमद का कहना है कि सेना के जवान बड़े लोगों को गोली मार रहे थे और बच्चों को नदी में फेंक रहे थे। इन बच्चों में उनकी छह महीने की बेटी भी शामिल थी।

शिविरों में रह रहे हर रोहिंग्या मुस्लिम के पास अपने बचकर आने, परिवार को खोने और खूनखराबे की एक कहानी है। उनका कहना है कि सुरक्षाबल के जवान रोहिंग्या मुस्लिमों को गोलियों से भून रहे हैं। उसके बाद उन्हें इकट्ठा करके एक जगह ही दफान दिया जा रहा है। कुछ लोग जंगल में तीन-तीन दिन लगातार यात्रा करके म्यांमार की सीमा पार करके बांग्लादेश पहुंचे हैं।

ऐसे ही पेटम अली का कहना है कि हमले से एक दिन पहले सेना से बचने के लिए लोग नदी पार करके करके दूसरी तरफ आ गए। इस दौरान करीब 10 लोगों की मौत नदी में ही हो गई। उनका कहना है कि उन्होंने नदी के पार से अपने गांव को जलते हुए देखा है। अली ने बताया, ‘मैं गांव में उत्तरी दिशा में रहता था और सेना के जवान नदी पार करके आ गए थे। मैं मेरे परिवार को छोड़कर जंगल की ओर आया ताकि गांव की ओर आ रहे जवानों को देख सकूं। हमने सुबह आठ बजे तक इंतजार किया और देखा कि वह गांव में घुस रहे हैं। मैं मेरे परिवार को लेने के लिए वापस आया। लेकिन हम लोग जल्दी में थे और मेरी बुजुर्ग दादी चल नहीं पा रही थी। जंगल से हम लोगों ने अपने घरों को जलते हुए देखा। जब जवान वहां से चले गए तो मैं गांव में वापस गया। गांव में मैंने देखा कि कई लोगों को गोली मार दी गई। मेरी दादी की भी गोली मारकर हत्या कर दी गई।’

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