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म्यांमा के सैन्य शासन ने इंटरनेट पर पाबंदी बढ़ाई, सैटेलाइट टीवी डिशों को किया गया जब्त

भारत में उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि जम्मू में हिरासत में लिये गये रोहिंग्याओं को अधिकारियों द्वारा इस तरह के निर्वासन के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन किये बगैर म्यांमा प्रर्त्यिपत नहीं किया जायेगा।

Author Edited By Sanjay Dubey यांगून | Updated: April 9, 2021 12:07 AM
myanmar, army, civilianफ़रवरी में शुरू हुए सेना विरोधी प्रदर्शनों में अबतक करीब 400 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। (फोटो – एपी)

म्यांमा के सैन्य शासन में सूचना पर बंदिशें बृहस्पतिवार को और बढ़ गयीं तथा कई नेटवर्कों पर फाइबर ब्रॉडबैंड सेवा मिल नहीं पा रही है। कुछ इलाकों में अधिकारियों ने अंतरराष्ट्रीय समाचार प्रसारण की सुविधा पाने के लिए इस्तेमाल सैटेलाइट डिशों को भी जब्त करना शुरू कर दिया है।

म्यांमा में एक फरवरी को हुए सैन्य तख्तापलट के खिलाफ प्रदर्शन बृहस्पतिवार को भी जारी रहे जिनमें एक दिन पहले ही सुरक्षा बलों ने 11 लोगों को मार दिया था। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि कम से कम दो सेवा प्रदाताओं एमबीटी तथा इन्फाइनाइट नेटवर्कों के लिए इंटरनेट सेवाओं में अवरोध क्या अस्थायी है। एमबीटी ने कहा कि यांगून तथा मांडले के बीच लाइन टूटने की वजह से उसकी सेवा बाधित हुई है। ये दोनों देश के दो सबसे बड़े शहर हैं। हालांकि, इंटरनेट उपयोगकर्ता पिछले सप्ताह सेवाओं में इस व्यापक अवरोध के लिए शिकायत कर रहे हैं। सैन्य जुंटा ने तख्ता पलट के बाद से इंटरनेट सेवाओं को अवरुद्ध करना शुरू कर दिया था। सूचना के स्रोत के तौर पर सैटेलाइट टीवी के उपयोग पर भी खतरा मंडरा रहा है।

उधर, उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को स्पष्ट किया कि जम्मू में हिरासत में लिये गये रोहिंग्याओं को अधिकारियों द्वारा इस तरह के निर्वासन के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन किये बगैर म्यांमा प्रर्त्यिपत नहीं किया जायेगा। प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने कहा कि यह सही है कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत गारंटी वाले अधिकार उन सभी व्यक्तियों के लिए उपलब्ध हैं, जो नागरिक हो सकते हैं या नहीं हो सकते हैं लेकिन निर्वासित होने का अधिकार नहीं है।

अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता से संबंधित है जबकि अनुच्छेद 21 जीवन की सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित है। पीठ में न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी रामसुब्रमण्यन भी शामिल थे। पीठ ने उस याचिका पर यह आदेश पारित किया जिसमें जम्मू में हिरासत में लिए गए रोहिंग्या शरणार्थियों को तुरंत रिहा करने और उन्हें म्यांमा प्रर्त्यिपत करने से रोकने के लिए केंद्र को निर्देश देने के लिए अनुरोध किया गया था।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इस मामले में केन्द्र के जवाब में दो गंभीर आरोप लगाए गए हैं जो आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा है तथा एजेंट और दलाल भूमि सीमाओं की छिद्रपूर्ण प्रकृति के कारण अवैध प्रवासियों के लिए भारत में एक सुरक्षित मार्ग प्रदान कर रहे हैं।
पीठ ने केंद्र की इस दलील पर गौर किया कि असम से रोहिंग्याओं के निर्वासन को चुनौती देने वाले इसी तरह के आवेदन को शीर्ष अदालत ने अक्टूबर 2018 में खारिज कर दिया था।

पीठ ने अपने आदेश में कहा, ‘‘यह स्पष्ट किया जाता है कि जम्मू में रोहिग्याओं को इस तरह के प्रत्यर्पण के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन किये बगैर प्रर्त्यिपत नहीं किया जायेगा।’’ पीठ ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता म्यांमा के रोंिहग्या शरणार्थी हैं और उन्हें शरणार्थी शिविर में रखा गया है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं, जो रोहिंग्या शरणार्थी हैं, की तरफ से पेश वकील प्रशांत भूषण ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के हालिया फैसले का उल्लेख किया था और कहा था कि उसने म्यांमा में रोहिंग्याओं के नरसंहार पर ध्यान दिया है और यदि उन्हें निर्वासित किया जाता है तो इन शरणार्थियों का जीवन गंभीर खतरे में है।

भूषण ने कहा था कि रोहिंग्या बच्चों की हत्याएं कर दी जाती है और उन्हें यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है तथा म्यांमा की सेना अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों का पालन करने में नाकाम रही है। केंद्र ने भी दलील दी थी कि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के निर्णय के मामले में दायर आवेदन की कोई प्रासंगिकता नहीं है। केंद्र ने इससे पहले याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि भारत अवैध प्रवासियों की ‘‘राजधानी’’ नहीं बन सकता।

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