म्यांमार: पत्रकारों को सजा पर भड़के अमेरिकी उपराष्ट्रपति, जल्दी रिहा करने को कहा

अमेरिकी उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने म्यांमार से उन दो पत्रकारों को जल्दी से जल्दी रिहा करने को कहा है जिनको देश की खुफिया जानकारियां रखने का दोषी ठहराकर सात साल की सजा सुनाई गई है।

अमेरिकी उपराष्ट्रपति माइक पेंस (Source: AP Photo/Jim Mone)

अमेरिकी उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने म्यांमार से उन दो पत्रकारों को जल्दी से जल्दी रिहा करने को कहा है जिनको देश की खुफिया जानकारियां रखने का दोषी ठहराकर सात साल की सजा सुनाई गई है। इन पत्रकारों पर आरोप है कि रोहिंग्या मुसलमानों के नरसंहार की रिपोर्टिंग के दौरान इन्होंने गोपनीयता के कानून का उल्लंघन किया और स्टेट सीक्रेट्स हासिल कर लिए। वा लोन और क्याव सो ओ रॉयटर्स न्यूज एजेंसी के पत्रकार हैं जिनको सोमवार को कोर्ट ने सात साल की सजा सुनाई। सजा सुनाने के लिए कोर्ट ने जो प्रक्रिया अपनाई उसकी दुनियाभर में आलोचना हो रही है और सजा को अनुचित बताया जा रहा है।

इन दोनों पत्रकारों ने म्यांमार की सेना के उस हिंसक कार्रवाई की रिपोर्टिंग की थी जिसकी वजह से करीब 7 लाख रोहिंग्या देश छोड़कर बांग्लादेश भाग गए। रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ इस अभियान में सेना के मानवाधिकार उल्लंघन करने की दुनियाभर में भर्त्सना की गई लेकिन म्यांमार ऐसी किसी घटना से इनकार करता रहा है।

मंगलवार को अमेरिकी उपराष्ट्रपति पेंस ने ट्वीट करते हुए कहा कि दोनों पत्रकारों की इस बात के लिए सराहना करनी चाहिए, न कि उसे कैद में डाल देना चाहिए कि उन्होंने मानवाधिकार उल्लंघन और नरसंहार का खुलासा करने का काम किया। इसके बाद ट्वीट करते हुए पेंस ने कहा कि धर्म की स्वतंत्रता और प्रेस की स्वतंत्रता मजबूत लोकतंत्र के लिए आवश्यक हैं। माइक पेंस ने लिखा कि रोहिंग्या लोगों पर अत्याचार की रिपोर्टिंग करनेवाले दो पत्रकारों को सात साल की सजा मिलने की खबर पाकर वो बहुत दुखी हुए। म्यांमार की सेना से इस सजा को पलटने और दोनों पत्रकारों को रिहा करने को कहा गया है।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंतोनियो गुटेरेस ने भी म्यांमार की सरकार से इस फैसले पर पुनर्विचार करने को कहा है। महासचिव ने कहा कि मानवाधिकार उल्लंघन की रिपोर्टिंग करनेवाले उन पत्रकारों के खिलाफ न्यायिक कार्रवाई सही नहीं है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

रोहिंग्या मुसलमानों पर हुए जुल्म और दोनों पत्रकारों को हुई सजा के मामले ने दुनियाभर का ध्यान इस तरफ खींचा है कि किस तरह से म्यांमार में 2016 में आंग सान सू की सरकार बनने के बाद भी वहां लोकतांत्रिक सुधार की प्रकिया रुकी पड़ी है। अभी भी म्यांमार सरकार के अधिकांश मंत्रालयों पर सेना का नियंत्रण है। सू की ने जब सरकार बनाया था तब म्यांमार के पूरी तरह लोकतंत्र बनने की उम्मीदें लोगों में जाग गई थीं लेकिन रोहिंग्या संकट पर उनके रवैये ने उनके प्रशंसकों को निराश किया है।

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