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हिन्द महासागर में तापमान बढ़ने से भारत के हिस्सों में कमजोर हुआ मानसून

पिछली एक शताब्दी के दौरान हिन्द महासागर में लगातार तापमान बढ़ने से गर्मियों के दौरान मानसून की वर्षा में उल्लेखनीय गिरावट आई है।

Author June 16, 2015 10:00 PM
पिछली एक शताब्दी के दौरान हिन्द महासागर में लगातार तापमान बढ़ने से गर्मियों के दौरान मानसून की वर्षा में उल्लेखनीय गिरावट आई है। इसका भारत के मध्य-पूर्व और उत्तरी क्षेत्र पर ज्यादा असर पड़ा है। एक भारतीय वैज्ञानिक द्वारा किये गये ताजा अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। (फ़ोटो-पीटीआई)

पिछली एक शताब्दी के दौरान हिन्द महासागर में लगातार तापमान बढ़ने से गर्मियों के दौरान मानसून की वर्षा में उल्लेखनीय गिरावट आई है। इसका भारत के मध्य-पूर्व और उत्तरी क्षेत्र पर ज्यादा असर पड़ा है। एक भारतीय वैज्ञानिक द्वारा किये गये ताजा अध्ययन में यह खुलासा हुआ है।

भारतीय उष्णकटबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान, पुणे के डा. रॉक्सी मैथ्यू कौल के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की एक टीम ने पाया कि 1901 से 2012 के दौरान गर्मियों की मानसून वर्षा का दक्षिण एशियाई क्षेत्र के कुछ हिस्सों में प्रदर्शन कमजोर पड़ा है।

वर्षा में कमी का रूझान गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन और हिमालय के मैदानी इलाकों के साथ साथ उत्तर और मध्य-पूर्व भारत के हिस्सों में ज्यादा दिखा है।

आज प्रकाशित इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने कहा है कि भारत के मध्य-पूर्वी हिस्सों में गर्मी में होने वाली बारिश में पिछली एक शताब्दी में करीब 10 से 20 प्रतिशत तक कमी आई है।

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शोधकर्ताओं ने जलवायु नमूने का इस्तेमाल यह दर्शाने के लिए किया कि वर्षा में कमी का हिन्द महासागर के तेजी से गर्म होते जाने से सीधा जुड़ाव है। यह विशेष तौर पर उसके पश्चिमी हिस्से में पिछली एक शताब्दी के दौरान तापमान बढ़ने को लेकर किया गया है।

शोधकर्ताओं के अनुसार हिन्द महासागर के साथ साथ भारतीय उपमहाद्वीप के भी गर्म होने की भूमि-सागर ताप विषमता को कमजोर करने में अहम् भूमिका रही है। यह दक्षिण एशियाई मानसून को आगे बढ़ाने में अहम् भूमिका निभाता है।

मौजूदा वैश्विक उष्णता :ग्लोबल वार्मिंग: के मौजूदा परिदृश्य में मानसून बढ़ाने वाले कारक मजबूत होना चाहिये, ताकि वर्षा अधिक हो। वर्षा बढ़ाने में सबसे बड़ी भूमिका भूमि और समुद्र के बीच तापमान का अलग होना है, इससे मानसून उपमहाद्वीप की तरफ मुड़ता है।

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