अमेरिका-इजरायल के ईरान पर हमले के बाद ईरान ने इजरायल सहित खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाना शुरू किया। ईरान की इस जवाबी कार्रवाई से लगभग पूरा पश्चिम एशिया जंग की जद में आ गया। इनमें से खाड़ी क्षेत्र के दो प्रभावशाली देश कतर और सऊदी अरब के बीच कई बार राजनीतिक, कूटनीतिक और रणनीतिक टकराव रहा है। हालांकि अब उनके संबंध पहले से बेहतर हो चुके हैं। वहीं, भारत ने संतुलित विदेश नीति अपनाते हुए दोनों देशों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखे हैं। आइए जानते हैं दोनों देशों के बीच टकराव की वजह क्या है और भारत के साथ इनके संबंध कैसे हैं।
खाड़ी क्षेत्र में सऊदी अरब सबसे बड़ा और शक्तिशाली देश है इसलिए वह अक्सर क्षेत्रीय नेतृत्व चाहता है। वहीं, कतर ने शुरू से ही स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की कोशिश की जिससे दोनों देशों के बीच तनाव पैदा हुआ। 1990 के दशक में कतर ने अलग कूटनीतिक रास्ता, स्वतंत्र मीडिया, विभिन्न राजनीतिक समूहों से संपर्क जैसी नीतियां अपनाईं जो सऊदी अरब को पसंद नहीं थीं।
कतर के सरकारी फंड से चलने वाला मीडिया नेटवर्क Al Jazeera क्षेत्रीय राजनीति में बहुत प्रभावशाली है। सऊदी अरब और उसके सहयोगियों का आरोप रहा कि यह चैनल उनके खिलाफ आलोचनात्मक रिपोर्टिंग करता है और अरब सरकारों के विरोधी समूहों को मंच देता है। इस कारण मीडिया भी दोनों देशों के बीच विवाद का बड़ा कारण बना।
कतर के ईरान के साथ संबंध
कतर पर आरोप लगाया गया कि उसने मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे इस्लामवादी राजनीतिक संगठन को समर्थन दिया। सऊदी अरब और कई अरब देशों ने इस संगठन को खतरा माना। पर, कतर ने इसे पूरी तरह आतंकवादी संगठन मानने से इनकार कर दिया। इस मुद्दे ने भी दोनों देशों के बीच राजनीतिक दूरी बढ़ाई।
खाड़ी क्षेत्र की राजनीति में ईरान एक बड़ा फैक्टर है। सऊदी अरब ईरान को अपना मुख्य क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी मानता है लेकिन कतर ने ईरान के साथ अपेक्षाकृत संतुलित संबंध बनाए रखे हैं। इसके पीछे एक बड़ा कारण यह है कि दोनों देश South Pars/North Dome गैस फील्ड साझा करते हैं जो दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस भंडार है। इस वजह से कतर पूरी तरह ईरान से दूरी नहीं बना सकता। फारस की खाड़ी में ईरान और कतर के बीच समुद्री सीमा पर स्थित इस गैस फील्ड को ईरान के साइड में साउथ पार्स के नाम से जाना जाता है जबकि कतरी जलक्षेत्र में इसे नॉर्थ डोम कहा जाता है। इस क्षेत्र में प्राकृतिक गैस का विशाल भंडार है।
साल 2017 का खाड़ी संकट
2017 का खाड़ी संकट पश्चिम एशिया की राजनीति का एक बड़ा कूटनीतिक टकराव था, जब कई अरब देशों ने कतर को लगभग राजनीतिक और आर्थिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिश की। यह संकट जून 2017 से जनवरी 2021 तक चला। इस संकट की शुरुआत 5 जून 2017 को हुई जब सऊदी अरब, यूएई, बहरीन और मिस्त्र ने अचानक कतर से कूटनीतिक संबंध तोड़ दिए। इन देशों ने कतर पर आरोप लगाए कि वह आतंकवादी संगठनों को समर्थन देता है, क्षेत्र में अस्थिरता फैला रहा है, ईरान के बहुत करीब है और कट्टरपंथी संगठनों और मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे समूहों को समर्थन देता है। हालांकि, कतर ने इन सभी आरोपों को खारिज कर दिया।
इसके चलते इन चार देशों ने कतर पर कड़ा ब्लॉकेड लगा दिया। इन देशों ने कतर के विमानों के लिए अपना हवाई क्षेत्र बंद कर दिया। कई बंदरगाहों पर कतर के जहाजों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई। इसके साथ ही सऊदी अरब, यूएई, बहरीन और मिस्त्र ने कतर के साथ राजनयिक संबंध समाप्त कर दिए गए। कतर के नागरिकों को कई देशों से निकलने के लिए कहा। सऊदी अरब ने कतर के साथ अपनी एकमात्र स्थलीय सीमा बंद कर दी। यह सीमा कतर के लिए खाद्य और जरूरी सामान की मुख्य आपूर्ति लाइन थी।
कतर ने इस संकट से निपटने के लिए क्या किया?
वहीं, कतर ने इस संकट से निपटने के लिए नए सहयोगी बनाए। कतर ने व्यापार और सहयोग बढ़ाया। तुर्की और ईरान ने कतर को खाद्य और लॉजिस्टिक सपोर्ट दिया। कतर ने कृषि, खाद्य उत्पादन और डेयरी सेक्टर में तेजी से निवेश किया। कतर दुनिया के सबसे बड़े LNG निर्यातकों में से एक है, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था स्थिर रही। जनवरी 2021 में Al-Ula में खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) की बैठक हुई। इसमें समझौता हुआ कि कतर के खिलाफ ब्लॉकेड समाप्त किया जाए, सीमाएं और हवाई मार्ग फिर खुले और देशों के बीच कूटनीतिक संबंध बहाल किए जाएं।
भारत ने इस संकट में तटस्थ नीति अपनाई। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी से आता है। लगभग 80 लाख भारतीय प्रवासी खाड़ी देशों में रहते हैं और भारत के व्यापारिक संबंध सभी देशों से हैं।
भारत और कतर के संबंध
भारत और कतर के रिश्ते मुख्यतः ऊर्जा, व्यापार और प्रवासी भारतीयों पर आधारित हैं। कतर भारत के लिए एलएनजी (Liquefied Natural Gas) का सबसे बड़ा सप्लायर रहा है। भारत की गैस जरूरतों का बड़ा हिस्सा कतर से आता है। भारत की कंपनी Petronet LNG ने कतर की QatarEnergy के साथ लंबे समय का गैस आयात समझौता किया है। साल 2024 में दोनों देशों ने एलएनजी सप्लाई का समझौता साल 2048 तक बढ़ा दिया।
भारत और कतर के बीच द्विपक्षीय व्यापार है। भारत कतर को मशीनरी, खाद्य पदार्थ, स्टील और रसायन निर्यात करता है। वहीं, कतर से भारत मुख्यतः LNG और पेट्रोकेमिकल उत्पाद आयात करता है। कतर में लगभग 7–8 लाख भारतीय रहते हैं जो निर्माण, इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य और सेवा क्षेत्र में काम करते हैं। भारतीय समुदाय कतर की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कतर की Qatar Investment Authority ने भारत के कई सेक्टरों में निवेश किया है। इसमें इंफ्रास्ट्रक्चर, टेक्नोलॉजी और स्टार्टअप सेक्टर शामिल हैं। कतर भारत के लिए LNG सप्लाई का स्थिर स्रोत है।
भारत और सऊदी अरब के संबंध
भारत और सऊदी अरब के रिश्ते ऊर्जा, व्यापार, निवेश और रणनीतिक सहयोग पर आधारित हैं। सऊदी अरब भारत के सबसे बड़े कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में से एक है। भारत अपने तेल आयात का बड़ा हिस्सा सऊदी अरब से लेता है। तेल के अलावा पेट्रोकेमिकल सेक्टर में भी सहयोग बढ़ रहा है। भारत और सऊदी अरब के बीच व्यापार लगभग 50 अरब डॉलर से अधिक का है। वहीं, भारत सऊदी अरब को फूड प्रोडक्ट, मशीनरी, केमिकल और टेक्नोलॉजी का निर्यात करता है।
सऊदी अरब में लगभग 25 लाख भारतीय रहते हैं। यह दुनिया में भारतीय प्रवासियों की सबसे बड़ी आबादी में से एक है। भारतीय कामगार निर्माण, तेल उद्योग, स्वास्थ्य और सेवा क्षेत्रों में कार्यरत हैं। सऊदी अरब का Vision 2030 कार्यक्रम भारत के लिए निवेश के कई अवसर पैदा करता है। सऊदी कंपनियां भारत में पेट्रोकेमिकल, इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा क्षेत्रों में निवेश कर रही हैं। भारत और सऊदी अरब के बीच आतंकवाद विरोधी सहयोग, खुफिया जानकारी, समुद्री सुरक्षा सहयोग जैसे क्षेत्र भी महत्वपूर्ण हैं।
भारत की संतुलन नीति
कतर और सऊदी अरब आपस में प्रतिद्वंद्वी रहे हैं लेकिन भारत ने दोनों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखे हैं। भारत ऐसा इसलिए करता है क्योंकि वह कतर से गैस और सऊदी से तेल लेता है। दोनों देशों में बड़ी संख्या में भारतीय आबादी रहती है। भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है संतुलन नीति। इसका मतलब है कि भारत किसी एक वैश्विक गुट या शक्ति के साथ पूरी तरह नहीं जुड़ता बल्कि विभिन्न प्रतिद्वंद्वी देशों के साथ भी अपने हितों के आधार पर संबंध बनाए रखता है।
सऊदी अरब–ईरान की दुश्मनी क्या है?
मध्य पूर्व की राजनीति में सऊदी अरब और ईरान के बीच प्रतिस्पर्धा को अक्सर “मिडिल ईस्ट की कोल्ड वॉर” कहा जाता है। दोनों देश क्षेत्र में राजनीतिक, धार्मिक और सामरिक प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करते हैं, जिससे कई दशकों से तनाव बना हुआ है। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें
