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जमावड़ा लीमा में, निगाहें पेरिस पर

ओम थानवी जलवायु पतन पर राष्ट्रसंघ के महासम्मेलन में इस बार उपस्थिति शायद सबसे कम साबित हो। उच्च स्तर की चर्चाओं का दौर शुरू हो जाने के बावजूद महज दस हजार संभागियों की शिरकत नजर आती है। पांच साल पहले कोपेनहेगन में हुए ऐसे ही आयोजन में यह संख्या पैंतीस हजार पहुंच गई थी। तब […]
Author December 8, 2014 08:24 am
लीमा (पेरू) में कॉप-20 का सम्मेलन स्थल। (फोटो: रियूटर्स)

ओम थानवी

जलवायु पतन पर राष्ट्रसंघ के महासम्मेलन में इस बार उपस्थिति शायद सबसे कम साबित हो। उच्च स्तर की चर्चाओं का दौर शुरू हो जाने के बावजूद महज दस हजार संभागियों की शिरकत नजर आती है।

पांच साल पहले कोपेनहेगन में हुए ऐसे ही आयोजन में यह संख्या पैंतीस हजार पहुंच गई थी। तब 194 देशों के अधिकांश शासक वहां पहुंचे थे। बराक ओबामा और मनमोहन सिंह भी।

इस दफा ओबामा-पुतिन छोड़िए, विदेश यात्रा के हर अवसर को अंजाम देने वाले नरेंद्र मोदी भी इस जमावड़े से आंख चुरा रहे हैं। पंजीकृत हुए संभागियों में राष्ट्रसंघ प्रतिनिधि, गैर-सरकारी संगठन, नौकरशाह और मंत्री आदि शामिल हैं। मगर चुनिंदा। जबकि पेरू की राजधानी दक्षिणी अमेरिका का सुंदर शहर है, और दुनिया के नए सात आश्चर्यों में एक माचू-पिच्चू के शिखर और इंका सभ्यता के खंडहर यहीं पर हैं!

पर्यावरण की रक्षा के लिए धरती के बढ़ते तापमान को लेकर धीमे सही, लेकिन सामूहिक रूप से फिक्रमंद हुए देशों की यह बेरुखी क्या कोई संदेश देती है?
दरअसल, कमोबेश सभी देशों की निगाहें अगले साल पेरिस में होने वाले महासम्मेलन में लगी हैं जहां जलवायु नियंत्रण की जवाबदेही, उपायों और लक्ष्यों पर नया समझौता होगा। सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले देशों का सिरमौर अमेरिका तक पेरिस समझौते में दिलचस्पी ले रहा है। हालांकि उसने अपनी अपेक्षाओं की एक लंबी फेहरिस्त भी जारी कर दी है।

सब जानते हैं, अमेरिका क्योतो करार में शामिल नहीं हुआ था। बाद में कनाडा, जापान, आॅस्ट्रेलिया जैसे देशों ने भी करार से अपना हाथ खींच लिया। क्योतो में संसार के 187 (अब 194) पक्षकारों के बीच वह करार 1997 में हुआ था, जो कछुए की गति से 2005 में लागू हुआ।

क्योतो करार में विकसित देशों को बेतहाशा प्रदूषण के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार मानते हुए उन पर कानूनी बाध्यता तय की गई कि वे निश्चित मात्रा में अब प्रदूषण घटाएंगे। एकजुट विश्व के सामने सैंतीस औद्योगिक देशों ने मान लिया था कि कार्बन डाइआॅक्साइड, मीथेन, नाइट्रस आॅक्साइड जैसी घातक ग्रीनहाउस गैसों और दो अन्य गैस समूहों को 1990 के स्तर पर सवा पांच प्रतिशत घटा देंगे। इसके लिए लक्ष्य निर्धारित हुए, प्रगति का हिसाब लेने और विफल रहने पर जुर्माने का प्रावधान था। इस पर भी सहमति थी कि विकसित देश जरूरतमंद देशों को प्रदूषण कम करने के लिए आर्थिक और तकनीकी मदद देंगे। लगातार विवादों में घिरे रहे करार की अवधि दो साल पहले खत्म हो चुकी है।

लेकिन एक नए करार की भूमि क्या सघन चर्चाओं, मुद्दों के विस्तार और संकल्पों के इजहार से नहीं तैयार होनी चाहिए? जब विकासशील देश खुद विकसित देशों की जमात में बैठने के लिए उतावले हैं, ‘विकास’ के नाम पर कॉरपोरेट जगत के मुनाफे के लिए हवा-पानी और पहाड़ों-जंगलों की बलि दे रहे हैं, नतीजतन गरीबी और अमीरी की खाई बढ़ रही है, उस वक्त कार्बन उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य तय कर विकसित और गैर-विकसित देशों के बीच भरपाई (आॅफसेटिंग) का कार्बन ट्रेडिंग फार्मूला तय करना क्या काफी है?

वैकल्पिक ऊर्जा की बात अब तक एक नारे की तरह ही ज्यादा उछाली जाती रही है। कोयले से बिजली का उत्पादन कार्बन उत्सर्जन का बड़ा स्रोत माना जाता है। लेकिन सरकारें खुद कोयले की खानों को इस काम के लिए निजी कंपनियों को पट्टे पर देती आई हैं, भारत इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। पिछले साल राष्ट्रसंघ का सम्मलेन जब वारसा (पोलैंड) में हुआ तब उसी देश के एक मंत्री ने कहा था कि 2050 तक हमारी ऊर्जा का स्रोत तो कोयला ही रहेगा! खयाल रहे, यूरोप में कोयले का सबसे ज्यादा इस्तेमाल पोलैंड ही करता है।

और भी कई क्षेत्र हैं जिन्हें इस मंच पर पर्याप्त महत्त्व नहीं मिलता है। किसानों और खेती की बात या गरीबी, रोजगार, भुखमरी और कुपोषण की बात लगता है उस वर्ग के लिए गुनाह है जो यहां फैशन परेड जैसे कपड़ों और चाल-चलन में दिखाई पड़ता है। सच्चाई यह है कि उद्योग और व्यवसाय सब पर भारी साबित हो रहे हैं। नौकरशाह और मंत्री अपनी सरकारों की नीति- वह चाहे कितनी ही विनाशपूर्ण हो – की वकालत करते हैं, कुछ देश आर्थिक मदद की मांग और बाकी उसके तिरस्कार में मशगूल रहते हैं।

भला हो राजेंद्र कुमार पचौरी का जिन्होंने कोपेनहेगन में राष्ट्रसंघ की अंतरसरकारी समिति (आइपीसीसी) के अध्यक्ष के नाते कहा था कि हफ्ते में एक दफा भी शाकाहारी हो जाएं तो मीथेन उत्सर्जन से बहुत बचा जा सकता है। ग्रीनहाउस गैसों में कार्बन डाइआॅक्साइड से मीथेन सत्तर गुना ज्यादा बुरी है, जो बूचड़खानों की ज्यादा देन है। लेकिन यहां लीमा में पर्यावरण की फिक्र के सबसे बड़े आयोजन में मैं शाकाहारी खाद्य तलाश कर हताश हो चुका हूं। कम से कम यहां से तो जीव-हत्या पर संयम का संदेश हर बार निकलना चाहिए।

बहरहाल, संभागी देश पार्टी (पक्षकार) कहलाते हैं इसलिए यह कांफ्रेंस-आॅफ-पार्टीज (कॉप) है। जाहिर है अपना पक्ष सब रख रहे हैं। लेकिन जलवायु पतन की जिम्मेदारी की ओर ऊंगली उठाने के पीछे बहुत राजनीति है। चीन, जो पहले भारत के साथ खड़ा था, अब अमेरिका के साथ खड़ा है। भले ही जॉर्ज बुश ने क्योतो करार से दूरी बनाई, ओबामा न सिर्फ कोपेनहेगन आए, पेरिस समझौते में भी उनका प्रशासन रुचि ले रहा है। पर इसमें ईमानदारी कितनी है?
जैसा कि थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क (मलेशिया) की मीना रमन ने शनिवार को कहा, अमेरिका तो क्योतो के नाम तक से खौफ खाता है। क्या वह सचमुच कभी किसी नए करार में शामिल होगा? या बगैर प्रतिबद्धता के महज बीच में आ-आ कर विकासशील देशों में फूट डालेगा और अंतत: नए करार की संभावना ही हमेशा के लिए दफना देगा?

 

 

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