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लखवी मामले में चीन का अड़ंगा: नरेंद्र मोदी ने चीनी नेतृत्व के समक्ष जताई चिंता

चीन ने मुंबई हमले के मास्टरमाइंड और लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर जकीउर रहमान लखवी की रिहाई को लेकर पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई की भारत की मांग को वीटो कर दिया है।

Author June 24, 2015 8:50 AM
प्रधानमंत्री ने चीनी नेतृत्व के समक्ष जताई चिंता

चीन ने मुंबई हमले के मास्टरमाइंड और लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर जकीउर रहमान लखवी की रिहाई को लेकर पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई की भारत की मांग को वीटो कर दिया है। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार प्रतिबंधों से संबंधित संयुक्त राष्ट्र की समिति ने भारत के आग्रह पर यहां बैठक की जिसमें मुंबई हमले के मामले में लखवी की रिहाई को लेकर पाकिस्तान से स्पष्टीकरण मांगा जाना था, लेकिन चीन के प्रतिनिधियों ने इस आधार पर इस कदम को रोक दिया कि भारत के पास पर्याप्त सूचना नहीं है।

समिति के मौजूदा प्रमुख जिम मैकले को लिखे पत्र में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि अशोक मुखर्जी ने पिछले महीने कहा था कि लखवी की जमानत पर रिहाई संयुक्त राष्ट्र के 1267 प्रस्ताव का उल्लंघन है। लखवी की रिहाई को लेकर अमेरिका, रूस, फ्रांस और जर्मनी ने चिंता जताते हुए उसकी फिर से गिरफ्तारी की मांग की थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मुद्दे पर चीनी नेतृत्व के साथ भारत की चिंता साझा की। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध समिति के सदस्यों के साथ द्विपक्षीय तौर पर यह मामला उठाया और चीन के मामले में यह ‘शीर्ष स्तर’ पर उठाया गया।

संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध समिति की एक बैठक में भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी क्योंकि उसने संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का उल्लंघन करते हुए मुंबई हमले के इस मास्टरमाइंड को रिहा कर दिया है, लेकिन चीन के प्रतिनिधि ने यह कहते हुए इस प्रस्ताव को रोक दिया कि भारत ने पर्याप्त सूचना मुहैया नहीं कराई है। सूत्रों ने बताया कि मोदी ने चीन नेतृत्व के साथ इस मसले पर बात की है। प्रतिबंध समिति के बाकी सभी सदस्य देशों ने भारत के रुख का समर्थन किया।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने कहा कि सरकार ने लखवी के मामले में संयुक्त राष्ट्र के 1257 प्रस्ताव के उल्लंघन के मुद्दे पर बात की। इस संबंध में हमारी चिंताओं को समिति के अध्यक्ष तक पहुंचा दिया गया है। हमने समिति के अन्य सदस्यों के साथ भी द्विपक्षीय रूप से इस पर बात की। चीन के मामले में इस मामले पर शीर्षस्थ स्तर पर बात की गई।

स्वरूप ने कहा कि 1267 समिति संयुक्त राष्ट्र चार्टर के चैप्टर 7 के अंतर्गत बनाई गई थी और इसके फैसले संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों पर बाध्यकारी हैं। संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध समिति के मौजूदा अध्यक्ष जिम मैकले को भेजे पत्र में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि अशोक मुखर्जी ने पिछले हफ्ते कहा कि लखवी की जमानत पर रिहाई संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव 1267 का उल्लंघन है।

यह समिति उन व्यक्तियों और संस्थाओं पर प्रतिबंधात्मक उपाय लागू करती है जो अल कायदा और लश्करे तैयबा जैसे अन्य आतंकी संगठनों से संबद्ध पाए जाते हैं। प्रतिबंध समिति में सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी और 10 गैर स्थायी सदस्य हैं।
यह पहला मौका नहीं है जब चीन ने आतंकवादियों के खिलाफ प्रतिबंधात्मक कार्रवाई करने के लिए रखे गए भारत के प्रस्ताव को पास नहीं होने दिया है।

इससे पहले उसने 2006 लश्कर ए तैयबा को आतंकवादी संगठन घोषित करने के प्रस्ताव को पास नहीं होने दिया था। अमेरिका ने 2001 में ही लश्कर को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था। अमेरिका ने जमात-उद -दावा और एक अन्य संगठन इदारा खिदमत ए खल्क को लश्कर का मुखौटा करार देते हुए इन पर भी पाबंदी लगा दी। पर 2005 तक पाकिस्तान व चीन के विरोध के कारण लश्कर को आतंकवादी संगठन नहीं घोषित किया जा सका। उस समय पाकिस्तान सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य भी था। लेकिन सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान का कार्यकाल खत्म होने के बाद भी चीन ने उसकी हिमायत का रुख अपनाते हुए कहा कि जमात उद दावा एक धर्मार्थ संस्था है जिसका लश्कर से कोई लेना देना नहीं है। मुंबई हमले के बाद ही चीन ने पाबंदी पर सहमति जताई।

दिसंबर, 2014 में भारत ने पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए संयुक्त राष्ट्र में तीन अलग-अलग प्रस्ताव रखे थे। चीन इन तीनों प्रस्तावों में रोड़े अटका रहा है। चीन ने हिजबुल मुजाहिदीन के सरगना सैयद सलाहुद्दीन के खिलाफ कार्रवाई के लिए पर्याप्त सूचनाएं नहीं होने का हवाला देते हुए इस साल अप्रैल में प्रस्ताव पर ‘टेक्निकल होल्ड’ लगा दिया। यह एक तरह का वीटो है।

चीन का कहना है कि हिजबुल के अल कायदा से संबंध होने के बारे में पर्याप्त सबूत नहीं हैं।

इसी तरह भारत ने हफीज सईद का नाम 1267 सूची (जिसके तहत किसी को आतंकवादी या आतंकवादी संगठन घोषित किया जाता है) में होने का हवाला देते हुए उसके पाकिस्तान में छुट्टा घूमने व रैलियां करने के खिलाफ निगरानी समिति के अध्यक्ष जेम्स मैकले को चिट्ठी लिखी और कार्रवाई करने का प्रस्ताव रखा। तब से समिति की दो बैठकें हो चुकी हैं पर चीन के दबाव में इस प्रस्ताव पर चर्चा तक नहीं हुई।

इसी तरह जैश के मसूद अजहर के खिलाफ पाबंदी में रोड़े अटकाने का मामला शीर्ष स्तर पर उठ चुका है। 2009 में तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने अपने चीनी समकक्ष दाई बिंग्गुओ के सामने इस मुद्दे को उठाया पर बिंग्गुओ ने फिर वही दलील दी की भारत ने उसके खिलाफ पर्याप्त सूचना नहीं मुहैया कराई है।

भारत में हमला करने वाले पाकिस्तानी आतंकी सरगनाओं के खिलाफ कार्रवाई में चीन के लगातार रोड़े अटकाने से भारत के सुरक्षा हलकों में खासी चिंता है जबकि चीन की कोशिश यह है कि पाकिस्तान को आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देश के बजाय आतंकवाद से पीड़ित देश के रूप में देखा जाना चाहिए।

चीन ने मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे से ऐन पहले प्रतिबंध समिति में भारत के दो आग्रहों को बाधित कर दिया था। प्रधानमंत्री मोदी के चीन दौरे में साझा बयान में सभी देशों से आतंकवाद को मदद बंद करने की अपील की गई थी। लेकिन यह महज कागजी बयान साबित हुआ। चीन अगर पाकिस्तान के खिलाफ किसी कदम को पसंद नहीं करता तो वह पहले तकनीकी रोक लगाता है और फिर उस कार्रवाई को बाधित कर देता है। प्रतिबंध समिति के प्रावधानों के अनुसार अगर कोई सदस्य तकनीकी रोक लगाता है तो मामले को फिर से नहीं लाया जा सकता।

भारत के लिए इस पूरे प्रकरण से सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की अहमियत एक बार फिर जाहिर हो गई है। संदेश साफ है कि अगर आप स्थायी सदस्य नहीं हैं तो आप कुछ नहीं कर सकते।

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