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पाक अदालत में भगत सिंह की बेगुनाही साबित करने की फरियाद

पाकिस्तान अदालत में एक याचिका दाखिल कर अनुरोध किया गया है कि ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह को फांसी दिए जाने के 83...
Author लाहौर | November 17, 2015 18:03 pm
ब्रिटिश शासन ने 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी दे दी थी।

पाकिस्तान की एक अदालत में एक याचिका दाखिल कर अनुरोध किया गया है कि ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह को फांसी दिए जाने के 83 साल बाद उनकी बेगुनाही साबित करने के लिए उनके खिलाफ दर्ज हत्या के मामले में एक पूर्ण पीठ जल्द सुनवाई करे। भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन के अध्यक्ष वकील इम्तियाज राशिद कुरैशी ने सोमवार को यहां उच्च न्यायालय में एक आवेदन दाखिल कर मामले में जल्द सुनवाई की गुहार लगाई। कुरैशी ने अपनी याचिका में कहा कि सिंह स्वतंत्रता सेनानी थे और उन्होंने अविभाजित भारत की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी थी। ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन पी सांडर्स की कथित हत्या के मामले में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था।

ब्रिटिश शासन ने 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी दे दी थी। उन पर औपनिवेशिक सरकार के खिलाफ साजिश रचने के आरोपों के तहत मुकदमा चला था। कुरैशी ने कहा कि सिंह को पहले आजीवन कैद की सजा सुनाई गई। लेकिन बाद में एक और झूठे गढ़े मामले में उन्हें मौत की सजा सुना दी गई। उन्होंने कहा कि भगत सिंह आज भी उपमहाद्वीप में मुसलमानों के लिए भी सम्मानित हैं और पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना ने उन्हें दो बार श्रद्धांजलि दी थी। कुरैशी ने कहा कि यह राष्ट्रीय महत्त्व का विषय है और एक पूर्ण पीठ को इस मामले में समाधान करना चाहिए। उन्होंने पुनर्विचार के सिद्धांतों का अनुसरण करते हुए सिंह की सजा रद्द करने की भी गुहार लगाई और कहा कि सरकार को भगत सिंह को सरकारी पुरस्कार से सम्मानित करना चाहिए।

लाहौर उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति शुजात अली खान ने मई, 2013 में मामले की पिछली सुनवाई की थी। तब उन्होंने इस मामले को एक बड़े पीठ के मुख्य न्यायाधीश को भेज दिया था। लाहौर पुलिस ने 1928 में सांडर्स की हत्या के मामले की मूल प्राथमिकी अदालत के आदेश पर पिछले साल याचिकाकर्ता को दी थी। मामले की प्राथमिकी में सिंह का नाम नहीं था, हालांकि उसके आधार पर उन्हें 1931 में महज 23 साल की उम्र में फांसी दे दी गई थी।

सिंह को फांसी दिए जाने के 83 साल बाद लाहौर पुलिस ने अदालत के आदेश पर अनारकली थाने के रिकॉर्ड खंगाले और प्राथमिकी खोजने में सफलता मिली, जिसमें सिंह का नाम नहीं था। मामले में भगत सिंह की बेगुनाही साबित करने की दिशा में यह बड़ी सफलता थी। उर्दू में लिखी प्राथमिकी 17 दिसंबर, 1928 को शाम 4:30 बजे अनारकली थाने में दो अज्ञात बंदूकधारियों के खिलाफ दर्ज की गई थी। मामला भारतीय दंड संहिता की धाराओं 302, और 109 के तहत दर्ज किया गया था। कुरैशी ने कहा कि सिंह के मामले को देख रहे न्यायाधिकरण के विशेष न्यायाधीशों ने मामले में 450 गवाहों का पक्ष सुने बिना भगत सिंह को फांसी की सजा सुना दी थी। उन्होंने कहा कि सिंह के वकीलों को गवाहों से जिरह का अवसर नहीं दिया गया। उन्होंने कहा, मैं सांडर्स मामले में भगत सिंह की बेगुनाही साबित करूंगा।

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