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स्वेज नहर में जाम : कितना नुकसान, भारत पर क्या असर

‘एवर गिवन’ जहाज चीन से माल लादने के बाद नीदरलैंड के पोर्ट रॉटरडैम जा रहा था। चार सौ मीटर लंबे इस जहाज में दो लाख टन से भी ज्यादा का माल लदा था। यह छह दिन फंसा रहा। जहाज के चालक दल में 25 भारतीय भी थे। नहर के दोनों छोर पर करीब 150 जहाज और फंस गए थे।

suez canal, internationalस्वेज नहर में फंसा जहाज। (फोटो- इंडियन एक्सप्रेस)

छह दिन की कड़ी मशक्कत के बाद स्वेज नहर में फंसे ‘एवर गिवन’ नाम के जहाज को निकाल लिया गया। जहाज के फंसने से नहर में यातायात बंद हो गया था, जिससे हर घंटे लगभग 400 मिलियन डॉलर यानी करीब तीन हजार करोड़ का नुकसान हो रहा था। 23 मार्च को नहर के बंद होने से वैश्विक कारोबार को बड़ा झटका लगने की आशंका थी। तेज रफ्तार धूलभरी हवा के कारण ‘एवर गिवन’ नामक जहाज नहर में फंस गया। इससे नहर में यातायात बंद हो गया। नहर के दोनों छोर पर करीब 150 जहाज और फंस गए।
स्वेज नहर दुनिया के सबसे व्यस्ततम समुद्री मार्गों में से है। नहर बनने के बाद एशिया और यूरोप के बीच की दूरी छह हजार किलोमीटर कम हो गई है। इसके साथ ही सफर में लगने वाले समय में भी लगभग सात दिनों की कमी आई है।

यही वजह है कि एशिया और यूरोप के बीच समुद्री यातायात के लिए स्वेज नहर से गुजरना फायदेमंद माना जाता है। वर्ष 2020 में इस नहर से 19,000 से भी ज्यादा जहाजों का आवागमन हुआ था। रोजाना यहां से लगभग 50 जहाज गुजरते हैं, जिन पर 10 बिलियन डॉलर यानी करीब 73 हजार करोड़ रुपए तक का सामान लदा होता है। पूरी दुनिया में होने वाले समुद्री कारोबार का 12 फीसद आवागमन इसी नहर से होता है। यह नहर भारत के लिए भी अहम है। भारत स्वेज नहर का इस्तेमाल उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और यूरोप से माल आयात और निर्यात के लिए करता है। इसमें फर्नीचर, चमड़े का सामान, पेट्रोलियम उत्पाद, वाहनों के पुर्जे, मशीनरी, कपड़ा आदि शामिल हैं। भारतीय वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार यह कारोबार लगभग 200 मिलियन अमेरिकी डॉलर का है।

वर्ष 1854 में फ्रांस के राजनयिक डि लेसेप्स ने स्वेज नहर को बनाने की योजना पर काम करना शुरू किया। 1858 में इसके लिए यूनिवर्सल स्वेज शिप कैनाल कंपनी बनाई गई। इस कंपनी को 99 साल के लिए नहर के निर्माण और संचालन का काम सौंपा गया। 1869 में नहर बनकर तैयार हो गई और इसे अंतरराष्ट्रीय यातायात के लिए खोल दिया गया। वर्ष 1956 में मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल नासिर ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। स्वेज नहर कंपनी में ज्यादातर शेयर ब्रिटिश और फ्रेंच सरकार के थे। ऐसे में नासिर के इस कदम से दोनों देशों में बवाल मच गया।

ब्रिटेन, फ्रांस और इजराइल ने नासिर को हटाने के लिए मिस्र पर हमला कर दिया। तब अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप से ब्रिटेन और फ्रांस को अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी। इसके बाद से ही नहर पूरी तरह मिस्र के कब्जे में है। नहर के राष्ट्रीयकरण की घोषणा के बाद उपजे विवाद में 26 जुलाई 1956 को पहली बार नहर को बंद किया गया। जून 1967 में इजराइल का मिस्र, सीरिया और जॉर्डन से युद्ध छिड़ गया। छह दिन चले इस युद्ध के दौरान दोनों ओर से हो रही गोलाबारी के बीच 15 जहाज स्वेज नहर के रास्ते में फंस गए। इनमें से एक जहाज डूब गया, बाकी 14 अगले आठ साल तक कैद होकर रह गए। इस वजह से इस नहर से व्यापार आठ साल तक बंद रहा था। वर्ष 2004, 2006 और 2017 में जहाजों के फंसने की वजह से नहर में यातायात कुछ दिनों के लिए बाधित हो गया था

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