ताज़ा खबर
 

तो क्या इटली को बदल देंगे चुनाव के ये नतीजे?

इटली अब दो पाटों के बीच में फंस गया है। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की तरह “इटली फर्स्ट” का नारा लगाने वाली लीग पार्टी के नेता मातेओ साल्विनी हैं तो दूसरी तरफ कभी मजाक मजाक में बनी पार्टी फाइव स्टार मूवमेंट के नेता लुइगी दि मायो, जो पूरे सिस्टम को झकझोरने की बात करते हैं।

इटली के वोटरों का स्थापित पार्टियों पर भरोसा टूट रहा है। (Source: freegreatpicture.com)

यूरोप में वाकई इन दिनों बदलाव की हवा बह रही है। इटली के आम चुनावों ने भी इसी बात को साबित किया है। यूरोप के वोटरों का स्थापित पार्टियों पर भरोसा टूट रहा है और लोकलुभावन नारों के साथ नए नवेले नेता जनता की पंसद बन रहे हैं। पहले फ्रांस ने महज साल भर पुरानी पार्टी को देश की सत्ता सौंप दी, फिर जर्मनी में धुर दक्षिणपंथी एएफडी पार्टी पहली बार में संसद में दाखिल हुई और उसके बाद ऑस्ट्रिया में सरकार की कमान 31 साल के एक युवा नेता के हाथ में आ गई। अब इटली दो पाटों के बीच में फंस गया है और कमाल की बात यह है कि दोनों ही दक्षिणपंथी हैं। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की तरह “इटली फर्स्ट” का नारा लगाने वाली लीग पार्टी के नेता मातेओ साल्विनी हैं तो दूसरी तरफ कभी मजाक मजाक में बनी पार्टी फाइव स्टार मूवमेंट के नेता लुइगी दि मायो, जो पूरे सिस्टम को झकझोरने की बात करते हैं। उनकी पार्टी को न यूरोपीय संघ पसंद है और न ही उसकी साझा मुद्रा यूरो।

HOT DEALS
  • Lenovo Phab 2 Plus 32GB Gunmetal Grey
    ₹ 17999 MRP ₹ 17999 -0%
    ₹0 Cashback
  • Coolpad Cool C1 C103 64 GB (Gold)
    ₹ 11290 MRP ₹ 15999 -29%
    ₹1129 Cashback

आम चुनाव के बाद सामने आए खंडित जनादेश में दोनों नेता, दि मायो और साल्विनी सत्ता पर दावेदारी जता रहे हैं। जो जोड़तोड़ में मैदान मार लेगा, सत्ता का सेहरा उसके सिर होगा। और अगर दोनों के बीच ही गठबंधन हो गया तो फिर यूरोपीय संघ के लिए पोलैंड और हंगरी के बाद इटली एक और सिरदर्द बन जाएगा। अपने रंगीले स्वभाव की वजह से दुनिया भर में मशहूर और मीडिया मुगल पूर्व प्रधानमंत्री सिल्वियो बैर्लुस्कोनी की किंग बनने की तमन्ना तो पूरी नहीं हुई लेकिन हां, वह किंगमेकर जरूर बन सकते हैं। वह लीग पार्टी के नेता साल्विनी को समर्थन देने की बात कर रहे हैं। 44 साल के साल्विनी जवानी के दिनों में वामपंथी हुआ करते थे, लेकिन जैसे-जैसे वह सियासत की सीढ़ियां चढ़ते गए, दक्षिणपंथ के रंग में रंगते गए।

अब फ्रांस की धुर दक्षिणपंथी नेता मारी ले पेन और नीदरलैंड्स में इस्लाम विरोध के लिए चर्चित डच फ्रीडम पार्टी के नेता गीर्ट विल्डर्स उनके दोस्तों में शुमार होते हैं। साल्विनी इटली के उन चंद लोगों में शामिल थे जिन्होंने ब्रिटेन के यूरोपीय संघ छोड़ने के फैसले का स्वागत किया। यही नहीं, 2016 में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान वह अमेरिका भी गए जहां उन्होंने ट्रंप के साथ फोटो खिंचाई। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की तारीफ भी वह खूब करते हैं जबकि अफ्रीका से नावों में भर कर इटली के तटों पर पहुंचने वाले आप्रवासी उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं। आप्रवासियों को अपराधी बताते हुए उन्होंने चुनावों में “आक्रमण को रोको” का नारा लगाया।

जब एक इतालवी किशोरी की हत्या के आरोप में एक नाइजीरियाई आप्रवासी को गिरफ्तार किया गया, तो साल्विनी ने ट्विटर पर लिखा, “यह कीड़ा अभी तक इटली में क्या कर रहा है?” साल्विनी के इस तरह के नस्ली ट्वीट उन लोगों को खूब भाते हैं जो अपने आसपास लगातार विदेशियों की बढ़ रही तादाद से असहज महसूस करने लगे हैं। उन्हें न सिर्फ अपना सामाजिक ताना बाना बदल जाने की चिंता सता रही है, बल्कि कई बार ये प्रवासी कानून व्यवस्था के लिए भी चुनौती बन रहे हैं। 2014 से अब तक नावों में सवार होकर छह लाख से ज्यादा लोग भूमध्य सागर के रास्ते इटली पहुंचे हैं। फाइव स्टार मूवमेंट के नेता लुइगी दि मायो ने भी आप्रवासी विरोधी भावनाओं का फायदा उठाया है। 32 प्रतिशत वोटों के साथ उनकी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनी है।

दि मायो भी आप्रवासियों पर रोक लगाने के हक में हैं। डगमगाती नौकाओं पर सवार लोगों को कई बार समंदर में डूबने से बचाने के राहत अभियानों को वह “समंदर टैक्सी सर्विस” कह कर तंज कर चुके हैं। लेकिन इतालवी जनता के बीच प्रधानमंत्री पद के लिए वह सबसे पसंदीदा उम्मीदवार हैं। ला7 टीवी के एक सर्वे के मुताबिक सबसे ज्यादा 40 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि फाइव स्टार मूवमेंट के नेता लुइगी दि मायो को सरकार बनाने का मौका दिया जाना चाहिए। पार्टी ने वोटरों से गरीबी और बेरोजगारी कम करने, व्यर्थ के सरकारी खर्चों में कटौती करने, कारोबारियों पर लगने वाले टैक्स में कमी करने और सुरक्षा को मजबूत करने का वादा किया है।

दि मायो की उम्र 31 साल है और देश का नेतृत्व संभालने के लिए उनकी पार्टी काफी समय से उन्हें तैयार कर रही थी। कॉमेडियन बेप्पे ग्रिलो ने 2009 में प्रधानमंत्री बैर्लुस्कोनी के भ्रष्टाचार और भाई भतीजावाद से तंग आकर फाइव स्टार मूवमेंट की नींव डाली थी। ग्रिलो का ब्लॉग बहुत ही पॉपुलर है जिसमें वह इटली के सत्तासीन एलीट तबके को निशाना बनाते हैं। लेकिन 2016 में उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के इस बयान का भी भरपूर समर्थन किया कि “यूरोपीय संघ पूरी
तरह नाकाम रहा है।” ग्रिलो समझते हैं कि यूरोपीय संघ ने दक्षिण यूरोप की कीमत पर पश्चिमी यूरोप को फल फूलने का मौका दिया है।

इटली में सरकार चाहे जो बने, लेकिन चुनाव के नतीजों से इतना साफ है कि जनता बदलाव चाहती है। मतलब, इटली जिस तरह अब तक चल रहा था, जनता उससे खुश नहीं है। यूरोपीय संघ जहां लगातार वित्तीय अनुशासन के लिए जोर डाल रहा है, वहीं चुनावों में जीत हासिल करने वाली पार्टियां अमीरों को टैक्स में छूट देने की बात कर रही हैं। यूरोपीय संघ मौजूदा प्रधानमंत्री मातिओ रेंजी के सुधारों का समर्थक था, लेकिन इटली की जनता ने उन्हें सत्ता से विदा कर दिया। अब वह विपक्ष में बैठने का मन बना चुके हैं।

यूरोपीय संघ का कहना है कि बड़े कर्ज और कमजोर बैंकिंग सेक्टर के कारण इटली यूरोपीय संघ के उन तीन देशों में शामिल है जिनका आर्थिक असंतुलन औरों के लिए भी मुश्किल खड़ी कर सकता है। सवाल यह है कि क्या वित्तीय सुधारों के मुद्दे पर इटली की नई सरकार यूरोपीय संघ की तरफ से लटकने वाली तलवार की परवाह करेगी? यही सवाल आप्रवासियों और शरणार्थियों के मुद्दे पर भी सामने खड़ा होगा। कुल मिलाकर यूरोपीय संघ के लिए चुनौतियां बढ़ सकती हैं।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App