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डीएनए मां-बाप का, जेनेटिक कोड डोनर का: पहली बार तीन लोगों के योगदान से पैदा हुआ बच्चा

न्यू साइंटिस्ट के अनुसार बच्चे के माता-पिता जॉर्डन के रहने वाले हैं। बच्चे में तीसरे व्यक्ति के जेनेटिक कोड डालने का काम अमेरिकी विशेषज्ञों ने किया।

चित्र का इस्‍तेमाल केवल प्रस्‍तुतिकरण के लिए किया गया है।

विज्ञान शोध पत्रिका न्यू साइंटिस्ट के अनुसार तीन अभिभावकों वाला दुनिया का पहला बच्चा जन्म ले चुका है। पांच महीने के इस बच्चे में उसके मां-बाप के पारंपरिक डीएनए के अलावा एक अन्य डोनर के जेनेटिक कोड हैं। इस बच्चे का जन्म मेक्सिको में हुआ था। इस पद्धति से बच्चों के प्रजनन के आलोचकों का कहना है कि मनुष्य अब “ईश्वर की तरह” पेश आ रहा है। जबकि इस समर्थकों का कहना है कि इस तरह जेनेटिक बीमारियों से पीड़ित दंपति भी स्वस्थ बच्चा प्राप्त कर सकते हैं। न्यू साइंटिस्ट के अनुसार बच्चे के माता-पिता जॉर्डन के रहने वाले हैं। बच्चे में तीसरे व्यक्ति के जेनेटिक कोड डालने का काम अमेरिकी विशेषज्ञों ने किया।

बच्चे की मां को लीघ सिंड्रोम नामक जेनेटिक बीमारी है। इस बीमारी से व्यक्ति का नर्वस सिस्टम प्रभावित हो जाता है। ये बीमारी माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए के माध्यम से बच्चों में पहुंच जाती है। महिला खुद तो स्वस्थ है लेकिन उसके दो बच्चे, एक छह वर्षीय लड़की और एक आठ महीने का लड़का पहले ही इस बीमारी के कारण मर चुके हैं।

न्यूयॉर्क के न्यू होप फर्टिलिटी क्लिनिक के डॉक्टर जॉन झांग बताते हैं कि मां के अंडाणु से न्यूक्लियस लेकर उसमें डोनर के अंडाणु में डाल दिया जाता है। डोनर के अंडाणु से उसका न्यूक्लियस पहले ही निकाल दिया जाता है लेकिन उसमें डोनर के स्वस्थ माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए मौजूद रहते हैं। आम डीएनए के उलट माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए मनुष्य की कोशिका ऊर्जा प्रदान करते हैं। कई वैज्ञानिक इस पद्धति से पैदा होने वाले बच्चों को “तीन अभिभावकों वाले बच्चे” कहने पर आपत्ति जताते हैं। ऐसे वैज्ञानिकों का कहना है कि इन बच्चों में महत्वपूर्ण डीएन दो लोगों के ही होते हैं ऐसे में उन्हें ‘तीन लोगों का बच्चा’ कहना उचित नहीं है।

मासट्रिस्ट यूनिवर्सिटी के जीनोम सेंटर के प्रोफेसर बर्ट स्मीट्स ने द इंडिपेंडेंट से कहा, “आखिरकार माइटोकॉन्ड्रियल दान के बाद माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए म्यूटेशन से दुनिया के पहले बच्चे का जन्म हो गया। ब्रिटेन के न्यूकैसल ग्रुप ने पहले ही दिखा दिया था कि ये तरीका सुरक्षित है और अस्पतालों में इसकी सुविधा प्रदान करना संबंधित देश के कानूनों और समय की बात है।”

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