इजरायल और अमेरिका संयुक्त रूप से ईरान पर हमले कर रहा है। दोनों देश मिलकर इस्लामी गणराज्य पर मिसाइल दाग रही हैं। हालांकि, कुछ मिसाइलें ऐसी जगह गिरीं जहां उन्हें कभी नहीं गिरना चाहिए था। यह टारगेट है – दक्षिणी ईरान के मीनाब शहर में स्थित, शजरेह तय्येबह बालिका प्राथमिक विद्यालय।
बता दें कि हमलों के कारण यहां 7 से 12 साल की उम्र की 165 से ज्यादा स्कूली छात्राएं, उनके टीचर और स्टाफ के साथ मारी गईं। यह घटना इजरायल-ईरान युद्ध में आम नागरिकों की मौत की सबसे घातक घटनाओं में से एक है। इस घटना ने दुनिया भर में गुस्सा भड़का दिया है। इस हमले के लिए अमेरिका को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, जो 28 फरवरी को दक्षिणी ईरान में ठिकानों पर हमला कर रहा था।
क्या गलत ठिकाने को टारगेट किया गया?
हालांकि, अमेरिका सीधे तौर पर हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है। इधर, आरोप-प्रत्यारोप के बीच इस बात की भी जांच हो रही है कि क्या किसी एडवांस्ड AI सिस्टम की वजह से गलत ठिकाने को टारगेट किया गया।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप ने हाल ही के साक्षात्कार में इन आरोपों का खंडण किया कि यूएस 165 ईरानी छात्राओं की मौत का जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि हमें लगता है कि यह ईरान का ही काम है, क्योंकि वे अपने गोला-बारूद के इस्तेमाल में बहुत ही त्रुटिपूर्ण हैं,” उन्होंने कहा कि अमेरिका का ईरानी नागरिकों को निशाना बनाने का कोई इरादा नहीं था।
हालांकि, स्वतंत्र विश्लेषण और विशेषज्ञ आकलन इस ओर इशारा करते हैं कि इस घटना में अमेरिकी की संलिप्तता थी। साथ ही इसने एंथ्रोपिक के क्लाउड जैसे जेनरेटिव AI को सैन्य अभियानों में प्रयोग करने को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। युद्ध के बादलों के बीच अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना मुश्किल है, लेकिन हम यह पता लगाने की कोशिश करेंगे कि क्या इस त्रासदी में एआई का कोई हाथ है।
12 घंटे में ईरान पर कुल 900 हमले किए
दरअसल, अमेरिका ने AI का इस्तेमाल करते 12 घंटों के भीतर ईरान पर कुल 900 हमले किए। मिनाब के स्कूल पर हुआ अटैक भी इसी सिलसिले की शुरुआत के कुछ देर बाद सामने आया। दरअसल, ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के तहत अमेरिका और इजरायल ने ईरान के शीर्ष नेतृत्व, सैन्य ठिकानों और परमाणु स्थलों को निशाना बनाया था।
CNN द्वारा एनालाइज किए गए सैटेलाइट इमेज और जियोलोकेटेड वीडियो में यह बात सामने आई है कि मिनाब स्थित स्कूल भी उसी समय हमले का शिकार हुआ जब निकटवर्ती इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) नौसैनिक अड्डा को निशाना बनाया जा रहा था।
जेम्स मार्टिन सेंटर फॉर नॉनप्रोलिफरेशन स्टडीज के रिसर्च एसोसिएट सैम लेयर ने फुटेज में दिख रहे गोला-बारूद को एनालाइज किया और कहा कि यह US टोमाहॉक लैंड अटैक मिसाइल से मेल खाता है, जिसका इस्तेमाल इस क्षेत्र में विशेष रूप से अमेरिकी सेना द्वारा किया जाता है।
स्कूल पर दो बार हमले का दावा
CNN की पड़ताल ने पाया कि ईरानी स्कूली छात्राओं की जान लेने वाले हमले के लिए अमेरिकी सेना “संभवतः जिम्मेदार” थी। और फिर ‘डबल टैप’ अटैक के भी दावे सामने आए। ईरान की अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी मेहर न्यूज और मिडिल ईस्ट आई जैसे स्वतंत्र समाचार माध्यमों ने बताया कि स्कूल पर दो बार बमबारी की गई, जिसमें दूसरा हमला पहले हमले के लगभग 40 मिनट बाद हुआ और इसका निशाना स्कूल के प्रार्थना कक्ष में जमा हुए बचे हुए लोग थे।
रॉयटर्स कनेक्ट ने भी स्थानीय रिपोर्टों और तस्वीरों के आधार पर इस घटना स्थल को “40 मिनट के अंतराल पर दो बार बमबारी” के रूप में दर्ज किया है। कई लोगों का तर्क है कि “दो बार बमबारी” का पैटर्न जानबूझकर की गई साजिश का संकेत देता है, न कि गलती का। इस तरह के हमले बचाव कर्मियों में हताहतों की संख्या को अधिकतम करने की रणनीति है।
युद्ध के बीच, ऐसे विवरणों की पुष्टि करना चुनौतीपूर्ण है, और पेंटागन ने विशिष्ट विवरणों पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है। हालांकि, व्हाइट हाउस ने अमेरिकी संलिप्तता से सीधे तौर पर इनकार नहीं किया है, लेकिन दोहराया है कि किसी भी नागरिक की मौत खेदजनक और अनजाने में हुई है।
रक्षा सचिव पीट हेगसेथ, जो युद्ध में AI के इस्तेमाल के बड़े समर्थक हैं, ने सेना की सटीकता के प्रति प्रतिबद्धता पर जोर दिया, फिर भी उनके दफ्तर ने मिनाब में हुई हत्याओं के बारे में कोई जानकारी नहीं दी है।
ईरान पर हमलों में AI की क्या भूमिका थी?
ईरान के खिलाफ अमेरिका के ऑपरेशन में AI के इस्तेमाल पर सवाल उठाए गए हैं। द वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, एंथ्रोपिक का Claude AI शुरू से ही ईरान ऑपरेशन में “शामिल” था, जो इंटेलिजेंस का आकलन करने, टारगेट की पहचान करने और युद्ध के सिमुलेशन में मदद कर रहा था।
यह घटना ट्रंप द्वारा एंथ्रोपिक के टूल्स के संघीय इस्तेमाल पर रोक लगाने के महज कुछ घंटों बाद हुई; ट्रंप ने कंपनी को “कट्टर वामपंथी AI कंपनी” करार दिया था, क्योंकि उसने स्वायत्त हथियारों और बड़े पैमाने पर निगरानी के खिलाफ सुरक्षा उपायों को हटाने से इनकार कर दिया था। रोक के बावजूद, Claude, Palantir के Maven Smart System जैसी साझेदारियों के जरिए काम करता रहा, जिसने पहले 24 घंटों में 1,000 से ज्यादा टारगेट पर काम किया।
द वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, Claude ने ईरान में सैकड़ों टारगेट बताए, उनके कोऑर्डिनेट दिए, और यहां तक कि सैटेलाइट और निगरानी से मिले रियल-टाइम डेटा के आधार पर किन टारगेट को पहले मारना है, यह भी बताया।
NYT के एक विश्लेषण के अनुसार, “2013 की सैटेलाइट तस्वीरों के मुताबिक, एक समय पर वह स्कूल रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के नौसैनिक अड्डे का हिस्सा था।” हालांकि, सितंबर 2016 तक, उसी इमारत को अलग कर दिया गया था और अब वह IRGC अड्डे से जुड़ी हुई नहीं थी। संभवतः एआई इस डेवलपमेंट से अंजान रही होगी।
न्यूयॉर्क की न्यूज वेबसाइट Quartz के एक और एनालिसिस में कहा गया है, “टारगेटिंग में गलतियां कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन टारगेटिंग चेन में जेनरेटिव AI का इस्तेमाल नया है। यह एक ऐसी टेक्नोलॉजी है जो अभी भी फैक्ट्स को लेकर भ्रम पैदा करती है, तस्वीरों को गलत समझती है, और कम जोखिम वाले कमर्शियल मामलों में भी तर्क-वितर्क में लड़खड़ा जाती है।”
गाजा संघर्ष में AI का इस्तेमाल किया
बता दें कि इससे पहले, इजरायल ने भी गाजा संघर्ष में AI का इस्तेमाल किया था। ब्रिटिश अखबार The Guardian के एक लेख का शीर्षक था: “मशीन ने यह काम पूरी तरह से बिना किसी भावना के किया”, जिसमें AI सिस्टम द्वारा बहुत कम मानवीय निगरानी के साथ 37,000 लक्ष्यों की पहचान करने का जिक्र था, जिसके कारण हजारों आम नागरिकों की जान गई।
अमेरिका ने ईरान में 24 घंटों के भीतर 1,000 लक्ष्यों पर हमला करने के लिए AI का इस्तेमाल किया; विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा करने में, अगर AI का इस्तेमाल न किया जाता, तो हफ्तों लग सकते थे। Anthropic के Claude ने “किल चेन” को छोटा करने में मदद की, जिसका मतलब है कि किसी लक्ष्य का पता लगाने से लेकर उस पर हमला करने की मंजूरी मिलने और हमला करने तक की पूरी प्रक्रिया का समय काफी कम हो गया।
अमेरिकी सेना, Anthropic की वॉर-टेक कंपनी Palantir के साथ हुई पार्टनरशिप के जरिए Claude का इस्तेमाल करती है। यह AI टूल Palantir के Maven Smart System में ही शामिल है। ईरान पर पहले हमले से ठीक पहले, The Washington Post ने रिपोर्ट दी थी कि Maven—जो Claude पर आधारित है—ने अमेरिकी सेना के लिए “सैकड़ों” संभावित लक्ष्यों की एक सूची तैयार की थी।
इन लक्ष्यों को प्राथमिकता के आधार पर अरेंज किया गया था और इनमें उनकी सटीक लोकेशन के कोऑर्डिनेट्स भी शामिल थे। इस सिस्टम ने हर जगह के लिए खास हथियारों की भी सिफारिश की थी; ऐसा करते समय उसने उपलब्ध हथियारों के भंडार और पिछले ऑपरेशन्स में वैसे ही लक्ष्यों के खिलाफ उन हथियारों के प्रदर्शन को भी ध्यान में रखा था।
AI की भूमिका अभी बहुत नई
युद्ध के मैदान में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की भूमिका अभी बहुत नई है। बहुत ज्यादा जोखिम वाली स्थितियों में इसकी विश्वसनीयता की जांच अभी बाकी है। ऐसा लगता है कि AI आम नागरिकों पर बम गिराने का फैसला “सोचने की गति” से भी ज्यादा तेजी से लेता है। AI की तरफ से एक छोटी सी भी गलती का मतलब है सैकड़ों लोगों की जान जाना।
हेगसेथ ने अमेरिकी सेना के ऑपरेशन्स में “जोर-शोर से AI अपनाने” की वकालत की है। यह साफ है कि इस टेक्नोलॉजी को जल्दबाजी में लाया जा रहा है, क्योंकि युद्ध के मैदानों में AI का असल समय में बहुत कम इस्तेमाल हुआ है।
मीनाब में स्कूली लड़कियों की मौत की वजह बनी AI की गलती को लेकर बहुत ज़्यादा अस्पष्टता है। हालांकि, जैसा कि दिख रहा है, AI पिछले एक दशक में तेजी से विकसित होने के बावजूद, युद्ध क्षेत्र में अपनी गति और लगभग सटीक होने के बावजूद, इस पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता। कम से कम ईरान में 165 स्कूली लड़कियों की सामूहिक कब्रें यही कह रही है।
