पाकिस्तान के लिए, उसकी विदेश नीति से जुड़े कई दांव एक ही समय में गलत साबित होते दिख रहे हैं। पश्चिम में अफगानिस्तान में तालिबान के साथ संबंध बेहद बिगड़ गए हैं और अब वे युद्ध की स्थिति में पहुंच गए हैं। दक्षिण-पश्चिम में ईरान के साथ युद्ध जारी है। इसका असर सऊदी अरब पर भी पड़ रहा है, जिसके साथ पाकिस्तान का रक्षा समझौता है।

ईरान युद्ध के चलते पेट्रोल और डीजल की कीमतें पाकिस्तानी रुपये में 55 रुपये प्रति लीटर बढ़ गई हैं। पहले से ही कमजोर अर्थव्यवस्था पर इस नए दबाव के बीच, अफगानिस्तान में अपने सैन्य अभियान जारी रखना और सऊदी अरब की मदद के लिए संभावित रूप से एक नया अभियान शुरू करना वित्तीय दृष्टि से बिल्कुल भी सही नहीं है, खासकर ऐसे समय में जब आईएमएफ के अधिकारी 7 अरब डॉलर के राहत पैकेज से संबंधित समीक्षा दौरे पर हैं।

ईरान युद्ध से बलूचिस्तान को बढ़ावा मिल सकता है

इसके अलावा दोनों संघर्ष पाकिस्तान की इंटरनल सिक्योरिटी की स्थिति को और खराब कर सकते हैं। ईरान युद्ध से बलूचिस्तान विद्रोह को बढ़ावा मिल सकता है, जबकि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान अफगानिस्तान का बदला ले सकता है। पहले ही, पूरे पाकिस्तान में अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के विरोध में हुए प्रदर्शनों में 20 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं।

पाकिस्तान लगातार नाजुक स्थिति में

ईरान युद्ध को लेकर पाकिस्तान लगातार नाजुक स्थिति में है। वह डोनाल्ड ट्रंप के साथ अपने नए बने सौहार्दपूर्ण संबंधों को खतरे में नहीं डाल सकता , लेकिन ईरान के साथ उसके संबंध इतने महत्वपूर्ण हैं कि उन्हें युद्ध के मैदान में नहीं झोंका जा सकता। इसलिए, इस्लामाबाद ने ईरान पर हुए पहले हमले की निंदा की, लेकिन हमलावर का नाम नहीं बताया। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मोजतबा खामेनेई को बधाई दी और अयातुल्ला की मृत्यु पर शोक व्यक्त किया, साथ ही उन खाड़ी देशों के प्रति एकजुटता भी व्यक्त की जिन पर ईरान ने हमला किया है।

इन सभी देशों में इस्लामाबाद के लिए सबसे महत्वपूर्ण सऊदी अरब है, जो उसका लंबे समय से मददगार रहा है और जिससे उसे जल्द ही और ज्यादा कर्ज की जरूरत होगी। पिछले साल सितंबर में, दोनों देशों ने एक समझौते पर साइन किए थे। इसमें कहा गया था कि किसी भी देश के खिलाफ आक्रामकता को दोनों देशों के खिलाफ आक्रामकता माना जाएगा। पिछले हफ्ते, पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर सऊदी रक्षा मंत्री से मिलने रियाद गए थे। इस मुलाकात के बाद जारी एक बयान में, पाकिस्तानी सेना के मीडिया विंग ने किसी भी प्रत्यक्ष निंदा से बचते हुए उम्मीद जताई कि “भाईचारा रखने वाला देश ईरान विवेक और समझदारी दिखाएगा।”

11 साल पहले पाकिस्तान ने यमन में सैन्य गठबंधन में शामिल होने के सऊदी अरब के अनुरोध को ठुकरा दिया था। उस समय वह किसी औपचारिक रक्षा समझौते से बंधा नहीं था। आज, अगर सऊदी अरब के लिए युद्ध की स्थिति और बिगड़ती है, तो दुनिया यह देखेगी कि पाकिस्तान अपने समझौते का पालन कैसे करता है।

ईरान के साथ पाकिस्तान के संबंध जटिल हैं। शिया-सुन्नी विभाजन एक कारण है, वहीं अमेरिका के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने के लिए पाकिस्तान के प्रयास दूसरा कारण हैं। दोनों देश 900 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं। इसके दोनों ओर पाकिस्तान में बलूचिस्तान और ईरान में सिस्तान और बलूचिस्तान – बलूच विद्रोह सुलग रहा है। दोनों देशों ने समय-समय पर विद्रोह के खिलाफ सहयोग किया है, लेकिन यह एक तनावपूर्ण स्थिति भी रही है। 2024 में, ईरान ने पाकिस्तान की सीमा के अंदर हमला किया और पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई की, दोनों देशों ने आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाने का दावा किया। तब से, संबंधों में सुधार के लिए कुछ प्रयास किए गए हैं।

लेकिन हारा हुआ या कमजोर ईरान इस्लामाबाद के हित में नहीं है। अगर ईरान अपनी सीमा की सुरक्षा नहीं कर पाता है, तो बलूच उग्रवादियों का हौसला बढ़ेगा। इस्लामाबाद अपने पड़ोसी देश में इजरायल समर्थित कठपुतली नेतृत्व भी नहीं चाहेगा। इसके अलावा, बलूचिस्तान ईरान सीमा के पार से होने वाले व्यापार और आपूर्ति पर बहुत ज्यादा निर्भर है, जबकि ईरान और खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों पाकिस्तानी अपने घर पैसे भेजते हैं। युद्ध के हर दिन का पाकिस्तान पर तेल की कीमतों से कहीं ज्यादा आर्थिक बोझ पड़ता है।

इसके अलावा, यह तथ्य भी है कि लगभग वे सभी देश जो अफगानिस्तान के साथ उसके युद्ध में मध्यस्थता कर सकते थे, अब अपने ही युद्धों में व्यस्त हैं। हालांकि, पाकिस्तान भले ही मुश्किल हालात में है, फिर भी वह एकमात्र ऐसा देश है जो इस संघर्ष में शामिल सभी पक्षों से बातचीत कर सकता है। पाकिस्तान के रक्षा एवं सुरक्षा विशेषज्ञ अली के चिश्ती ने दावा किया, “ईरान के मुद्दे पर पाकिस्तान नीतिगत रूप से एक गतिरोध में फंसा हुआ है। हालांकि, पाकिस्तान ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए ईरान के साथ अपने संबंधों को सक्रिय रूप से मजबूत किया है, जिसके चलते ईरान ने सऊदी अरब को अन्य देशों की तरह बेरहमी से निशाना नहीं बनाया है। इसलिए यह पाकिस्तान के लिए एक जीत है।”

अगर इस्लामाबाद खाड़ी क्षेत्र में तनाव कम करने में कामयाब हो जाता है, तो इससे उसकी राजनयिक छवि को काफी बढ़ावा मिलेगा। घरेलू लेवल पर भले ही सऊदी अरब वाशिंगटन के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध रखना पसंद करता हो, लेकिन आबादी के एक बड़े हिस्से में अमेरिका अलोकप्रिय है।

कराची के हबीब विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर असद उर रहमान ने कहा कि इससे पाकिस्तान को अपनी प्रतिष्ठा बचाने का मौका मिल सकता है। उन्होंने कहा, “पाकिस्तान में अमेरिका विरोधी भावना मुख्य रूप से दो अलग-अलग, लेकिन परस्पर विरोधी कारकों का परिणाम है – पहला, 1970 के दशक से जनसमर्थन प्राप्त करने वाला सर्व-इस्लामवाद, जिसे 9/11 के बाद और मजबूती मिली और दूसरा, भारत के खिलाफ पाकिस्तान का समर्थन करने में अमेरिका द्वारा कथित विश्वासघात। लेकिन अगर पाकिस्तान को सऊदी अरब की ओर से युद्ध में धकेल दिया जाता है, तो मुझे लगता है कि कुछ लाभ हो सकता है, क्योंकि इसे पवित्र स्थलों [सऊदी अरब में स्थित मक्का और मदीना] की रक्षा के प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।”

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच संघर्ष

यहां विवाद की जड़ टीटीपी है। इसे पाकिस्तानी तालिबान भी कहा जाता है। टीटीपी का मूल सिद्धांत इस्लामी जिहाद पर आधारित था, जिसके तहत वह पाकिस्तान को कुरान की सख्त व्याख्या के अनुसार एक अमीरात के रूप में चलाना चाहता था। लेकिन धीरे-धीरे इसने खैबर पख्तूनख्वा की पश्तून आबादी की कई पुरानी स्थानीय शिकायतों का फायदा उठाना शुरू कर दिया है। टीटीपी एक घातक संगठन है। इसने अकेले पिछले कुछ सालों में आतंकी हमलों में हजारों लोगों की जान ली है।

2021 में जब तालिबान काबुल में सत्ता में वापस आया, तो पाकिस्तान को उम्मीद थी कि वह टीटीपी पर लगाम कस सकेगा। हालांकि, इसके उलट ही हुआ। टीटीपी पर नकेल कसने के कई प्रयास विफल होने के बाद, पाकिस्तान ने 27 फरवरी को अफगानिस्तान में बमबारी शुरू कर दी, जिसके जवाब में दूसरी तरफ से भी बमबारी की गई। पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त टीसीए राघवन ने कहा, “अत्यधिक हताशा के चलते पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के साथ टकराव बढ़ाने का फैसला किया है। हालांकि, इससे कोई फायदा नहीं होगा। यह संघर्ष लंबा खिंच सकता है।”

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जारी हिंसा से चीन को भारी नुकसान हो रहा है। इसने पाकिस्तान में भारी निवेश किया है और अफगानिस्तान की खनिज संपदा पर उसकी नजर है। पाकिस्तान बीजिंग को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकता। इस युद्ध से अन्य क्षेत्रों को बेहद जरूरी धन की हानि हो रही है और इससे खैबर पख्तूनख्वा में तनाव और बढ़ सकता है।

एक और तथ्य यह है कि पाकिस्तान में स्थानीय आतंकवादियों के पास कई अन्य देशों की सेनाओं की तुलना में कहीं ज्यादा युद्ध का अनुभव है। टीटीपी के कई सदस्य अफगानिस्तान युद्धों में लड़ चुके हैं और नाटो द्वारा छोड़े गए अत्याधुनिक हथियारों का इस्तेमाल करते हैं। ईरान समर्थित पाकिस्तानी शिया समूह जैनबियून ब्रिगेड सीरिया में आईएसआईएस से लड़ चुका है।

काबुल ने अब तक पीछे हटने का कोई संकेत नहीं दिया है। तो फिर पाकिस्तान इस खर्चीले युद्ध को क्यों जारी रखे हुए है? चिश्ती ने कहा, “पाकिस्तान की इस अभियान में दोहरी नीति है। पहली नीति है अफगानिस्तान की सीमाओं के भीतर उन क्षेत्रों के आसपास एक बफर जोन बनाना जहां टीटीपी सक्रिय है, क्योंकि तालिबान सरकार टीटीपी को कंट्रोल करने में असमर्थ है। दूसरा कारण यह है कि पाकिस्तान दबाव बनाकर अफगान तालिबान की सरकार को चेतावनी देना चाहता है, ताकि वह टीटीपी के खिलाफ सख्त कदम उठाए। इसके अलावा, एक अतिरिक्त उद्देश्य बचे हुए अमेरिकी हथियारों को नष्ट करना है, ताकि अफगान तालिबान की क्षमता को कम किया जा सके।”

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ईरान और इजरायल के बीच जारी जंग 14वें दिन में दाखिल हो चुकी है। इस युद्ध का विस्तार पूरे मिडिल ईस्ट में हो चुका है। इराक में भी अमेरिका का KC-135 एयर-रिफ्यूलिंग विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया है। एक तरफ दावा हो रहा है कि ईरान समर्थित सशस्त्र गुटों के एक संगठन ने अमेरिका का यह विमान गिरा दिया, वहीं दूसरी ओर इसे एक हादसे के रूप में देखा जा रहा है। इजरायल-ईरान युद्ध से जुड़ी अपडेट्स के लिए पढ़ें लाइव ब्लॉग…