इजरायल और ईरान के बीच चल रहा युद्ध अब और भी ज़्यादा खतरनाक हो गया है। इजरायल ने ईरानी इलाके में अपने हमलों को बड़े पैमाने पर बढ़ाने का ऐलान किया है। पिछले 9 दिनों से चल रहे युद्ध का तरीका भी बदल गया है। यह टकराव अब सिर्फ़ टैक्टिकल मिलिट्री टारगेट तक सीमित नहीं है, इसके बजाय यह तेज़ी से एक बड़े स्ट्रेटेजिक हमले में बदल रहा है जिसके दूरगामी क्षेत्रीय और ग्लोबल नतीजे होंगे।

इजरायल ने कहा कि उसने अमेरिका के साथ मिलकर ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के तहत अपने मिलिट्री कैंपेन शुरू करने के बाद से सैकड़ों हमले किए हैं। इजरायली अधिकारियों के मुताबिक इस ऑपरेशन में पूरे ईरान में मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर, एयर डिफेंस सिस्टम और एनर्जी सुविधाओं पर हमले शामिल हैं। इजरायली और अमेरिकी हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई। इजरायल-अमेरिका ने ईरान के एक अंडरग्राउंड मिलिट्री बंकर को निशाना बनाया था जिसमें खमेनेई की मौत हुई।

मिलिट्री से स्ट्रेटेजिक टारगेट की ओर बदलाव

हमलों के नए दौर में सबसे खास बातों में से एक इजरायली स्ट्रेटेजी में बदलाव है। शुरुआत में ज़्यादातर मिलिट्री ठिकानों पर फोकस करने वाले इजरायल ने अब अपने टारगेट को बढ़ाकर तेल डिपो और फ्यूल डिस्ट्रीब्यूशन इंफ्रास्ट्रक्चर को भी शामिल कर लिया है। खबर है कि इज़रायली और अमेरिकी सेनाओं ने तेहरान और उसके आस-पास तेल से जुड़े पांच जगहों पर हमला किया, जिसमें चार तेल डिपो और एक पेट्रोलियम ट्रांसपोर्ट सेंटर शामिल हैं। ईरानी अधिकारियों ने कन्फर्म किया कि हमलों के बाद कई लोग मारे गए और आग लग गई। हालांकि उन्होंने कहा कि स्थिति पर काबू पा लिया गया है।

तेल डिपो पर हमले क्यों?

एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाना एक अलग स्ट्रेटेजी को दर्शाता है। तेल डिपो और फ्यूल नेटवर्क सिर्फ मिलिट्री एसेट्स नहीं हैं बल्कि ये ईरान की इकॉनमी और आम लोगों की ज़िंदगी के लिए बहुत जरूरी हैं। इन जगहों पर हमला करके, इजरायल का मकसद ईरान की लंबे समय तक चलने वाली लड़ाई को बनाए रखने की लॉजिस्टिक क्षमता को कमज़ोर करना लगता है। हालांकि इस स्ट्रैटेजी से गंभीर मानवीय और जियोपॉलिटिकल चिंताएं भी पैदा होती हैं। फ्यूल नेटवर्क को नुकसान से आम लोगों की सप्लाई में रुकावट आ सकती है और बड़े पैमाने पर आर्थिक अस्थिरता पैदा हो सकती है।

दबाव में ईरान का एयर डिफेंस

एक और अहम डेवलपमेंट रहा कि इजरायल ने इस्फ़हान एयरपोर्ट पर ईरान के पुराने F-14 फाइटर जेट्स के बेड़े को निशाना बनाया है। ये एयरक्राफ्ट 1979 की इस्लामिक क्रांति से पहले अमेरिका से खरीदे गए थे। ये लंबे समय से ईरान के एयर डिफेंस के मुख्य पिलर रहे हैं। हालांकि यह साफ नहीं है कि कितने एयरक्राफ्ट तबाह हुए, लेकिन इजरायली अधिकारियों का दावा है कि हमलों में फ़्लीट से जुड़े रडार और एयर डिफ़ेंस सिस्टम को भी निशाना बनाया गया। लेकिन अगर इसकी पुष्टि हो जाती है, तो इस तरह के नुकसान से ईरान हवाई हमलों का असरदार तरीके से जवाब देने में कामयाब नहीं हो पाएगा।

ईरान के राजनीतिक नेतृत्व को नया आकार देना चाहता इजरायल?

इजरायली सेना ने यह भी संकेत दिया है कि उसका अभियान शायद जल्द खत्म न हो। उसने चेतावनी दी है कि वह खामेनेई का उत्तराधिकारी नियुक्त करने में शामिल किसी भी व्यक्ति को टारगेट करेगा। ऐसे बयान टकराव को दिखाते हैं और बताते हैं कि इजरायल का मकसद युद्ध के मैदान में फ़ायदे से कहीं ज़्यादा ईरान के राजनीतिक नेतृत्व को नया आकार देना है।

तेल डिपो पर हमले से अंतरराष्ट्रीय मार्केट में हलचल

तेल के इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमलों ने पहले ही ग्लोबल एनर्जी स्टेबिलिटी को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंता पैदा कर दी है। ईरान ग्लोबल ऑयल मार्केट में एक अहम प्लेयर है। ऐसे में प्रोडक्शन या एक्सपोर्ट में किसी भी रुकावट का असर तेल की कीमतों और शिपिंग रूट पर पड़ सकता है। इसके अलावा टकराव का बढ़ता दायरा युद्ध में और ज़्यादा क्षेत्रीय लोगों के शामिल होने का खतरा है। पश्चिम एशिया में ईरान के सहयोगी ग्रुप्स का नेटवर्क लंबे समय से इज़रायल और अमेरिका के साथ तनाव का कारण रहा है। अगर ये ग्रुप्स लड़ाई में और ज़्यादा अग्रेसिव तरीके से शामिल होते हैं, तो स्थिति एक बड़े टकराव में बदल सकती है। पढ़ें ट्रंप की आगे की रणनीति

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ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी मिसाइल रक्षा प्रणाली से जुड़े करीब 300 मिलियन डॉलर (लगभग 2500 करोड़ रुपये) के एक महत्वपूर्ण रडार सिस्टम को नष्ट कर दिया है। इससे भविष्य में होने वाले हमलों से निपटने की क्षेत्र की क्षमता पर दबाव बढ़ सकता है। पढ़ें पूरी खबर